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सवाल-जवाब: ‘नीतिगत दर में कटौती पर फिलहाल कहना सही नहीं’

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आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने मुद्रास्फीति और नीतिगत रुख में बदलाव पर दी सफाई, जोखिमों पर जताई चिंता

Last Updated- October 09, 2024 | 11:09 PM IST
डिजिटलीकरण से वित्त व्यवस्था में आ रही क्रांति, आम लोगों तक किफायती सेवाओं की पहुंच हो रही बेहतरDigitalization is bringing revolution in the financial system, the common people are getting better access to affordable services

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास और डिप्टी गवर्नर माइकल पात्र, एम राजेश्वर राव, स्वामीनाथन जे और टी रवि ने मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक के बाद संवाददाता सम्मेलन में कई पहलुओं पर चर्चा की। पेश हैं संपादित अंशः

केंद्रीय बैंक ने अपना रुख ‘तटस्थ’ कर लिया है। जब सितंबर में समग्र मुद्रास्फीति अधिक रहने का अंदेशा है तो फिर रुख में यह बदलाव क्यों?

दासः हमें काफी सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि मुद्रास्फीति फिर पलटवार कर सकती है। निकट अवधि में मुद्रास्फीति ऊंचे स्तरों पर रह सकती है मगर तीसरी तिमाही में इसमें कमी आनी चाहिए। हमें मुद्रास्फीति नरम पड़ने की पूरी संभावना दिख रही है मगर जोखिमों को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। इसे देखते हुए एमपीसी को लगा कि रुख ‘तटस्थ’ करने का यह उपयुक्त समय है।

क्या ‘रुख’ में बदलाव भविष्य के लिए कोई बड़ा संकेत है?

दासः इसकी व्याख्या आप स्वयं करें। हमें इस पर कुछ नहीं कहना। मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद बयान में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि रुख तटस्थ रखने से हमारे पास विकल्प बढ़ जाते हैं जिससे निर्णय लेने में आसानी होती है।

पिछले साल जब दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला रुका तो आपने कहा कि इसका कोई विशेष मतलब नहीं निकाला जाए। अब रुख बदलकर तटस्थ कर दिया गया है। क्या इस बदलाव को कटौती की तरफ बढ़ने का शुरुआती संकेत माना जाए?

दासः फिलहाल आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति दोनों ही संतुलित दिख रही हैं इसलिए प्रोत्साहन वापस लिए जाने संबंधी रुख बरकरार रखने का कोई औचित्य नहीं था। हमने जो चाहा वह हासिल हो गया है। अब आगे की राह अनिश्चितताओं से भरी हुई है और जोखिमों को लेकर लापरवाही नहीं बरती जा सकती। मगर अब हम अधिक विश्वास के साथ कह सकते हैं कि मुद्रास्फीति नरम हो रही है, हां आगे कई जोखिम भी हैं जिन्हें देखते हुए नीतिगत दर में कटौती के समय पर चर्चा करना इस समय उचित नहीं होगा।

भारत अब सभी तीनों तेजी से उभरते बाजार सूचकांकों में शामिल है। विदेशी निवेशकों के सरकारी बॉन्ड में निवेश को लेकर आरबीआई कितना सहज है?

पात्रः इस समय केवल 3 प्रतिशत सरकारी बॉन्ड विदेशी निवेशकों के पास हैं। किसी भी लिहाज से यह अधिक नहीं माना जा सकता। यह आंकड़ा ठीक-ठाक स्तर तक पहुंचने के बाद ही हम कोई निर्णय लेंगे।

आपने ‘एनबीएफसी द्वारा किसी भी कीमत पर कारोबार करने का लक्ष्य’ हासिल करने के बढ़ते चलन पर चर्चा की। हाल में लक्ष्य पूरा नहीं होने पर कई बैंक कर्मियों के हताशा में आत्महत्या करने के मामले सामने आए हैं। बैंकों के खिलाफ भी ऐसे कदम उठाए जाएंगे?

दासः हम बैंकों के साथ बातचीत कर रहे हैं। ऐसे 2-3 मामलों को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जा सकता। जांच एजेंसियां इन मामलों की तहकीकात कर रही हैं। आरबीआई की उचित व्यवहार संहिता का पालन बैंकों और एनबीएफसी दोनों को करना होगा। अगर वे इनका पालन नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है।

आरबीआई ने दूसरी छमाही के लिए कच्चे तेल के दाम का अनुमान 85 डॉलर से घटाकर 80 कर दिया है। इसकी वजह?

पात्रः हां, इसमें कमी की गई है मगर मध्यम अवधि के लिहाज से देखा जाए तो आगे कच्चे तेल की मांग कम रहने के आसार अधिक दिख रहे हैं। ओपेक प्लस वर्ष 2025 में चरणबद्ध तरीके से उत्पादन में कमी लागू करना करने की योजना पर काम कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि कच्चे तेल की मांग पहले से अब कम हो गई है। बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा का योगदान तेजी से बढ़ रहा है। इन सभी कारणों से कच्चे तेल के दाम आगे नरम रहने के आसार दिख रहे हैं।

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First Published - October 9, 2024 | 10:52 PM IST

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