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लेखक : शेखर गुप्ता

आज का अखबार, लेख

विपक्षी एकता की राह और कड़वी हकीकत

जब भी बहुमत प्राप्त कोई सरकार सत्ता पर पूरी दृढ़ता से काबिज हो और किसी एक नेता द्वारा उसे हरा पाने का विचार मु​श्किल नजर आ रहा हो तो ‘विपक्षी एकता’ का विचार वापस आ जाता है। हमें यह समझना होगा कि आ​खिर क्यों यह एक फर्जी, हार का मुंह देखने वाला और बार-बार विफल […]

आज का अखबार, लेख

भाजपा की चार दशक की विकास यात्रा

भाजपा के जन्मदिन को पार्टी के व​रिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी उसका पुनर्जन्म दिन कहना पसंद करते हैं क्योंकि उसका जन्म सन 1980 में ईस्टर के सप्ताहांत पर हुआ था। उसके 43वें जन्मदिन के अवसर पर काफी कुछ लिखा गया। इस बीच पार्टी की दूसरी बार बनी सरकार अपने कार्यकाल के आ​खिरी वर्ष में प्रवेश कर […]

आज का अखबार, लेख

राष्ट्र की बात शेखर गुप्ता : सुधारात्मक से दंडात्मक हो रही न्यायपालिका

पिछले दिनों न्यायालयों के दो विरोधाभासी निर्णय आए जिन्होंने एक असहज करने वाला प्रश्न उठाया: क्या निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक हमारी न्यायपालिका सुधारवादी संस्था से दंड देने वाली संस्था में बदल रही है। यहां बहस के लिए एक ​स्थिति प्रस्तुत है: बीते 15 वर्षों के दौरान हमारी न्यायपालिका यानी निचली अदालतों से […]

आज का अखबार, लेख

सिखों की नाराजगी की चार प्रमुख वजह

पंजाब में आज के माहौल और 1980 के दशक में संकट की शुरुआत के समय के माहौल में दो समानताएं हैं। पहली समानता अच्छी है। अगर आप पंजाब में यूं ही घूमते हुए अनजान सिखों से पूछें कि क्या वह भारत से अलग खालिस्तान नामक देश चाहते हैं तो ज्यादा संभावना यही है कि ज्यादातर […]

आज का अखबार, लेख

सांठगांठ के दौर में भी वै​श्विक ब्रांड का अभाव

अदाणी विवाद ने हमारा ध्यान देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के कई संबद्ध पहलुओं की ओर खींचा है। इनमें से पहला सबसे अहम और तात्कालिक है: विपक्ष का सांठगांठ का आरोप। जब हम इसके विस्तार में जाते हैं तो यह एक विस्तृत थीम बन जाती है जिसमें कारोबारी जगत की शीर्ष चार या पांच कंपनियां शामिल […]

आज का अखबार, लेख

दोस्तों और दुश्मनों की पहेली में उलझा भारत

आज विश्व में भारत के साझेदार, मित्र या शत्रु अथवा प्रतिद्वंद्वी कौन हैं? चीन और पाकिस्तान तो जाहिर प्रतिद्वंद्वी हैं लेकिन मित्रों या साझेदारों की तलाश करना मुश्किल है। इसके बाद हम प्रतिद्वंद्वियों के मित्रों या मित्रों के प्रतिस्पर्धियों को लेकर वाकई उलझन में पड़ जाते हैं। यह स्थिति तब अधिक बनती है जब हमारा […]

आज का अखबार, लेख

भाजपा और पूर्वोत्तर में बदलाव की कथा

पूर्वोत्तर में हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत का जश्न मनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस पूरे क्षेत्र में आए नाटकीय बदलाव की सराहना की। इस बात पर बहस हो सकती है कि इसका किसे कितना श्रेय जाना चाहिए लेकिन वास्तव में यह भारत की सफलता की सच्ची दास्तान है। […]

आज का अखबार, लेख

राष्ट्र की बात : नेल्ली नरसंहार का ठोस प्रमाण

एक पुलिसकर्मी का वायरलेस संदेश 3,000 लोगों की जान बचा सकता था लेकिन उसकी न केवल अनदेखी कर दी गई ब​ल्कि उसे दबा दिया गया। आ​खिर उस वायरलेस संदेश का सच कैसे सामने आया? राष्ट्र की बात असम में 18 फरवरी, 1983 को घटित नेल्ली त्रासदी के करीब तीन महीने बाद ऐसे सबूत उभरे कि […]

आज का अखबार, लेख

नेल्ली नरसंहार की याद दिलाने वाला पखवाड़ा

असम में दशकों पहले जो हुआ, उसके बारे में हम आज क्यों लिख रहे हैं? वह भी इस नियमित स्तंभ में दो आलेखों की श्रृंखला के रूप में? अपने अनुभव और दूसरे मसौदे की शैली में यदाकदा लिखने की शुरुआत मैंने 2013 के मध्य में सुजीत सरकार की फिल्म मद्रास कैफे से प्रेरित होकर की […]

आज का अखबार, लेख

भारतीय पूंजीवाद के लिए परीक्षा की अहम घड़ी

इस सप्ताह का हमारा आलेख गौतम अदाणी के बारे में नहीं है। यह भारतीय पूंजीवाद के बारे में है। यह अवसर आजाद भारत के इतिहास में भारतीय पूंजीवाद की सबसे कठिन परीक्षा की घड़ी है। ब​ल्कि कहें तो सन 1991 के बाद यह पहला मौका है जब उसे इतनी कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ रहा […]

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