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‘मुफ्त-छूट योजना पर स्पष्टता जरूरी’

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Last Updated- December 11, 2022 | 5:11 PM IST

उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में (26 जुलाई को) केंद्र की तरफ से यह जवाब मांगा कि क्या वित्त आयोग जैसी संस्था, चुनावों से पहले मुफ्त उपहारों, छूट आदि घोषणाओं पर नियंत्रण कर सकती है? अदालत ने केंद्र से यह भी पूछा था कि क्या  राज्यों को किए जाने वाले राजस्व आवंटन की राशि का नियमन हो सकता है या नहीं खासतौर पर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि किसी राज्य ने चुनावों से पहले ‘मुफ्त अनावश्यक’ खर्च किए हैं या नहीं । हालांकि विधि एवं राजकोषीय विशेषज्ञों का कहना है कि शीर्ष अदालत की टिप्पणी बेहद व्यापक दायरे वाली मानी जा सकती है और यह अतिसक्रियता की एक मिसाल है।
इसके अलावा, एक और समस्या है। अभी फिलहाल कोई वित्त आयोग नहीं है, क्योंकि 15वें वित्त आयोग का कार्यकाल समाप्त हो गया है और 16वें वित्त आयोग का गठन किया जाना अभी बाकी है।
पूर्व वित्त सचिव और 15वें वित्त आयोग के सदस्य अजय नारायण झा ने कहा, ‘उच्चतम न्यायालय को यह बताया जाना चाहिए था कि कोई वित्त आयोग अस्तित्व में है या नहीं है। हमारा कार्यकाल 30 अक्टूबर, 2020 को समाप्त हो गया। इसके बाद इसका कोई अस्तित्व नहीं है। जब तक 16वें वित्त आयोग का गठन नहीं होता है तब तक कोई ऐसा आयोग नहीं है जो उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों पर टिप्पणी कर सके।
उच्चतम न्यायालय ने केंद्र से 3 अगस्त को अगली सुनवाई तक जवाब मांगा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण की अध्यक्षता वाले शीर्ष अदालत के पीठ ने चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों की ओर से मुफ्त घोषणाओं और वादे के चलन के खिलाफ एक जनहित याचिका पर सुनवाई की थी। इस याचिका में यह मांग की गई थी कि निर्वाचन आयोग ऐसे दलों के चुनाव चिह्नों को जब्त करने और उनका पंजीकरण रद्द करने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करे ताकि राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव से पहले मुफ्त चीजों के वितरण पर रोक लगे और ऐसा करने वालों की पार्टी के प्रतीक को अयोग्य घोषित किया जाए।
निर्वाचन आयोग ने सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया था कि वह मुफ्त के वादों का नियमन नहीं कर सकता है। इस बीच, केंद्र ने यह कहते हुए निवार्चन आयोग पर जिम्मेदारी डाल दी थी कि हर मामला अलग है और निर्वाचन आयोग को इस तरह के वादों के खिलाफ एक प्रहरी के रूप में काम करना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘इस तरह की मुफ्त योजनाओं या छूट को नियंत्रित किया जाना चाहिए। इसके अलावा यह कैसे किया जा रहा है, इसकी जांच की जानी चाहिए।’ विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के सह-संस्थापक और टीम लीड आलोक प्रसन्ना ने कहा कि फिलहाल मुफ्त की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है। वह कहते हैं, ‘यह विशुद्ध रूप से राजनीति, कल्याणकारी योजनाओं और वित्तीय योजनाओं की चर्चा है। कल्याणकारी योजनाएं उन लोगों के लिए हैं जो उस राज्य में एक राजनीतिक दल को वोट दे रहे हैं और करों का भुगतान कर रहे हैं। ऐसे में ‘मुफ्त या छूट वाली योजनाओं’ की घोषणा में क्या गलत है?’
उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार चाहती है तो उसे स्पष्ट रूप से यह बताने के लिए एक कानून लाने की जरूरत है कि मुफ्त या छूट वाले तोहफे (फ्रीबीज) के रूप में क्या परिभाषित किया जा सकता है और क्या नहीं। उनका कहना है, ‘आर्थिक, समाजशास्त्र तथा सार्वजनिक वित्त विशेषज्ञों को फ्रीबीज शब्द को परिभाषित करने के लिए परामर्श करने की आवश्यकता है और उनमें अदालत शामिल नहीं है।’
उन्होंने कहा कि यह न्यायिक अतिसक्रियता की मिसाल है। वह कहते हैं, ‘पहले स्कूलों में दिए जाने वाले दोपहर के भोजन को भी फ्रीबीज कहा जाता था, लेकिन अब इसे कल्याणकारी योजना मानी जाती है। आज हम जो भी योजनाएं देख रहे हैं, उन्हें पहले भी एक बार ‘फ्रीबीज’ के रूप में खारिज कर दिया गया था।’ एक शीर्ष स्तर के सरकारी अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘आप ‘फ्रीबीज’ को कैसे परिभाषित करते हैं? यह राजनीतिक और नीतिगत क्षेत्रों का मामला है। कोई भी यह तर्क दे सकता है कि राजकोष के लिहाज से यह एक खराब रणनीति है। फ्रीबीज से जुड़े तर्क को राजनीतिक दायरे में लाया जाना चाहिए और इसका फैसला इसमें ही होना चाहिए। लेकिन यह कोई न्यायिक मामला नहीं है।’
जब 15 वें वित्त आयोग का गठन किया गया था तब इसे दिए गए संदर्भ की शर्तों में से एक के तहत ‘लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च करने में नियंत्रण या इसकी कमी’ के आधार पर राज्यों को प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों की सिफारिश की गई थी। 15वें वित्त आयोग ने वर्ष 2021-26 के लिए अपनी रिपोर्ट में कहा था, ‘कई राज्यों ने जोर देकर कहा कि लोकलुभावन और गैर-लोकलुभावन योजनाओं का वर्गीकरण निष्पक्ष रूप से नहीं किया जा सकता है क्योंकि विकास की आवश्यकताएं एक राज्य से दूसरे राज्य से अलग होती हैं। इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि निर्वाचित संप्रभु सरकारें राज्य के लोगों के प्रति जवाबदेह हैं और वित्त आयोग के बजाय उन्हें कल्याणकारी योजनाएं तय करने का विशेषाधिकार होना चाहिए।’

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First Published - August 1, 2022 | 12:04 AM IST

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