भारत के कृषि क्षेत्र में दबे पांव कई बदलाव जारी है। यह क्रमिक रूप से जारी भी है। इस परिवर्तन में अनाज की तुलना में उच्च मूल्य वाले फलों व सब्जियों का रकबा बढ़ाना सबसे प्रमुख है। आंकड़े दर्शाते हैं कि 2014-15 की तुलना में 2024-25 में बागवानी फसलों में विशेष तौर पर फल व सब्जी की पैदावार के क्षेत्र की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) 1.66 प्रतिशत है जबकि अनाज की सीएजीआर 1.08 प्रतिशत है।
बागवानी फसलों में सब्जियों का क्षेत्रफल अधिक तेजी से बढ़ा है। सब्जियों के रकबे का सीएजीआर 1.93 प्रतिशत है जबकि इस अवधि में फलों के रकबे का सीएजीआर 0.05 की दर से गिरा है। प्रतिशत के मामले में देखें तो यह आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
फलों का रकबा 2014-14 से 2024-25 के दौरान 17.35 प्रतिशत बढ़ा जबकि सब्जियों का प्रतिशत करीब 23 प्रतिशत था। बागवानी का कुल प्रतिशत 26 प्रतिशत था। इसकी तुलना में अनाज का रकबा 10.45 प्रतिशत बढ़ा। हालांकि 2019-20 से 2024-25 के बीच यह रुझान स्थिर रहा। वर्ष 2019-20 से 2024-25 के दौरान फलों के रकबे की सीएजीआर वृद्धि 1.15 प्रतिशत रही जबकि सब्जियों के लिए 2.56 प्रतिशत थी।
इस अवधि में बागवानी फसलों की कुल वृद्धि 2.17 प्रतिशत थी जबकि यह अनाज के लिए 1.57 प्रतिशत थी। लिहाजा यह स्पष्ट है कि जब रकबे की वृद्धि का मामला आता है तो बागवानी फसलों – मुख्य तौर पर फल व सब्जी ने अनाजों को पछाड़ दिया है। यह रुझान अनाज और अन्य फसलों की तुलना में बागवानी से प्राप्त होने वाली आय में वृद्धि के कारण भी देखने को मिला है।
प्रख्यात कृषि अर्थशास्त्री व नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने भारतीय सामाजिक विज्ञान संस्थान संघ (आईएएसआई) के 24वें वार्षिक सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में शोध पत्र पेश किया था। इस शोधपत्र के अनुसार 2014-15 से 2023-24 के दौरान 2011-12 की कीमतों पर अनाज के उत्पादन मूल्य में औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.36 प्रतिशत रही। हालांकि फलों में यह दर 3.68 प्रतिशत और सब्जियों में 2.77 प्रतिशत थी। फसल क्षेत्र में चारे व घास के उत्पादन मूल्य में सबसे अधिक वृद्धि 7.39 प्रतिशत देखी गई।
रिपोर्ट में कहा गया, ‘यह पशुधन उत्पादन में वृद्धि के अनुरूप है जो 2004-05 और 2013-14 के बीच 6.2 प्रतिशत से बढ़कर 2014-15 और 2023-24 के बीच 7.17 प्रतिशत हो गया है।’ रिपोर्ट में कहा गया कि अनाज, तिलहन और सामान्य सब्जियों जैसे औसत या कम मूल्य वाले उत्पादों की तुलना में उच्च मूल्य वाले उत्पादों में अधिक वृद्धि देखी गई है।