प्रमुख विमानन कंपनी इंडिगो के सह-संस्थापक राकेश गंगवाल की उस याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज खारिज कर दिया जिसमें असाधारण आम बैठक बुलाने के लिए उनके साझेदार राहुल भाटिया और उनकी कंपनी इंटरग्लोब एंटरप्राइजेज को निर्देश देने की गुहार लगाई गई थी। गंगवाल की याचिका लंदन की मध्यस्थता अदालत के फैसले के संदर्भ में थी जिसमें कंपनी के आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन के उस प्रावधान को संशोधित करने का निर्देश दिया गया है जो दोनों प्रवर्तकों को कंपनी में एक-दूसरे की हिस्सेदारी के लिए पहले इनकार करने का अधिकार देता है।
अदालत ने कहा कि मध्यस्थता आदेश के तहत इन निर्देशों को लागू करने के लिए 90 दिनों का समय दिया गया है और भाटिया अब मध्यस्थता आदेश को चुनौती देना चाहते हैं। गंगवाल ने 2006 में भाटिया के साथ मिलकर इंडिगो की स्थापना की थी। गंगवाल ने अदालत से कहा था कि भाटिया को संयुक्त रूप से ईजीएम बुलाने और आर्टिकल ऑफ एसोशिएशन में संशोधन के लिए प्रस्ताव का समर्थन करने का निर्देश दिया जाए। राहुल भाटिया के समर्थन के बिना गंगवाल के लिए किसी प्रस्ताव को पारित करना असंभव है क्योंकि किसी भी ईजीएम प्रस्ताव को पारित कराने के लिए 75 फीसदी शेयरधारकों के समर्थन की दरकार होगी। इंडिगो में भाटिया परिवार सहित इंटरग्लोब एंटरप्राइजेज की हिस्सेदारी 38.20 फीसदी है जबकि अपने पारिवारिक ट्रस्ट के साथ गंगवाल की हिस्सेदारी 36.63 फीसदी है। गंगवाल का प्रतिनिधित्व कानून फर्म खेतान ऐंड कंपनी कर रही है। उनका कहना है कि ईजीएम के लिए शेयरधारकों को 21 दिन पहले सूचना देना आवश्यक है। इसलिए वह चाहते हैं कि ईजीएम संबंधी आरंभिक कार्य शुरू करने के लिए कंपनी को अदालत द्वारा निर्देश दिया जाए।
समझौते की शर्तों के अनुसार, गंगवाल और भाटिया के बीच शेयरधारक समझौता 2015 में आईपीओ के बाद अगले चार वर्षों के लिए वैध था। समझौते की एक शर्त में यह भी कहा गया है कि यदि कोई संस्थापक कंपनी में अपनी हिस्सेदारी को बेचना चाहते हैं तो उन्हें एक-दूसरे की हिस्सेदारी के लिए पहले इनकार करने का अधिकार होगा। समझौते में ‘टैग-अलॉन्ग’ क्लॉज भी शामिल है। इसमें कहा गया है कि दूसरे प्रवर्तक को किसी भी शेयर बिक्री लेनदेन और हिस्सेदारी बिक्री में शामिल होने का अधिकार होगा।
गंगवाल को शेयरधारक समझौते एवं आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन का पालन करते हुए मतदान करना है। इंडिगो ने 24 सितंबर को एक नियामकीय खुलासे में कहा कि उसे अंतिम मध्यस्थता फैसले की प्रति 23 सितंबर को मिला जिसमें कंपनी को प्रतिवादी नाम दिया गया था।
प्रवर्तकों के बीच गतिरोध जुलाई 2019 में उस दौरान सामने आई जब राकेश गंगवाल ने कंपनी प्रशासन संबंधी समस्या को निपटाने में दखल देने के लिए सेबी को पत्र लिखा था।