मणिपुर के उखरुल जिले के लगभग 2,200 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में करीब 1,40,000 लोग रहते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, जिले की साक्षरता दर 81 फीसदी है, लेकिन बेरोजगारी 60 फीसदी से अधिक है। कृषि योग्य भूमि कुल क्षेत्रफल का केवल 2.1 फीसदी है, लेकिन 70 फीसदी आबादी खेती से गुजर-बसर करती है। परिणामस्वरूप, भूमि के हर इंच पर कड़ी नजर रखी जाती है और उसको लेकर हिंसात्मक टकराव होता रहता है।
उखरुल भारत के सबसे अशांत जिलों में से एक है, जहां तंगखुल नागाओं का वर्चस्व है, लेकिन कुकी-जो जनजाति एक मुखर अल्पसंख्यक समूह है, उसे पड़ोसी म्यांमार से कई तरह की मदद के अलावा आर्थिक सहायता मिलती है। इस सप्ताह की शुरुआत में कुकी-जो और नागाओं के बीच हुई गोलीबारी से उखरुल में हिंसा भड़क उठी और पड़ोसी चुराचांदपुर तक फैल गई। यह झड़प उन सभी जनजातीय और सामाजिक-सांस्कृतिक विभाजनों का एक छोटा सा हिस्सा है, जिनका समाधान मणिपुर के नए मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह को करना होगा।
दिल्ली से हम इस समस्या पर केवल निरर्थक बहस ही कर सकते हैं। फरवरी 2025 से लागू राष्ट्रपति शासन की समाप्ति से कुछ घंटे पहले ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों ने दिल्ली (इम्फाल नहीं) में सिंह को अपना नेता चुना। राज्य की लगभग 53 फीसदी आबादी वाले हिंदू समुदाय मैतेई से मुख्यमंत्री बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।
हालांकि, कुकी-जो और नागा जनजातियों के एक-एक प्रतिनिधि को भी उपमुख्यमंत्री के रूप में सरकार में शामिल किया गया, जो सामुदायिक सुलह और सकारात्मक छवि का संकेत था। लेकिन यह घटनाक्रम कुछ हद तक तब फीका पड़ गया जब उनमें से एक, मंत्री पद का अनुभव रखने वाली प्रमुख कुकी नेता नेमचा किपगेन ने अपनी सुरक्षा को लेकर आशंका जताते हुए इम्फाल जाने के बजाय दिल्ली के मणिपुर भवन से वर्चुअल रूप से शपथ ग्रहण करना बेहतर समझा।
कुकी-जो समुदाय के दो विधायकों-चुराचांदपुर के विधायक एलएम खौटे और तिपाईमुख के विधायक न्गुरसंगलुर सनाते ने भी वर्चुअल रूप से सरकार का समर्थन किया। मणिपुर विधान सभा के 60 सदस्यों में से चुने गए 10 कुकी विधायकों में से कोई भी मई 2023 के बाद से इम्फाल नहीं गया है, जबकि मैतेई समुदाय के लोग पहाड़ी इलाके में जाने से परहेज करते हैं। कुकी संगठनों ने सार्वजनिक रूप से अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ सहयोग न करने की प्रतिज्ञा की है और उन्हें चेतावनी जारी की है।
मणिपुर में हिंसा भड़कने के लिए छोटी-छोटी बातें भी काफी होती हैं। हिंसा का ताजा दौर मार्च 2023 में उच्च न्यायालय के एक आदेश के कारण शुरू हुआ, जिसमें राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने पर विचार करने को कहा गया था। अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल जाने पर मैतेई समुदाय को कुकी और नागा बहुल पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन खरीदने का अधिकार मिल जाता। हालांकि, बाद में इस आदेश में संशोधन कर दिया गया। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए और राज्य के भीतर लोगों का विस्थापन हुआ। मणिपुर में विभिन्न समुदायों के लगभग 40,000 विस्थापित लोग शिविरों में रह रहे हैं। मूल मुद्दा कि क्या मैतेई समुदाय अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त कर सकता है, अभी तक तय नहीं हुआ है क्योंकि राज्य सरकार को अभी भी केंद्र सरकार को इस पर अपनी राय देनी बाकी है।
दो सवाल उठते हैं: युमनाम खेमचंद सिंह ही क्यों और अभी क्यों?
खेमचंद सिंह को आरएसएस से लंबे समय से जुड़े एक तटस्थ और विवादरहित भाजपा नेता के रूप में देखा जाता है। वह सिंगजामेई निर्वाचन क्षेत्र से दो बार 2017 और 2022 में विधायक रह चुके हैं। वर्ष 2022 तक वह विधान सभा अध्यक्ष रहे और बाद में 2025 तक बीरेन सिंह सरकार में मंत्री रहे। उन्होंने पिछले साल दिसंबर में कुकी विस्थापितों के शिविर का दौरा किया और इस सप्ताह की शुरुआत में मैतेई लोगों के शिविर में गए।
हालांकि, मणिपुर के समाज और राजनीति की जटिलता दिखावे और निष्पक्षता से कहीं अधिक है। म्यांमार में हाल ही में चुनाव संपन्न हुए हैं, जिसमें सैन्य समर्थित राजनीतिक दल का सत्ता में आना अपेक्षित था। लेकिन देश के विशाल भूभाग, जिनमें मणिपुर से सटी सीमा पर स्थित सागाइंग प्रांत के कुछ हिस्से भी शामिल हैं, सैन्य सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं। म्यांमार की उथल-पुथल अब उसकी सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। केंद्र सरकार का मानना है कि मणिपुर में निर्वाचित सरकार सीमा पर व्याप्त अशांति से उत्पन्न राजनीतिक मुद्दों से बेहतर ढंग से निपट सकेगी।
मणिपुर, विशेष रूप से उखरुल राष्ट्रीय समाजवादी परिषद ऑफ नागालैंड (एनएससीएन) का गढ़ है, जिसके साथ केंद्र सरकार लंबे समय से संयुक्त नागालैंड की मांग को लेकर बातचीत करती रही है। इस बीच, हालांकि सरकार ने एनएससीएन के सर्वोच्च नेता मुइवा के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन हाल ही में उसने पूर्वी नागालैंड पीपल्स ऑर्गनाइजेशन (ईएनपीओ) के साथ नागालैंड के पूर्वी हिस्सों में एक स्वायत्त प्राधिकरण बनाने की दिशा में काम करने के लिए एक समझौते की घोषणा की है। इससे नागालैंड को एकजुट करने के एनएससीएन के लक्ष्य को झटका लगा है और मणिपुर में नागाओं की अशांति को बढ़ावा मिला है।
खेमचंद सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां हैं कानून-व्यवस्था बहाल करना, विशेषकर हथियारों की बेरोकटोक आवाजाही को रोकना, बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने के लिए बुनियादी ढांचागत विकास करना और उन संस्थानों में विश्वास बहाल करना जिनका उद्देश्य लोगों को सुरक्षित महसूस कराना है। कई सवाल अभी भी बने हुए हैं।