नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने मंगलवार को कहा कि अमेरिकी शुल्कों को लेकर भारत को जल्दबादी में प्रतिक्रिया देने से बचने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मौजूदा भू-राजनीतिक बदलावों और हलचलों के दौर का इस्तेमाल विनिर्माण क्षेत्र को विस्तार देने में करना चाहिए। बीएस मंथन में निवेदिता मुखर्जी के साथ बातचीत में कांत ने कहा, अमेरिका का नीतिगत माहौल अस्थिर और अप्रत्याशित बन गया है। उन्होंने कहा, ‘अमेरिका अपनी नीतियों में बहुत अप्रत्याशित और असंगत हो गया है। वे आज जो नीति अपनाते हैं, उसमें कल फेरबदल हो सकता है।’ उन्होंने कहा कि फैसले निरंतर बातचीत का मसला हैं और तुरंत बदल सकते हैं।
उनकी सलाह स्पष्ट हैः ‘इसलिए मेरा मानना है कि हमें अपनी राह पर बने रहना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि भारत को लंबे समय की संभावना देखनी चाहिए और इस समय जल्दबाजी नहीं करना चाहिए। अमेरिका को लेकर भारत की नीतियों पर उन्होंने कहा, ‘अभी जल्दबाजी न करें। देखें और इंतजार करें।’ उन्होंने कहा कि बाहरी मामलों में धैर्य जरूरी है और आंतरिक मामलों में तत्परता महत्त्वपूर्ण है।
कांत ने मौजूदा दौर को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बना ऐसा दौर बताया, जिसने वैश्विक व्यापार के विस्तार को आधार दिया लेकिन जो अब टूट रहा है। उन्होंने कहा कि यूरोप और पश्चिम एशिया के बीच टकराव और टूटती वैश्विक मूल्य श्रृंखला ढांचागत बदलाव का प्रतीक है। चार दशकों के दौरान वैश्विक श्रृंखला के एकीकरण से एशिया में लाखों लोग गरीबी से बाहर निकले। जापान निर्यात के माध्यम से आगे बढ़ा। दक्षिण कोरिया ने वैश्विक बाजारों में प्रवेश किया। चीन 1990 और 2020 के बीच तेजी से बढ़ा, जिसे विनिर्माण मूल्य श्रृंखला में व्यापक जुड़ाव का लाभ मिला।
उन्होंने कहा कि वह प्रणाली अब पुनर्गठन के दौर से गुजर रही है। कांत ने कहा, ‘व्यवधान होने और वैश्विक मूल्य श्रृंखला के टूटने से भारत को कभी-कभार वाला अवसर मिला है।’ उन्होंने कहा कि जो हो रहा है वह डीग्लोबलाइजेशन नहीं है, बल्कि री-ग्लोबलाइजेशन है। भरोसा, मजबूती और पहले से अनुमान लगा पाने की स्थिति से व्यापार संबंधों को आकार देने में सहूलियत होती है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए सीधे तौर पर विनिर्माण में सफलता निहित है। उन्होंने कहा, ‘आपको मात्रा बढ़ाने और प्रतिस्पर्धी होने की जरूरत है।’आकार और पैमाने के बगैर भारत वैश्विक बाजारों में बेहतर तरीके से प्रवेश नहीं कर सकता।
कांत ने तर्क दिया कि विनिर्माण क्षेत्र में चीन के आगे बढ़ने को भारत को बेंचमार्क बनाने की जरूरत है, उसके मॉडल को दोहराने के लिए नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के आकार को समझने के लिए। उन्होंने कहा,‘अपने लिए यह मानक बनाएं कि चीन विनिर्माण वाला देश कैसे बना।’ उन्होंने कहा कि चीन की सफलता समन्वित कार्रवाई पर आधारित थी। कम लागत पर लंबी अवधि के लिए पट्टे पर जमीन दी गई, किफायती और भरोसेमंद बिजली, सस्ता कर्ज और श्रम को तेजी से औद्योगिक उत्पादन के काम में लगाया गया।
लाखों श्रमिक विनिर्माण क्षेत्र में आए और निर्यात की क्षमता में उछाल आई। उन्होंने कहा कि भारत जीवंत लोकतंत्र है और उसे अपनी राह पर चलना है। लेकिन सबक साफ है कि लागत प्रतिस्पर्धी होने से वैश्विक व्यापार में जगह बनती है। उन्होंने कहा, ‘यह सिर्फ कारोबारी सुगमता का मसला नहीं है, जिसकी लागत भारत में अधिक है।’
उन्होंने कहा, ‘कारोबार करने की लागत अधिक है, क्योंकि भारत में ऋण पर ब्याज अधिक है।’ उन्होंने कहा कि वैधानिक तलरता जरूरतें वैश्विक मानकों की तुलना में बहुत ज्यादा हैं और धीरे धीरे इसे कम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, ‘ऋण की दर भारत में निश्चित रूप से कम होनी चाहिए, यह बहुत महत्त्वपूर्ण है।’ बिजली दरें, जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया और लॉजिस्टिक्स लागत भी निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता के अनुकूल होनी चाहिए।
अगर भू-राजनीति विखंडन के संकेत दे रही है तो तकनीक रफ्तार के संकेत दे रही है। कांत ने मौजूदा दौर को आर्टीफिशल इंटेलिजेंस से संचालित असाधारण उत्पादकता की क्षमता वाले दौर के रूप में बताया।