सर्वोच्च न्यायालय ने 20 नवंबर के अपने उस निर्णय पर रोक लगा दी है जिसमें सरकार की विशेषज्ञ समिति द्वारा दी गई अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को बरकरार रखा गया था। यह कदम देश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर गहरे दोषपूर्ण नजरिये में सुधार का अवसर प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों वाले एक पीठ ने, जिसकी अध्यक्षता देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक नागरिक समूहों के तीव्र विरोध के बाद इस मामले का स्वत: संज्ञान लेने का निर्णय लिया। यह समीक्षा इस स्वीकारोक्ति को दर्शाती है कि जरूरी नहीं कि कानूनी वर्गीकरण आवश्यक रूप से पर्यावरण संरक्षण के अनुरूप हो, जो विश्वभर में हरित नीति का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व बनकर उभरा है।
नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की उस सिफारिश को स्वीकार कर लिया था जिसमें अरावली की एक समान परिभाषा दी गई थी। कहा गया था कि ऐसी पहाड़ियां स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हों, तथा पहाड़ी समूह और वे ढलानें जो एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हों, उन्हें अरावली पर्वत श्रृंखला के तहत माना जाएगा। यह तब था जबकि भारतीय वन सर्वेक्षण के आंकड़ों ने पहले ही संकेत दिया था कि ऐसी परिभाषा अरावली क्षेत्र के 90 फीसदी से अधिक हिस्से, जिसे ऐतिहासिक रूप से गुजरात से दिल्ली तक फैला हुआ माना जाता है, को कानूनी संरक्षण से बाहर कर देगी और इस प्रकार उसे खनन और पत्थर खदानों के लिए खुला छोड़ देगी। इस परिभाषा को अपनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती विचारों का ही विरोध किया।
जिस परिभाषा का सुझाव दिया गया, वह राजस्थान सरकार द्वारा लागू मानदंडों से मेल खाती थी, जिन्हें देश की सबसे बड़ी अदालत ने 2010 में अस्वीकार कर दिया था। इसके बजाय, अदालत ने भारतीय वन सर्वेक्षण को निर्देश दिया था कि वह पूरे अरावली क्षेत्र की सैटेलाइट इमेजिंग करे, न कि केवल उन हिस्सों की जो 100 मीटर की सीमा से ऊपर हैं, और अवैध खनन का पता लगाए। सर्वेक्षण में यह सामने आया कि राज्य की 128 अरावली पहाड़ियों में से 31 खनन और पत्थर खदानों के कारण गायब हो चुकी थीं। अदालत द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने भी निष्कर्ष निकाला कि परंपरागत और स्थानीय समझ के अनुसार केवल ढलान और ऊंचाई के मानदंडों का उपयोग करके अरावली को परिभाषित करना ‘समावेशन त्रुटियों’ की ओर ले जाएगा, क्योंकि अरावली का पूरा भूभाग, जो 34 जिलों में फैला है, पहाड़ी नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय को शायद अपनी समीक्षा में और आगे जाना चाहिए था। उसके आदेशों के बाद सरकार ने समूची अरावली श्रृंखला में नए खनन लाइसेंसों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। परंतु पहले से ही दिखाई देने वाली पर्यावरणीय क्षति को देखते हुए, सभी प्रकार के खनन और पत्थर खदानों पर प्रतिबंध लगाना बेहतर होता। पीठ ने एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है ताकि यह विश्लेषण किया जा सके कि नव-निर्धारित अरावली क्षेत्रों में ‘लगातार खनन’ के प्रतिकूल पारिस्थितिकीय परिणाम होंगे या नहीं। भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद को उन संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने के लिए कहा गया है जहां खनन को सख्ती से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए और उन क्षेत्रों की भी जहां ‘वैज्ञानिक रूप से उचित’ परिस्थितियों में इसे किया जा सकता है।
इसका उद्देश्य शायद पर्यावरणविदों की चिंताओं और खनन कंपनियों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करना है, लेकिन अब तक के प्रमाण इस योजना के पक्ष में नहीं हैं। लगातार प्रतिबंधों के बावजूद अरावली श्रृंखला दशकों से अनियंत्रित और बढ़ते खनन से क्षतिग्रस्त होती रही है। इस निरंतर गतिविधि का हानिकारक प्रभाव उत्तर भारतीय मैदानी शहरों का तेजी से धूल-भरे क्षेत्रों में बदल जाने के रूप में सामने आया है, जिससे सालभर प्रदूषण बढ़ता है, मरुस्थलीकरण फैलता है और स्थानीय समुदायों का हाशिये पर जाना बढ़ता है जो इस क्षेत्र से अपनी आजीविका प्राप्त करते थे। कानूनी रूप से वर्गीकरण बदलना या ‘प्रतिबंधित’ क्षेत्रों की स्थापना करना इस प्राचीन पारिस्थितिकी संसाधन की सतत रक्षा में बहुत कम योगदान देगा।