सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में टाइगर ग्लोबल को वर्ष 2018 में फ्लिपकार्ट के शेयर बेचने पर पूंजीगत लाभ कर चुकाने का निर्देश दिया गया है। इस फैसले से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की ओर से बिकवाली तेज होने की आशंका नहीं है। लेकिन कानूनी और कर विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला संधि के लाभों से जुड़ी जांच को और सख्त बनाएगा। इससे यह प्रभाव पड़ सकता है कि ऑफशोर निवेशक भविष्य में भारत में कैसे निवेश करते हैं।
बाजार के कारोबारी मोटे तौर पर इस फैसले को तथ्य-केंद्रित मान रहे हैं, क्योंकि यह भारत-मॉरीशस कर संधि के तहत ग्रैंडफादरिंग प्रावधानों की व्याख्या और जनरल एंटी-अवॉइडेंस रूल (जीएएआर) के इस्तेमाल पर आधारित है। नतीजतन, इस फैसले से घबराहट में आकर एफपीआई की बिकवाली या पोर्टफोलियो आवंटन में अचानक बदलाव की आशंका नहीं है। यह जान लीजिए कि एफपीआई ने इस महीने लगभग 2 अरब डॉलर निकाले हैं। लेकिन इसका कारण अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता, अपेक्षाकृत महंगा मूल्यांकन और एआई-थीम वाले शेयरों के अभाव जैसे कारक रहे हैं।
किंग स्टब ऐंड कासिवा, एडवोकेट्स ऐंड अटॉर्नीज में पार्टनर आदित्य भट्टाचार्य ने कहा, ‘टाइगर ग्लोबल मामले में फैसला किसी भी तत्काल या बड़े पैमाने पर एफपीआई की बिकवाली को बढ़ावा नहीं देगा। एफपीआई आम तौर पर समय के साथ कर जोखिम को शामिल करके चलते हैं और यह निर्णय काफी हद तक ग्रैंडफादरिंग और तथ्यों तक ही सीमित है।’
विशेषज्ञों ने कहा कि फैसले से स्पष्ट होता है कि ग्रैंडफादरिंग फायदों का दावा स्वत: नहीं किया जा सकता और निवेशकों को व्यापारिक हितों और पात्रता को बताना होगा। कानूनी सलाहकारों को उम्मीद है कि इसकी प्रतिक्रिया में एफपीआई भारत से बाहर नहीं निकलेंगे बल्कि अपने स्वरूपों का फिर से मूल्यांकन करेंगे।
भट्टाचार्य ने कहा, ‘संभावना है कि एफपीआई आर्थिक आधार को मजबूत करेंगे, संधि की स्थितियों पर फिर से विचार करेंगे और जीएएआर, प्रिंसिपल पर्पस टेस्ट (पीपीटी) और लिमिटेशन ऑफ बेनिफिट्स (एलओबी) की आवश्यकताओं का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए होल्डिंग ढांचों का फिर से आकलन करेंगे।’
ट्राइलीगल में कर मामलों के वकील अरिजित घोष ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा कर से बचने के नियमों की व्यापक व्याख्या करने से टैक्स अधिकारियों को यह प्रोत्साहन मिल सकता है कि वे संधि दावों को ज्यादा चुनौती दे सकते हैं। इसमें लाभ का दावा करने वाले एफपीआई भी शामिल हैं।
घोष ने कहा कि संधि के तहत फायदा उठाने वाले एफपीआई को अब व्यापार हित की पर्याप्तता के आधार पर ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे मॉरीशस संधि में हाल में वह लिमिटेशन ऑफ बेनिफिट्स क्लॉज लागू हो जाएगा जिसे अधिसूचित नहीं किया गया है।
लेकिन कई कर विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ मॉरीशस वाले ढांचों पर ही नहीं, बल्कि उन दूसरे मामलों पर भी लागू होगा जहां आय निवास वाले देश में कर के अधीन नहीं है, चाहे वह नुकसान के कराण हो, या छूट या टैक्सेशन के सीमित दायरे की वजह से हो।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कुछ मामलों में, भले ही जीएएआर लागू न हो, फिर भी जेएएआर के प्रावधान लागू हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जेएएआर घरेलू टैक्स लेनदेन के साथ-साथ सीमा पार लेनदेन पर लागू हो सकता है। ठोस तथा प्रक्रिया सुरक्षा न होने से इसके दायरे और प्रयोग को लेकर इसमें खासी अनिश्चितता है।