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कोविड कंट्रोल रूम में पूछे जा रहे हैं ट्रेन से लेकर अस्पताल से जुड़े सवाल

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Last Updated- December 15, 2022 | 8:20 PM IST

सुबह के 11 बजने वाले हैं और अंजना शर्मा चार घंटे से लगातार अपनी डेस्क पर लैंडलाइन फोन पर बात में लगी हुई हैं। 35 वर्षीय अंजना रोजाना जल्दीबाजी में अपना नाश्ता तैयार कर और लोगों के साथ कार साझा कर सुबह सात बजे कोविड कंट्रोल रूम में पहुंचती है।
उस वक्त से ही वह 50-70 कॉल लेती हैं जो परेशानी में फंसे लोगों की तरफ से की जाती है। उनकी पाली 1 बजे खत्म हो जाती है। उनकी पांच अन्य सहयोगी हैं जो सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग में नर्सिंग अधिकारी हैं और कड़कडड़ूमा कोर्ट के पास मौजूद दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवा निदेशालय के मुख्यालय के प्रवेश द्वार पर मौजूद इस छोटे कमरे में काम करती हैं जिसे अच्छी तरह सैनिटाइज किया जाता है।
एक दूसरा नियंत्रण कक्ष भी है जो भूतल पर ही और उसे भी नियमित रूप से कीटाणुरहित बनाने की कोशिश की जाती है। यहां भी लगभग समान तरह का दृश्य दिखता है। पांच से छह अधिकारी लगातार 10 एमटीएनएल नंबरों पर बात कर रहे होते हैं और डायरी तथा रजिस्टरों में विवरण को नोट करते रहते हैं। यहां दिन और रात तीन पालियों में काम हो रहा होता है।
केंद्र पर मौजूद एक टीम लीडर अनीता पवार ने बताया, ‘दो महीने से ज्यादा समय से यहां फोन बजना बंद नहीं हुआ है। शुरुआती दिनों के दौरान रात की पाली के दौरान अपेक्षाकृत कम कॉल आती थीं जब कोरोनावायरस का नाम लेना लोग घर में शुरू ही कर रहे थे। लेकिन अब  दिन और रात समान रूप से व्यस्त रहना पड़ता है क्योंकि संक्रमण के मामलों में तेजी आई है जिसकी वजह से कॉल भी ज्यादा आती है। लोग कॉल करके कोविड के लक्षणों के बारे में पूछने से लेकर अस्पताल जाने, ट्रेन की बुकिंग से जुड़े सवाल भी करते हैं। यह केंद्र दिल्ली के जिलों के अंतर्गत आने वाले इलाके में कोविड से जुड़ी जानकारी देने के लिए बनाया गया है लेकिन यहां उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के लोग भी कॉल कर रहे हैं।’
लोगों के सवाल भी अब स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों से अलग हो रहे हैं। डीएचएस मुख्यालय में कोविड कंट्रोल रूम के प्रमुख डॉ बी एस चरण के अनुसार वहां भूटान के एक कॉलर ने काम किया जिसकी शिकायत यह थी कि भारतीय कामगारों के एक समूह को कंपनी बकाया राशि का भुगतान नहीं कर रही है। हालांकि दूसरे देश से जुड़े जटिल श्रम मुद्दे को हल करने के लिए राजनयिक चैनलों के जरिये अपनी समस्या बतानी पड़ती है।                           
आंकड़ों से हालात का अंदाजा मिलता है। 25 मार्च से लेकर जब नियंत्रण केंद्र 28 मई को औपचारिक तौर पर स्थापित हो गया तब से लेकर अब तक लगभग 70,000 कॉल आ चुकी हैं। मार्च में सात दिनों तक 6,185 कॉल आईं जो अप्रैल में बढ़कर 27, 101 हो गईं और मई में यह संख्या 40,000 के करीब रही। 
यहां मौजूद कर्मचारियों को बताया गया है कि उन्हें कॉल करने वालों को लैब टेस्ट की प्रक्रियाओं, अस्पताल नेटवर्कों, रोग के लक्षणों, कोविड से जुड़े विभिन्न मामलों में क्वारंटीन के नियमों के बारे में जानकारी देना है। लेकिन पवार ने कहा, ‘हम मदद देने की कोशिश करते हैं, भले ही उनके सवाल का सीधा संबंध कोरोनावायरस बीमारी से न हो। लंबे समय तक बिना किसी ब्रेक के कॉल लेने से जो लोग यहां दूसरों की समस्याओं को हल करने के लिए बैठे हैं वे खुद ही तनाव में आ जाते हैं।’ वह अपने तनाव को कम करने के लिए हंसते हुए कहती हैं, ‘ हम पाली खत्म होने के बाद एक-दूसरे को ही सलाह देते हैं।’
हाल ही में 45 वर्षीय संध्या सिंह एक प्रवासी मजदूर राजू से फोन पर बात करते हुए खुद को रोक नहीं पाईं और सिसकने लगी। राजू दिल्ली से उत्तर प्रदेश के गांव में अपने घर पहुंचने की कोशिश में जिस तरह परेशानी झेल रहे थे वह सब सुनकर संध्या बेहद दुखी हो गईं। उनके पैरों में छाले पड़ गए थे और कई दिनों से उन्हें खाना तक नहीं मिला था। उन्होंने एक बोर्ड पर कोविड नियंत्रण कक्ष का नंबर देख कर फोन किया कि उन्हें बस या ट्रेन मिलने की कोई संभावना बन सकती है या नहीं। उन्होंने कई घंटे उसकी समस्या का समाधान खोजने के लिए  अपने इंटरनेट कनेक्शन और मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया।
यहां आमतौर पर रात की पाली में महिलाओं को नहीं लगाया जाता है क्योंकि इस पाली में ज्यादा समय लगता है। अक्सर रात की पाली में काम करने वाले आनंद सिंघल भी पश्चिम बंगाल के एक निवासी को दिल्ली में उनके परिवार से संपर्क कराने में कामयाब रहे जो इलाका हाल ही में आए चक्रवात से प्रभावित था। एमटीएनएल नंबरों पर आउटस्टेशन कॉल के लिए कोई सुविधा नहीं होने की वजह से सिंघल ने भी इस मामले को हल करने के लिए पश्चिम बंगाल में लोगों और अधिकारियों को कई कॉल करने के लिए अपने मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया। हालांकि इस पूरे मामले का कोविड से कोई संबंध नहीं था। यह पहला मौका नहीं है जब यहां कोई कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है। कुछ साल पहले जब दिल्ली में डेंगू का प्रसार हुआ था तब यहां के कंट्रोल रूम में तीन एमटीएनएल लाइनों पर लोगों के सवालों के जवाब दिए जा रहे थे। अब फोन लाइनों की तादाद 10 है, लेकिन वहां कई और फोन लाइनों की जरूरत है। इसके अलावा, यहां के कर्मचारी सिस्टम पर लोड को कम करने के लिए डेटा तक आसान पहुंच बनाने के लिए तकनीक और सॉफ्टवेयर चाहते हैं  जबकि यहां पूरा काम मैनुअल तरीके से किया जा रहा है। एक अधिकारी ने कहा कि टेस्ट रिपोर्ट वाले मरीजों के परिवारों की मदद करने में भी लंबा समय लगता है। कोई भी इसमें होने वाली देरी का कारण नहीं जानता है। 
यहां कोविड सेंटर में कोई खाने-पीने का ब्रेक नहीं मिलता तो क्या काम के अलावा कोई अवकाश की गुंजाइश होती है? डॉ चरण ने बताया, ‘यहां किसी को अवकाश मिलने का कोई सवाल नहीं है क्योंकि हममें से ज्यादातर 24 घंटे काम कर रहे हैं। छुट्टी अब एक सपना हो गया है क्योंकि अभी किसी को नहीं पता है कि कोविड  संकट कब खत्म होगा।’   
(कंट्रोल रूम के कुछ लोगों के नाम उनके आग्रह पर बदल दिए गए हैं)

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First Published - June 2, 2020 | 11:15 PM IST

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