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ओली और प्रचंड की खींचतान में उलझी नेपाल की राजनीति

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  December 25, 2020

प्रबंधन से जुड़ी नियमावलियां कहती हैं कि विलय और अधिग्रहण को कभी हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में न केवल दो कंपनियों को एक बड़े कॉर्पोरेट मिशन के अधीन एकजुट होने को कहा जाता है बल्कि अलग-अलग व्यक्तित्व वाले लोगों के बड़े समूह, महत्त्वाकांक्षाएं, व्यवहारगत लक्षण और कामकाज के तरीकों को भी एकजुट किया जाता है। प्रबंधन के नियम चेतावनी देते हैं कि बिना स्पष्ट नीति, प्रभावी परियोजना प्रबंधन और अंशधारक समूहों के बीच मुक्त संवाद के, विलय या अधिग्रहण शायद वांछित परिणाम न दे सके। यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और हकीकत के करीब होनी चाहिए। यदि सफलता हासिल करनी है तो इसमें प्रबंधन के सभी क्षेत्रों को शामिल किया जाना चाहिए। इसमें विफलता की दर 90 फीसदी है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत माओवादी लेनिनवादी) तथा नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) का दो वर्ष पहले हुआ विलय 90 फीसदी की श्रेणी में आता है।

 
ऐसा बहुत कम ही होता है जब सदन में दो तिहाई बहुमत वाले प्रधानमंत्री सदन को भंग कर नए चुनावों की अनुशंसा करते हों। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के समर्थकों का कहना है कि उन्हें ऐसा करना पड़ा। विलय की गई पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पुष्प कमल दहल के अनुयायियों का कहना है कि ओली सत्ता पाकर अंधे हो गए थे और उन्हें लग रहा था कि उन्होंने अकेले ही पार्टी को जीत दिलाई है और इसमें किसी और की कोई भूमिका नहीं थी। सच्चाई शायद इन दोनों बातों के बीच में है।
 
सन 2018 में जब दोनों दलों का विलय हुआ तब यह समझौता हुआ था कि ओली और दहल दोनों ढाई-ढाई साल के लिए प्रधानमंत्री बनेंगे। इस वर्ष के आरंभ में जब ओली द्वारा सत्ता छोडऩे का वक्तआया तब उन्होंने इससे इनकार कर दिया और किसी और के बजाय स्वयं प्रधानमंत्री बने रहने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्हें एक मुद्दे की आवश्यकता थी। भारत ने उन्हें उस समय मुद्दा दे दिया जब रक्षा मंत्री राजनाथ ङ्क्षसह ने लिपुलेख तक जाने वाली एक सड़क का लोकार्पण करके क्षेत्रीय विवाद को जन्म दे दिया। यह दिलचस्प था। नेपाली राष्ट्रवाद वर्गहीन समाज के लक्ष्य को हाशिये पर धकेल रहा था और इसके साथ ही रास्ते में आने वाली हर चीज को भी। भारत देखता रहा और ओली गलती पर गलती करते गए। पहले उन्होंने दावा किया कि राम का जन्मस्थान दरअसल नेपाल के बीरगंज स्थित अयोध्या में है। इसके बाद उन्होंने संसद से नेपाल का एक नया मानचित्र जारी कराया जिसमें विवादित इलाकों को नेपाल का हिस्सा बताया गया। धीरे-धीरे भारत के लिए ओली की हरकतों को स्वीकार करना मुश्किल से मुश्किल होता गया। 
 
परंतु ओली के लिए एक समस्या थी। पार्टी की लगाम अभी भी प्रचंड के हाथ में थी। इसके अलावा अन्य सहयोगी मसलन पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल और झालनाथ खनल भी अपनी चाल चल रहे थे। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने शांति स्थापना के लिए दखल दिया और दोनों समूहों के समायोजन के लिए नए संस्थान बनाए। ऐसा अंतिम प्रयास नवंबर 2019 में किया गया लेकिन कामयाबी नहीं हाथ लगी। ओली ने उन्हें निष्क्रिय करने का प्रयास और वह चीन की ओर झुके। ओली में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी)को एक उपयोगी सहयोगी और अधीन रहने वाला मिल गया। उनके कार्यकाल के दौरान सीसीपी और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने रिश्तों को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया। राजनीतिक और सैन्य प्रतिनिधिमंडल एक दूसरे के साथ कार्यक्रमों का आदान प्रदान बढ़ा रहे हैं और गत वर्ष हवाई मार्ग से नेपाल आने वाले चीनी पर्यटकों ने विमान से नेपाल पहुंचने वाले भारतीय पर्यटकों को भी पछाड़ दिया।
 
राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने हाल ही में नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से बात की और विदेश मंत्री वांग यी ने महामारी के प्रबंधन को लेकर नेपाल के साथ दो आभासी बैठक कीं। नेपाल को की जाने वाली सहायता और निवेश के मामले में भी चीन भारत को पीछे छोड़ चुका है। परंतु नेपाल में एक किस्म का राष्ट्रीय भय है कि उसे खरीद लिया जाएगा और उसे अपनी संप्रभुता त्यागने के लिए मजबूर किया जाएगा। नेपाल एक ऐसा देश है जिसे कोई साम्राज्यवादी ताकत अपना उपनिवेश नहीं बना सकी। प्रचंड का पार्टी के बड़े हिस्से पर दबदबा है (और शायद भारत से भी उन्हें कुछ रचनात्मक सहयोग हासिल है)। उन्होंने 170 में से 91 सांसदों के समर्थन के साथ संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने और ओली की जगह स्वयं को बतौर प्रधानमंत्री और संसदीय दल के नए नेता के रूप में पेश करने की धमकी दी। यह हो पाता उससे पहले ही ओली ने संसद भंग कर दी और नए चुनावों की घोषणा कर दी। हालांकि नेपाल के संविधान में इसका कोई प्रावधान नहीं है। नेपाल के महाराजा द्वारा संसद भंग करने की सामूहिक राष्ट्रीय स्मृति ने संविधान निर्माताओं को मजबूर किया होगा कि वे ऐसे प्रावधान करें ताकि कोई सांविधानिक तख्तापलट न हो और वैध तरीके से निर्वाचित सरकार को पद से न हटाया जाए। परंतु ओली ने एकदम यही किया है। 
 
यह अनुमान लगाना कठिन है कि अब क्या होगा। नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में ऐसी दर्जनों याचिका दायर की गई हैं जिनमें ओली के कदम को चुनौती दी गई है। देश का मिजाज अस्थिर है। बतौर प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान ओली ने कई को नाराज किया लेकिन उन्होंने कई लोगों को उपकृत भी किया। अभी यह निर्णय भी होना है कि नेपाल की असली कम्युनिस्ट पार्टी कौन सी है। पार्टी में विभाजन अब बस औपचारिक रह गया है। चूंकि भारत और चीन दोनों की नेपाल में गहरी रुचि है इसलिए अब उसके वही बनने का खतरा उत्पन्न हो गया है जो वह कभी नहीं बनना चाहता था: एक नाकाम विलय के बाद एक ऐसा लोकतंत्र बनना जो दूसरों से निर्देशित हो।
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