facebookmetapixel
वेनेजुएला संकट: भारत के व्यापार व तेल आयात पर भू-राजनीतिक उथल-पुथल से फिलहाल कोई असर नहींसोमनाथ मंदिर: 1026 से 2026 तक 1000 वर्षों की अटूट आस्था और गौरव की गाथाT20 World Cup: भारत क्रिकेट खेलने नहीं आएगी बांग्लादेश की टीम, ICC से बाहर मैच कराने की मांगसमान अवसर का मैदान: VI को मिलने वाली मदद सिर्फ उसी तक सीमित नहीं होनी चाहिए1985–95 क्यों आज भी भारत का सबसे निर्णायक दशक माना जाता हैमनरेगा भ्रष्टाचार का पर्याय बना, विकसित भारत-जी राम-जी मजदूरों के लिए बेहतर: शिवराज सिंह चौहानLNG मार्केट 2025 में उम्मीदों से रहा पीछे! चीन ने भरी उड़ान पर भारत में खुदरा बाजार अब भी सुस्त क्यों?उत्पाद शुल्क बढ़ते ही ITC पर ब्रोकरेज का हमला, शेयर डाउनग्रेड और कमाई अनुमान में भारी कटौतीमझोले और भारी वाहनों की बिक्री में लौटी रफ्तार, वर्षों की मंदी के बाद M&HCV सेक्टर में तेजीदक्षिण भारत के आसमान में नई उड़ान: अल हिंद से लेकर एयर केरल तक कई नई एयरलाइंस कतार में

वास्तविक रीपो दर बहुत ज्यादा होने पर प्रभावित हो सकती है मांग और आपूर्ति

अगर महंगाई दर में गिरावट जारी रहती है और 8 फीसदी वृद्धि दर के साथ महंगाई दर लक्ष्य पर पहुंचती है तो इसका मतलब यह है कि हम इस दर पर सुरक्षित रूप से बढ़ सकते हैं।

Last Updated- June 23, 2024 | 10:38 PM IST
वास्तविक रीपो दर बहुत ज्यादा होने पर प्रभावित हो सकती है मांग और आपूर्ति, If the real repo rate is too high, demand and supply may be affected
Ashima Goyal, external member of the Monetary Policy Committee of the Reserve Bank of India

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बाहरी सदस्य आ​शिमा  गोयल ने जून की नीतिगत बैठक में रीपो दर में 25 आधार अंक की कटौती करने के पक्ष में मतदान किया, जबकि ज्यादातर की राय यथास्थिति बनाए रखने की थी। मनोजित साहा से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर रीपो दर अगले 6 महीने तक कम नहीं की जाती है तो वृद्धि पर इसका असर पड़ेगा।

अप्रैल की समीक्षा में आपने नीतिगत दर में बदलाव न करने के पक्ष में मत दिया। जून की समीक्षा में दर में कटौती का पक्ष लिया। अप्रैल और जून के बीच क्या बदलाव आया है?

अप्रैल की बैठक के समय तेल की कीमतें बढ़ रही थीं। मॉनसून को लेकर अनिश्चितता थी। लू का असर और चुनाव का मसला था। मैं इसके असर का इंतजार कर रही थी। इनमें से कुछ मसले हल हो गए। महंगाई दर के लक्ष्य को लेकर कोई बदलाव नहीं है। लू का खाद्य कीमतों पर अनुमान से कम असर पड़ा है। अगर हम लंबा इंतजार करते हैं तो वास्तविक रीपो दर जरूरत से अधिक हो जाएगा।

यथास्थिति बरकरार रखने के पीछे मुख्य तर्क खाद्य वस्तुओं की महंगाई और इसकी अनिश्चितता को लेकर है। आपको क्यों लगता है कि बढ़ी खाद्य कीमतों का समग्र महंगाई दर पर असर नहीं पड़ेगा?

पिछले साल खाद्य कीमतों के लगातार लगने वाले झटके लक्ष्य पर असर नहीं डाल पाए। भविष्य में भी ऐसा होने की आशंका नहीं है।

ग्राहकों तक महंगाई में आई कमी का फायदा देर से पहुंच रहा है, जिसे लेकर कुछ सदस्य चिंतित थे। आपका क्या विचार है?

रीपो दर खाद्य कीमतों पर असर नहीं डाल सकता। ऐसे में इसे साम्य के स्तर से ऊपर रखने से तेजी से अवस्फीति नहीं होगी। धनात्मक वास्तविक रीपो दर महंगाई को उम्मीद के मुताबिक रखने के लिए पर्याप्त है। बहुत ज्यादा वास्तविक रीपो दर मांग के साथ आपूर्ति पर बुरा असर डाल सकता है। समग्र महंगाई दर के हिसाब से वास्तविक रीपो दर बहुत ज्यादा है।

आपने कहा कि वृद्धि की रफ्तार क्षमता से कम है। आपके मुताबिक कितनी वृद्धि दर की क्षमता है?

अगर महंगाई दर में गिरावट जारी रहती है और 8 फीसदी वृद्धि दर के साथ महंगाई दर लक्ष्य पर पहुंचती है तो इसका मतलब यह है कि हम इस दर पर सुरक्षित रूप से बढ़ सकते हैं।

आपके मुताबिक अगर 6 महीने तक रीपो दर में बदलाव नहीं किया जाता है तो वित्त वर्ष 2025 में कितनी वृद्धि दर गंवानी पड़ सकती है?

हम अनुमान लगा रहे हैं कि वित्त वर्ष 2025 में वृद्धि दर वित्त वर्ष 2024 की तुलना में कम होगी। इससे मौजूदा वृद्धि दर के साथ समझौते का अनुमान मिलता है।

ज्यादा ब्याज दरों से बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की संपत्ति की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है, खासकर असुरक्षित ऋणों पर?

इतनी ब्याज दरें ज्यादा उधारी लेने वालों को प्रभावित करेंगी। लेकिन उधारी अब जोखिम पर आधारित है, ऋण छोटे आकार के हैं और विवेकाधीन या निवारक नियमन को सख्त किया गया है, ऐसे में बैंकों व एनबीएफसी की संपत्ति की गुणवत्ता पर बहुत दबाव पड़ने की संभावना कम है। असुरक्षित खुदरा ऋण सामान्यतया नकदी की आवक और वेतन से चुकाए जाते हैं।

First Published - June 23, 2024 | 10:38 PM IST

संबंधित पोस्ट