भारत के परिवारों का कर्ज मार्च 2025 के आखिर तक बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 41.3 प्रतिशत पर पहुंच गया है। यह अपने 5 साल के औसत 38.3 प्रतिशत से लगातार बढ़ रहा है। परिवारों के कर्ज में हुई वृद्धि में खपत से जुड़े कर्ज ने अहम भूमिका निभाई है।
बहरहाल रिजर्व बैंक ने वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि ज्यादातर उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं (ईएमई) की तुलना में भारत के परिवारों के ऊपर कर्ज कम बना हुआ है।
परिवारों की उधारी की व्यापक श्रेणियों में गैर आवास खुदरा ऋण ज्यादातर उपभोग के मकसद से बढ़ा है और यह प्रमुख सेग्मेंट बना हुआ है। सितंबर 2025 तक वित्तीय संस्थाओं से परिवारों की कुल उधारी में इसकी हिस्सेदारी 55.3 प्रतिशत है। इसकी हिस्सेदारी पिछले 5 साल में बढ़ी है। इसकी वृद्धि दर लगातार आवास ऋण, कृषि और बिजनेस लोन को पीछे छोड़ रही है।
रिजर्व बैंक का कहना है कि अगर परिवारों की उधारी के विभिन्न मदों को अलग करें तो पता चलता है कि खपत के मकसद से लिए गए कर्ज का हिस्सा प्रमुख है, उसके बाद संपत्ति सृजन और उत्पादक मकसद का स्थान आता है।
सितंबर 2025 के अंत में खपत के मकसद से लिए गए कर्ज में 22.3 प्रतिशत हिस्सा पर्सनल लोन का है। परिवारों की कुल उधारी में आवास ऋण की हिस्सेदारी 28.6 प्रतिशत है। वहीं कृषि और बिजनेस लोन की हिस्सेदारी शेष 16.1 प्रतिशत है।
समय बीतने के साथ गैर आवास खुदरा ऋण तेजी से बढ़ रहा है। इससे खपत पर आधारित बढ़ते ऋण का पता चलता है, जिसमें पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड, वाहन ऋण, उपभोक्ता वस्तुओं के लिए ऋण शामिल है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ परिवारों की वित्तीय बचत वित्त वर्ष 25 की चौथी तिमाही में सुधर कर जीडीपी का 7.6 प्रतिशत हो गई है।