इंडिगो एयरलाइंस वाइड-बॉडी ए321 एक्सएलआर को शामिल करने वाली पहली भारतीय विमानन कंपनी बन गई है। इसके तुरंत बाद एयर इंडिया ने निजीकरण के चार साल बाद अपना पहला बोइंग 787-9 ड्रीमलाइनर लिया है। ऐसे में संभावना है कि कैलेंडर वर्ष 2030 में भी भारत के आसमान में दो कंपनियों का ही दबदबा रहेगा और 85 प्रतिशत बेड़ा शीर्ष दो कंपनियों के पास ही रहेगा। इंडिगो ने बुधवार को ए321 एक्सएलआर को अपने बेड़े में शामिल किया।
एयरबस की धीमी डिलिवरी ने वैश्विक आपूर्ति की समस्या को और बढ़ा दिया है। भारत में केवल तीन एयरलाइनों – इंडिगो, एयर इंडिया और अकासा ने डिलिवरी पक्की करते हुए 2037 तक के ऑर्डर दिए हैं। एयरबस भी अब अपना उत्पादन बढ़ा रही है।
वित्त वर्ष 2025 में इंडिगो के पास 437 विमानों का मजबूत बेड़ा था और आधे से अधिक वाणिज्यिक यात्री विमानों पर उसका नियंत्रण था। इसके बाद एयर इंडिया समूह का 35.5 प्रतिशत हिस्सा था। इस तरह दोनों ने कुल बेड़े के 86 प्रतिशत हिस्से के साथ आसमान पर अपना दबदबा बनाए रखा। अकासा और स्पाइसजेट के पास कुल मिलाकर 9 प्रतिशत से अधिक विमान थे।
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वर्ष 2030 में भी यही दबदबा रहने की संभावना है। विमानन क्षेत्र के विश्लेषक और नेटवर्क थॉट्स के संस्थापक अमेय जोशी का अनुमान है कि उस वर्ष तक इंडिगो के पास 600 सक्रिय विमानों का बेड़ा होगा। एयर इंडिया समूह के पास 500 विमान होंगे और अकासा एयर के पास 150 विमान। जोशी बताते हैं कि इस समय संपूर्ण उद्योग के बेड़े के आकार का अनुमान लगाना मुश्किल है क्योंकि स्पाइसजेट का अस्तित्व या भविष्य अनिश्चित है।
उद्योग के अनुमानों से पता चलता है कि भारत में कुल वाणिज्यिक विमानों की संख्या वर्ष 2030 तक करीब 1,300-1,350 पर पहुंच जाएगी। इसका मतलब है कि इंडिगो की भागीदारी थोड़ी सी 4 प्रतिशत तक घट जाएगी, जिसका ज्यादातर फायदा एयर इंडिया समूह को होगा। फिर भी, दोनों का अभी भी बाजार के लगभग 85 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण होगा।
एकमात्र अंतर यह है कि अगर अकासा अपनी योजना के मुताबिक डिलिवरी लेती रही और अपने बढ़ते नुकसान को भी कम करती है, तो वह एक संभावित तीसरी कंपनी के रूप में उभर सकती है। 2030 तक अकासा के पास देश के कुल बेड़े का 10 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा हो सकता है, जो ऐसा स्तर है, जिसके दम पर वह कामयाब एयरलाइन बन सकती है।