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सुरक्षा मानकों की लागत और लाभ

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स्वच्छ पानी, हवा और भोजन की उपलब्धता भी सुनि​श्चित की जानी चाहिए। हमें प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए भी ठोस सुरक्षा उपाय करने की आवश्यकता है।

Last Updated- December 20, 2023 | 9:38 PM IST
Kerala rain

हाल में चक्रवाती तूफान मिगजॉम से तमिलनाडु में हर तरफ तबाही का मंजर नजर आ रहा था। उधर उत्तराखंड के सिलक्यारा में निर्माणाधीन सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को 17 दिन तक कड़ी मेहनत से सकुशल निकाल लिया गया था। उत्तराखंड का यह सुखद बचाव अ​भियान भारत में अपवाद की तरह है।

सुरक्षा मानकों में कमी हर तरफ दिखाई देती है और भारतीय व्यवस्था में यह पैठ बना चुकी है। निर्माण गतिवि​धियों, परिवहन व्यवस्था, कार्य स्थलों, साफ-सफाई के कार्यों, सार्वजनिक स्थलों, पर्यटन क्षेत्र, अस्पतालों और शैक्षिणक संस्थानों आदि में सुरक्षा इंतजाम बढ़ाने की सख्त जरूरत है।

इसके अलावा, स्वच्छ पानी, हवा और भोजन की उपलब्धता भी सुनि​श्चित की जानी चाहिए। हमें प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए भी ठोस सुरक्षा उपाय करने की आवश्यकता है।

देश के नागरिकों को आवारा कुत्तों, रोडरेज की घटनाओं, गैस लीक हादसों, भगदड़, जहरीली शराब, जलभराव, धोखाधड़ी, यौन उत्पीड़न, दुष्कर्म, सड़क किनारे खुले पड़े बिजली के पैनल, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, अतिक्रमण और कर्ज धोखाधड़ी जैसे आज के दौर में आम हो चुके परेशान करने वाले कारकों से बचाव के उपाय करने ही होंगे।

दरअसल, उच्च सुरक्षा मानक लागू करने में लागत आती है। खासकर घरेलू, फर्म या सार्वजनिक व्यवस्था आदि के स्तर पर यह थोड़ा समस्याप्रद होता है। सूक्ष्म अर्थव्यवस्था के स्तर पर यह सच है, लेकिन व्यापक आ​र्थिक स्तर पर यह एक अवसर है। उसी पर यहां ध्यान केंद्रित करेंगे।

यह कुछ विषयांतर सा लगेगा, फिर भी इस पर गौर कर सकते हैं कि भारत में अलग-अलग तरीकों और कारणों से श्रम, भूमि और पूंजी का कम उपयोग किया जाता है। कम उपयोग से मतलब यह है कि उसमें मांग बढ़ने पर अ​धिक उत्पादन की क्षमता होती है। हालांकि यह देखा गया है कि सामान्य विस्तारवादी मौद्रिक नीति या राजकोषीय नीति यहां उपयोगी नहीं है, क्योंकि यह काफी महंगी साबित होती है। यहीं पर मानसिकता बदलने की जरूरत है कि एक उत्प्रेरक बहुत अलग रूप ले सकता है; ये उच्च सुरक्षा मानक हो सकते हैं!

यह सच है कि जब कोई संस्थान सुरक्षा पर अ​धिक खर्च करता है तो वह दूसरी मदों में कटौती कर देता है। यह लगातार बढ़ती मांग की ओर इशारा कर सकता है। हालांकि प्रस्तावित नीति में सुरक्षा उद्योग के उत्पादन की बढ़ती मांग किसी भी समय स्थिर अथवा पर्याप्त हो सकती है।

दूसरी ओर, ​भिन्न-​भिन्न लोग दूसरे उत्पादों में प्रत्येक के लिए थोड़ी-थोड़ी कटौती करेंगे। नतीजतन, कई उद्योगों के उत्पादन में थोड़ी सी कटौती से रोजगार पर बामु​श्किल असर पड़ता है। हां, प्राथमिक तौर पर लाभ प्रभावित हो सकता है, लेकिन सुरक्षा उद्योग में नई नौकरियां उत्पन्न होती हैं और बड़े स्तर पर लाभ बढ़ता है। कुल मिलाकर इसका फायदा हो सकता है। यह केवल खर्चों को इधर-उधर करना नहीं है, इसे उपयोग में न लाए जा सके संसाधनों का सदुपयोग कह सकते हैं।

मुद्दा यह नहीं है कि विशेष सुरक्षा पहलू पर अ​तिरिक्त खर्च का प्रभाव कई गुणा बढ़ सकता है। इसे ऐसे कह सकते हैं कि जब व्यापक सुरक्षा सुविधाओं पर खर्च बढ़ता है तो समग्र रूप से इसका पर्याप्त असर दिख सकता है। कारोबार का टर्नओवर और पूंजी का वेग भी बढ़ सकता है। उच्च सुरक्षा मानक असंतुलन पैदा करते हैं, जो व्यापक आ​र्थिक गतिवि​धियों के अनुकूल हो सकते हैं। आगे-पीछे की चीजों को जोड़ते हुए देखें तो आ​र्थिक वृद्धि और तेज हो सकती है।

य​द्यपि सुरक्षा मानकों में लगातार परिवर्तन किए जाने की जरूरत है। यह एक नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए। इस प्रकार अलग-अलग क्षेत्रों की जरूरतों को एक-एक कर पूरा करने की आवश्यकता है और आ​र्थिक सुधारों के महत्त्व को अच्छी तरह प्रचारित करने और लगातार इनकी स्वीकृति बढ़ाने की आवश्यकता है।

बेशक, प्रस्तावित नीति में कुछ अड़चनें आ सकती हैं। लागत को लेकर भी कुछ दबाव बढ़ सकता है, लेकिन मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के तहत इससे निपटा जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2 प्रतिशत अंकों की बड़ी छूट के साथ 4 प्रतिशत का उच्च मुद्रास्फीति लक्ष्य रखा है। यह देखते हुए कि लाभार्थी उन लोगों से भिन्न हो सकते हैं, जो सुधारों का खमियाजा भुगतते हैं, हम उच्च सुरक्षा मानकों के कारण अल्पावधि में मामूली पुनर्वितरण कर सकते हैं।

हालांकि, हमें लाभार्थियों द्वारा आमदनी बढ़ाने और उसके बाद खर्च बढ़ाने की भी अनुमति देने की आवश्यकता है। यह खर्च बाद में उन लोगों को फायदा पहुंचा सकता है, जिन्हें शुरुआती दौर में आर्थिक नुकसान हुआ था।

कुल मिलाकर, उच्च सुरक्षा मानक अपनाने से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और आर्थिक कल्याण में वृद्धि हो सकती है, जो सुरक्षा के मौजूदा स्तर से कहीं अधिक हो सकती है। यहां मुख्य विश्लेषण एओ हर्शमैन, जेएम कीन्स, वीकेआरवी राव, पॉल रोमर जैसे कई अन्य अर्थशास्त्रियों के कार्यों से भिन्न है, हालांकि प्रत्येक मामले में अलग-अलग कारणों से यह उनके अनुरूप है।

नतीजा यह है कि यदि सार्वजनिक प्राधिकरण सावधानीपूर्वक सुरक्षा मानकों में इजाफा करते हैं, तो जनता कहीं अधिक सुरक्षित होगी और जीडीपी भी थोड़ी तेज गति से बढ़ सकती है।

(लेखक स्वतंत्र अर्थशास्त्री हैं। उन्होंने अशोक यूनिवर्सिटी, आईएसआई दिल्ली और जेएनयू में अध्यापन किया है)

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First Published - December 20, 2023 | 9:31 PM IST

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