केंद्र सरकार सरफेसी ऐक्ट 2002 में कुछ संशोधनों पर विचार कर रही है। इस मामले से जुड़े सूत्रों ने कहा कि इसका मकसद कानूनी अस्पष्टताओं को दूर करना, सेंट्रल रजिस्ट्री ऑफ सिक्योरिटाइजेशन ऐसेट रिकंस्ट्रक्शन ऐंड सिक्योरिटी इंटरेस्ट ऑफ इंडिया (सीईआरएसएआई) की निगरानी मजबूत करना और कारोबार को सुगम बनाना है।
सिक्योरिटाइजेशन ऐंड रीकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनैंशियल ऐसेट्स ऐंड इनफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट (सरफेसी) अधिनियम बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अदालत या ट्रिब्यूनल के हस्तक्षेप के बिना उधार लेने वाले या गारंटर की सुरक्षित संपत्तियों के खिलाफ सुरक्षा हितों को लागू करके 1 लाख रुपये से अधिक के बकाया की वसूली के लिए एक सक्षम कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
सीईआरएसएआई भारत सरकार द्वारा संपत्तियों पर सुरक्षा हितों (बंधक/शुल्क) को रिकॉर्ड करने के लिए बनाया गया एक केंद्रीय ऑनलाइन डेटाबेस है, जो अचल, चल और अमूर्त संपत्तियों के खिलाफ ऋणों का विवरण संग्रहीत करके धोखाधड़ी करके एक ही संपत्ति पर कई ऋणों को रोकता है, ऋण देने में पारदर्शिता बढ़ाता है, और यह सुनिश्चित करता है कि ऋणदाता पूर्व देयताओं को सत्यापित कर सकें।
प्रस्तावित बदलावों में से एक का मकसद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की शक्तियों को प्रभावित किए बगैर सीईआरएसएआई को निर्देश जारी करने के लिए केंद्र को स्पष्ट रूप से सशक्त बनाना है। वर्तमान में सरफेसी अधिनियम की धारा 20 में केंद्र को सीईआरएसएआई स्थापित करने का अधिकार दिया गया है, लेकिन निर्देश जारी करने को लेकर शक्तियां स्पष्ट नहीं की गई हैं।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘केंद्र सरकार की स्पष्ट रूप से परिभाषित शक्तियां न होने के कारण सेंट्रल रजिस्ट्री की निगरानी को लेकर इसके पहले कुछ मामलों में भ्रम पैदा हुआ।’
अधिकारी ने आगे कहा, ‘सीईआरएसएआई को अब क्रिटिकल इनफार्मेशन इन्फ्रा के रूप में अधिसूचित किया गया है। साथ ही केंद्र द्वारा निर्देश जारी कनरे के अधिकार को साफ करने से शासन और कामकाज में सुधार होगा।’अधिकारियों ने कहा कि प्रस्तावित संशोधनों का व्यापक उद्देश्य सुरक्षा संबंधी हितों के पंजीकरण को सुव्यवस्थित करना, लेनदारों के विश्वास को मजबूत करना और खासकर ऋण पाने के मानक को लेकर भारत की कारोबार सुगमता के संकेतकों में सुधार करना है।
सूत्रों में से एक ने कहा, ‘इन परिवर्तनों का उद्देश्य सेंट्रल रजिस्ट्री के सुचारु कामकाज को सुनिश्चित करना और परिचालन अनिश्चितताओं को दूर करना है, जो समय के साथ उभरी हैं।’इस सिलसिले में वित्त मंत्रालय को भेजे गए एक ईमेल का जवाब समाचार के प्रेस में जाने तक नहीं मिला। केंद्र सरकार को अधिनियम के अध्याय 4 और अध्याय 4 ए दोनों के तहत सेंट्रल रजिस्ट्री से संबंधित अपनी शक्तियों को रिजर्व बैंक को सौंपने की अनुमति देने के लिए भी सरकार कानून में संशोधन का प्रस्ताव कर रही है।
इस समय धारा 20 आरबीआई को अध्याय 4 के तहत सेंट्रल रजिस्ट्री की स्थापना, संचालन और विनियमन के लिए शक्तियों की अनुमति देती है, लेकिन केंद्रीय बैंक ने बताया है कि उसके पास अध्याय 4 ए के तहत पेश किए गए कार्यों और दायित्वों पर नियामक शक्तियां नहीं हैं।
2016 में संशोधन कर डाले गए अध्याय 4 ए में सुरक्षित लेनदारों और अन्य लेनदारों द्वारा सुरक्षा हित बनाने वाले लेनदेन का पंजीकरण शामिल है। एक अधिकारी ने कहा, ‘रिजर्व बैंक ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि उसके पास अध्याय 4 ए के तहत परिकल्पित सेंट्रल रजिस्ट्री के कार्यों को विनियमित करने का कोई स्पष्ट अधिकार नहीं है। प्रस्तावित संशोधन से स्थिति को साफ करने की कवायद की गई है।’
एक अन्य प्रस्तावित स्पष्टीकरण सेंट्रल रजिस्ट्री के साथ लेनदेन विवरण दाखिल करने से जुड़ा हुआ है। धारा 23 के तहत प्रतिभूतिकरण, परिसंपत्ति पुनर्निर्माण या सुरक्षा हित के निर्माण से जुड़े सभी लेनदेन पंजीकृत होने चाहिए। हालांकि, पहले के संशोधनों की कुछ अदालती व्याख्याओं से इस बारे में अस्पष्टता पैदा हो गई है कि क्या विवरण दाखिल करने का दायित्व सुरक्षित लेनदार पर है।
सरकार अब यह स्पष्ट करने की योजना बना रही है कि अलग अलग मामलों के मुताबिक ऐसे विवरण दाखिल करने की जिम्मेदारी प्रतिभूतिकरण कंपनी, पुनर्निर्माण कंपनी या सुरक्षित लेनदार पर हो। सूत्र ने कहा, ‘अनुपालन दायित्वों में निश्चितता लाने और मुकदमेबाजी से बचने के लिए यह स्पष्टीकरण आवश्यक है।’