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जेएसडब्ल्यू स्टील लगाएगी चिली में 550 करोड़ रुपये

Last Updated- December 07, 2022 | 6:03 AM IST

सान जिंदल की कंपनी जेएसडब्ल्यू स्टील चिली में लौह अयस्क खदानों में उत्खनन के लिए 550 करोड़ रुपये का निवेश करेगी।


इस निवेश के बाद कंपनी को जून 2009 तक के लिए जरूरी मात्रा का 50 फीसदी लौह अयस्क की आपूर्ति निश्चित हो जाएगी। कंपनी के वित्तीय निदेशक सेशागिरी राव ने बताया कि इसके लिए उपकरण आपूर्तिकताओं से बातचीत चल रही है।

चिली की खदानों से कंपनी को अगले साल जून तक लगभग 40 लाख टन लौह अयस्क की आपूर्ति होने की उम्मीद है। कंपनी को जून 2009 तक अपनी इकाइयों के लिए लगभग 70 लाख टन लौह अयस्क की जरूरत होगी। अभी कंपनी के पास लौह अयस्क की 30 फीसदी ही निश्चित आपूर्ति है। हालांकि इन खदानों से मिलने वाले लौह अयस्क का इस्तेमाल भारत में समूह के किसी  भी संयंत्र में नहीं किया जाएगा।

राव ने कहा, ‘हम यहां लौह अयस्क खरीदेंगे और वहां बेचेंगे।’ लगभग 70 लाख टन की क्षमता के लिए कंपनी को 112 लाख टन लौह अयस्क की जरूरत होगी। कंपनी को विजयनगर मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड से पिछले वित्त वर्ष में लगभग 12 लाख टन लौह अयस्क की आपूर्ति हुई थी। लगभग 36 महीनों में चिली की खदानों की क्षमता 200 लाख टन हो जाएगी।

जेएसडब्ल्यू ने 208 करोड़ रुपये खर्च कर मेगनेटाइट के उत्खनन के लिए लाइसेंस हासिल किया है। अगले वित्त वर्ष से कोकिंग कोल पर भी कुछ छूट मिलने वाली है। कंपनी ने खनिजों के उत्खनन से जुड़ी एक मोजांबिकी कंपनी के साथ समझौता पत्र पर भी हस्ताक्षर कर लिए हैं। राव ने बताया कि अगले वित्त वर्ष से मोजांबिक से भी लगभग 20 लाख टन कोकिंग कोल की आपूर्ति होगी।

हाल फिलहाल जेएसडब्ल्यू अपनी जरूरत के कोकिंग कोल का 100 फीसदी आयात करता है। राव ने कहा कि कंपनी कोकिंग कोल की जरूरत के विकास में और कोई निवेश नहीं करेगी क्योंकि इसकी आपूर्ति का ठेका एक स्थानीय ठेकेदार को ही दे दिया गया है।

कच्चे माल खास तौर पर लौह अयस्क और कोकिंग कोल की लगातार बढ़ती कीमतों से परेशान होकर सभी इस्पात कंपनियां अपने संयंत्रों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने में लगी हैं। इसी कारण जेएसडब्ल्यू भी अपनी इकाइयों के लिए आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिशों में लगी है। अयस्क और कोकिंग कोल का कच्चे माल की लागत में 80 फीसद हिस्सा होता है। उद्योग सूत्रों के मुताबिक भारत में कोकिंग कोल की गुणवत्ता अच्छी नहीं है और उत्खनन की मंजूरी में भी बहुत वक्त लगता है।

First Published - June 18, 2008 | 12:16 AM IST

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