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Budget 2026: क्या निर्मला सीतारमण टैक्स कटौती और भारी निवेश से अमेरिकी टैरिफ का चक्रव्यूह तोड़ेंगी?

आगामी बजट में बुनियादी ढांचे पर रिकॉर्ड व्यय, मध्यम वर्ग के लिए टैक्स राहत और वैश्विक व्यापारिक चुनौतियों से निपटने हेतु ठोस रणनीतियों पर बात हो सकती है

Last Updated- January 31, 2026 | 9:03 PM IST
Union Budget 2026
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को अपना नौवां लगातार बजट पेश करने वाली हैं। ये बजट अप्रैल 2026 से मार्च 2027 तक के वित्त वर्ष के लिए होगा। । इस बजट से उम्मीद है कि सरकार अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बरकरार रखने के लिए कदम उठाएगी, वित्तीय अनुशासन बनाए रखेगी और ऐसे सुधार करेगी जो वैश्विक व्यापार की मुश्किलों से देश को बचाए, खासकर अमेरिका के टैरिफ से।

पिछले कुछ सालों में सीतारमण ने इनकम टैक्स और GST में बड़े कटौती किए हैं। साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाया और RBI ने ब्याज दरें घटाईं। इन सबकी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के लगाए 50 फीसदी टैरिफ का सामना कर पाई है। लेकिन अब आगे की रणनीति बनानी है ताकि ये गति बनी रहे।

बजट का बैकड्रॉप काफी जटिल है। घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है और महंगाई हाल के ऊंचे स्तर से नीचे आई है। फिर भी दुनिया भर की अनिश्चितताएं सिर पर मंडरा रही हैं, जैसे भू-राजनीतिक तनाव, कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव और बड़े केंद्रीय बैंकों की अलग-अलग मौद्रिक नीतियां। देश के अंदर सरकार पर दबाव है कि उपभोग बढ़ाए, नौकरियां पैदा करे, पूंजीगत खर्च तेज करे और वित्तीय घाटे को काबू में रखे।

टैक्स कटौती के चलते सरकार की कमाई घटी है, इसलिए नए समर्थन उपायों की गुंजाइश सीमित रह गई है। सबसे बड़ी चुनौती अब अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए कोई नया इंजन ढूंढना है, खासकर तब जब वैश्विक हालात अनिश्चित हैं, बाजार दबाव में हैं और कमोडिटी कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं को लेकर बनी अनिश्चितता से बाजार डगमगाए हैं, ऐसे में सीतारमण के लिए निवेशकों का भरोसा जल्द बहाल करना जरूरी होगा। फिलहाल विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बेच रहे हैं और रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है।

कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि राजस्व बढ़ाने के लिए वो पुराने भरोसेमंद स्रोत पेट्रोल और डीजल का सहारा ले सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें उबलने से पहले का मौका देखकर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा सकती हैं। ये बढ़ोतरी उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जाएगी, बल्कि पिछले साल तेल कीमतें गिरने पर जो खुदरा दाम कटौती बाकी थी, उसके खिलाफ एडजस्ट की जाएगी। साथ ही नियमों को सरल बनाना और संरचनात्मक सुधारों को बढ़ावा देकर घरेलू और विदेशी निवेश आकर्षित करने पर जोर होगा।

पैसे की कमी के बावजूद सरकार के खर्च घटाने की संभावना नहीं है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम जैसे चुनावी राज्यों के लिए कुछ नए ऐलान या पुरानी योजनाओं को नए अंदाज में पेश किया जा सकता है।

कैपिटल खर्च पर रहेगा मुख्य फोकस

पूंजीगत व्यय बजट का मुख्य आधार बना रहेगा। पिछले कुछ सालों में सरकार ने सड़कों, रेलवे, रक्षा निर्माण, शहरी बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स पर खर्च तेजी से बढ़ाया है ताकि निजी निवेश को आकर्षित कर सके।

वित्त वर्ष 2027 के लिए अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कैपेक्स में अच्छी बढ़ोतरी होगी, हालांकि महामारी के बाद की तेज रफ्तार से थोड़ा कम। रेलवे, नवीकरणीय ऊर्जा, बिजली ट्रांसमिशन, रक्षा और शहरी परिवहन को प्राथमिकता मिलेगी। राज्यों के बुनियादी ढांचे के लिए ब्याज-मुक्त ऋणों का समर्थन जारी रहेगा।

SBI रिसर्च के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह बजट ऐसे समय में आ रहा है जब वैश्विक राजनीति का नया दौर बन रहा है, जो अभी पूरी तरह साफ नहीं है लेकिन चिंता बढ़ाने वाला है। सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल को लेकर है। अगर तेल की कीमतें मौजूदा सप्लाई की अधिकता से निकलकर ऊपर जाती हैं, तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उनके मुताबिक टैक्स से होने वाली कमाई में हल्की बढ़ोतरी होगी, जबकि गैर टैक्स आय लगभग स्थिर रह सकती है। सरकार का पूंजीगत खर्च 12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 10 फीसदी ज्यादा होगा।

DBS बैंक की वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव का कहना है कि GST दरों में बदलाव, प्रत्यक्ष करों में राहत और आर्थिक बढ़त कमजोर रहने की वजह से टैक्स वसूली तय लक्ष्य से पीछे रह गई है। उन्हें उम्मीद है कि बजट में ऐसे कदम उठाए जाएंगे जो सरकार की लंबी अवधि की आर्थिक रणनीति से जुड़े हों, जैसे मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और सामाजिक कल्याण पर जोर देना।

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टैक्स में स्थिरता, नौकरियों पर जोर

टैक्स को लेकर बड़े बदलाव की उम्मीद कम है। सरकार लगातार स्थिर और साफ़ टैक्स सिस्टम पर जोर देती रही है, खासकर इनकम टैक्स में। व्यक्तिगत आयकर में अगर कोई बदलाव हुआ भी तो वह मामूली हो सकता है, ताकि मध्यम वर्ग पर बोझ थोड़ा कम हो और खर्च बढ़े। कॉर्पोरेट टैक्स की दरें भी बदले बिना रखी जा सकती हैं। सरकार का फोकस टैक्स पालन बेहतर करने और डिजिटाइजेशन व डेटा के जरिए टैक्स दायरा बढ़ाने पर रहेगा।

नौकरी सृजन पर खास ध्यान होगा। श्रम-गहन निर्माण, कौशल विकास और अप्रेंटिसशिप से जुड़े प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं। MSME, जो ऊंची इनपुट लागत और सख्त क्रेडिट से दबे हैं, के लिए ज्यादा आवंटन या क्रेडिट गारंटी सपोर्ट मिल सकता है।

उत्पादन-जुड़े प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं में सुधार हो सकता है, क्योंकि सरकार उनके निर्माण क्षमता, निर्यात और रोजगार पर प्रभाव का मूल्यांकन कर रही है।

हरित ऊर्जा और राजनीतिक संकेत

भारत अपनी ऊर्जा लक्ष्यों को आगे बढ़ा रहा है, इसलिए बजट में नवीकरणीय ऊर्जा, हरी हाइड्रोजन, बैटरी स्टोरेज और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को मजबूत समर्थन मिलेगा। स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों के घरेलू निर्माण को बढ़ावा और आयात निर्भरता कम करने के कदम उठाए जा सकते हैं।

साथ ही तेल और गैस बुनियादी ढांचे और रणनीतिक भंडारों के लिए आवंटन बरकरार रखा जाएगा ताकि वैश्विक अस्थिरता में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो।

हालांकि ये चुनावी साल नहीं है, लेकिन बजट में राजनीतिक संकेत होंगे, खासकर महत्वपूर्ण राज्य चुनावों से पहले। कल्याण व्यय और वित्तीय सावधानी का संतुलन बनाना मुश्किल होगा, खासकर ग्रामीण समर्थन और लक्षित सब्सिडी की मांगों के बीच।

एक्सपर्ट के मुताबिक, कुल मिलाकर, वित्त वर्ष 2027 का बजट पुराने रास्ते पर ही आगे बढ़ने का संकेत देगा, लंबी अवधि की विकास योजनाओं को मजबूत करेगा और तात्कालिक आर्थिक चुनौतियों से निपटने की कोशिश करेगा। बाजारों की नजर इस बात पर होगी कि भारत तेज विकास की रफ्तार को आर्थिक स्थिरता बनाए रखते हुए कायम रख पाता है या नहीं।

(PTI के इनपुट के साथ)

First Published - January 31, 2026 | 9:03 PM IST

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