भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकों को सूचीबद्ध और असूचीबद्ध कंपनियों के अधिग्रहण के लिए ऋण मुहैया कराने की इजाजत दे दी है। मगर ऋण की सीमा कुल मूल्य की 75 फीसदी तय की गई है।
अधिग्रहण के लिए कर्ज देने पर जारी अंतिम नियम में बैंकिंग नियामक ने कहा कि बैंकों को ऐसे निवेश को ऋण सुविधा देनी चाहिए जिसमें लंबी अवधि में अधिग्रहण करने वाली कंपनी के लिए मूल्य सृजित करने की क्षमता हो। केवल अल्पावधि के लाभ या वित्तीय पुनर्गठन के मकसद से ऐसा नहीं करना चाहिए।
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बैंक अधिग्रहणकर्ता की एनबीएफसी इकाई या विशेष मकसद वाली इकाई (एसपीवी) के अधिग्रहण के लिए भी धन दे सकते हैं। नियमों के मुताबिक खरीदने वाली कंपनी सूचीबद्ध हो या असूचीबद्ध, उसकी नेटवर्थ कम से कम 500 करोड़ रुपये होनी चाहिए और उसे बीते तीन वित्त वर्ष में लगातार कर बाद मुनाफा हुआ हो। असूचीबद्ध कंपनियों की निवेश ग्रेड रेटिंग बीबीबी- या उससे ऊपर होनी चाहिए। अधिग्रहण खरीद करार की तारीख से 12 महीने के अंदर पूरा हो जाना चाहिए।
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अंतिम नियमों में उस मसौदा प्रस्ताव को हटा दिया गया कि जिसमें कहा गया था कि अधिग्रहण के लिए कर्ज के मामले में बैंक का कुल निवेश उसकी टियर 1 पूंजी के 10 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
अगर अधिग्रहण करने वाली कंपनी के पास लक्षित कंपनी को खरीदने के लिए कर्ज लेने से पहले ही नियंत्रण हो तो पैसे अतिरिक्त शेयर खरीदने के लिए ही दिए जाने चाहिए। आरबीआई ने कहा कि अधिग्रहण करने वाली कंपनी और लक्षित कंपनी में सीधे तौर पर कोई संबंध नहीं हो।