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गुटखा उद्योग की ‘दुर्दशा’ से डूबा सुपारी कारोबार

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Last Updated- December 09, 2022 | 9:21 PM IST

सुपारी उगाने वाले किसान इन दिनों मुसीबत में हैं। आर्थिक मंदी और गुटखा उद्योग की उदासीनता के चलते किसानों को सुपारी की उत्पादन लागत (85-90 रुपये प्रति किलोग्राम) भी नहीं मिल पा रही है।


इतना ही नहीं, सुपारी का वायदा कारोबार भी इसी नक्शे कदम पर चल रहा है। ऊपर से सस्ते आयात ने आग में घी का काम करते हुए सुपारी बाजार की कमर तोड़ दी है। इंडोनेशिया से आने वाले सस्ता माल के कारण गुटखा उद्योग ने उधर का रुख कर लिया है।

इस वजह से हाजिर बाजार के साथ-साथ सुपारी का वायदा बाजार भी अपने न्यूनतम स्तर पर चल रहा है। दरअसल सुपारी के बड़े खरीदार गुटखा उद्योग पर ही आजकल मुसीबत आई हुई है।

सुपारी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने वाला यह उद्योग अगस्त-सितंबर से उत्पाद कर का बड़ा बोझ ढो रहा है। इस मुसीबत को कम करने और अपना मुनाफा बनाए रखने केलिए गुटखा उद्योग ने सस्ते उत्पाद की तलाश शुरू कर दी।

अंतत: भरपाई इंडोनेशिया से आने वाले माल से हो जा रही है। एमसीएक्स के सूत्रों ने बताया कि सरकार ने जब से गुटखा उद्योग पर प्रति मशीन प्रति माह 12.5 लाख रुपये बतौर उत्पाद कर वसूलना शुरू किया (अगर उस गुटखे की एमआरपी एक रुपये है), यह उद्योग यहां के हाजिर और वायदा बाजार से सुपारी खरीदना लगभग भूल गया।

प्रीमियम पान मसाले के मामले में उत्पाद कर बढ़ाकर 76 लाख रुपये प्रति मशीन प्रति माह कर दिया गया। पहले इस पर उत्पादन के हिसाब से कर लगता था। इन वजहों से इस उद्योग ने आयातित माल पर भरोसा करना शुरू कर दिया।

क्योंकि यह देसी बाजार के मुकाबले सस्ता पड़ता है। इंडोनेशिया से आने वाला माल करीब 70 रुपये प्रति किलो पर मिल जाता है, जबकि देसी बाजार में इसकी कीमत 90-100 रुपये प्रति किलो है।

उधर, गिरती कीमत के चलते सुपारी के मुख्य उत्पादक क्षेत्र शिमोगा (कर्नाटक) के किसानों ने राज्य सरकार से इसकान्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग कर डाली है।

शिमोगा के एक किसान ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि एमएसपी की बाबत सरकार पर दबाव डालने के लिए यहां के कारोबारियों ने पिछले महीने तीन दिन तक बाजार बंद रखा था। इस सीजन में मौसम की बेरुखी की वजह से सुपारी की फसल करीब 20 दिन देर से बाजार में आई।

हालांकि उत्पादन पिछले साल के बराबर ही करीब 2.5 लाख टन रहा है। एमसीएक्स ने 4 सितंबर को सुपारी वायदा की शुरुआत की, लेकिन तब से आज तक यह जोर नहीं पकड़ पाया है।
शुरुआती दिनों में यह 110 रुपये प्रति किलो के आसपास स्थिर था पर फिलहाल यह 100 रुपये के नीचे आ गया है।

एमसीएक्स के मुताबिक, फिलहाल इसका कारोबार सिर्फ 10-15 लाख का है। ऐसे में जब सुपारी का मुख्य खरीदार ही बाजार से गायब हो गया हो और इंडोनेशिया के सस्ते माल से उसका पेट भर रहा हो तो फिर सुपारी की कीमत में और बढ़त की उम्मीद करना बेमानी होगी।

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First Published - January 12, 2009 | 10:56 PM IST

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