भारत अपनी डिजिटल यात्रा में अगली बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार है। एक दशक पहले हमने, जनसंख्या के एक बड़े वर्ग को ध्यान में रखकर, विशिष्ट पहचान वाले आधार और एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) जैसे तंत्र बनाए जिससे विशिष्ट पहचान और भुगतान सभी के लिए सुलभ हो गए। ये मंच इसलिए कारगर रहे क्योंकि वे सरल, सुरक्षित और कम लागत वाले होने के साथ ही सार्वभौमिक उपयोग के लिए डिजाइन किए गए थे। अब जब आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) रोजमर्रा के जीवन में प्रवेश कर रही है, हमें एक नई सार्वजनिक प्राथमिकता के लिए उसी स्पष्ट उद्देश्य को अपनाना होगा। प्रत्येक भारतीय की एक सुरक्षित और विश्वसनीय एआई एजेंट तक पहुंच होनी चाहिए जो उन्हें जानकारी का प्रबंधन करने, सेवाओं और निर्णय लेने की उनकी क्षमता को मजबूत करने में मदद कर सके।
कई लोगों के लिए, एक एजेंट मुख्य डिजिटल इंटरफेस बन जाएगा जिसके माध्यम से वे जानकारी हासिल करते हैं, कोई नया कौशल सीखते हैं और सरकार तथा निजी, दोनों सेवाओं के लिए संवाद करते हैं। एक किसान को मौसम और मिट्टी से जुड़ी जानकारी समय-समय पर चाहिए होती है। एक छात्र को परीक्षाओं या भाषा से जुड़े अभ्यास के लिए मदद की आवश्यकता हो सकती है। एक मरीज, एक एजेंट के जरिये प्रिस्क्रिप्शन को समझने और सेहत से जुड़े रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने के लिए कर सकता है। एक छोटा कारोबार अपने काम को सरल करने के लिए, लॉजिस्टिक्स और नियमों के अनुपालन के लिए एक एजेंट की ओर रुख कर सकता है। इन इस्तेमाल को तभी साकार किया जाएगा जब हम सभी के लिए एक समावेशी संरचना का निर्माण करेंगे।
एक समावेशी एजेंट संरचना को वास्तव में चार आवश्यकताओं के जरिये परिभाषित करना चाहिए। सबसे पहले, इन एआई एजेंटों को भारत की गोपनीयता सुरक्षा उपायों का पालन करना चाहिए। एजेंट स्वास्थ्य, वित्त, शिक्षा और दैनिक जीवन से जुड़े संवेदनशील डेटा को संभालेंगे। उपयोगकर्ताओं को पता होना चाहिए कि कौन-सी जानकारी एकत्र की जाती है और इसका उपयोग कैसे किया जाता है। पारदर्शिता और भरोसे के बिना, राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी तंत्र सफल नहीं होगा। दूसरा, एजेंटों को भारत की सामग्री दिशानिर्देशों के भीतर काम करना चाहिए। सभी समाज, खराब सामग्री को कम करने के लिए सीमाएं निर्धारित करते हैं। भारत का नियामकीय ढांचा पहले से ही इन अपेक्षाओं को परिभाषित करता है।
तीसरा, एजेंटों को डेटा एम्पावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन आर्किटेक्चर (डेपा) के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। डेपा किसी व्यक्ति को सहमति प्रबंधकों के माध्यम से अपने डेटा को सुरक्षित रूप से साझा करने में सक्षम बनाता है। जब एजेंट डेपा के साथ काम करते हैं तो उपयोगकर्ता इस बात पर नियंत्रण रखते हैं कि उनका डेटा कब और कैसे साझा किया जाता है।
आखिरी बात यह कि एक एजेंट प्रत्येक भारतीय को मुफ्त में उपलब्ध होना चाहिए जिसमें विज्ञापन का झंझट न हो। हमने यूपीआई को मुफ्त कर दिया है, एआई एजेंट भी मुफ्त होने चाहिए। ऐसे में सभी व्यवस्थित रूप से महत्त्वपूर्ण, डिजिटल मध्यस्थों को एक मुफ्त एजेंट मुहैया कराना चाहिए जो सुरक्षा और गोपनीयता मानदंडों को पूरा करता हो। कंपनियां प्रीमियम संस्करणों के साथ इस स्तर से ऊपर नवाचार कर सकती हैं, लेकिन साथ ही सार्वभौमिक पहुंच की गारंटी भी दी जानी चाहिए।
यह दृष्टिकोण अन्य न्यायाधिकार क्षेत्र से विशेष रूप से अलग है। अमेरिका में, एआई एजेंट बड़े प्लेटफॉर्म द्वारा नियंत्रित वाणिज्यिक उत्पादों के रूप में उभर रहे हैं जिनके उपयोगकर्ता की अधिक निगरानी होती है। यूरोपीय संघ (ईयू) सुरक्षा और अधिकारों पर केंद्रित है लेकिन उसने एक समावेशी एजेंट ढांचे का प्रस्ताव नहीं रखा है। चीन, अपनी सरकार की प्राथमिकताओं के हिसाब से एआई तंत्र तैयार कर रहा है। इनमें से कोई भी मॉडल एक विविध लोकतंत्र की जरूरत के हिसाब से डिजाइन नहीं किया गया है, जिसे सीमित संसाधनों वाले लाखों उपयोगकर्ताओं को सेवाएं देनी चाहिए।
भारत इस दिशा में एक अलग रास्ता बना सकता है क्योंकि हमारे पास पहले से ही संस्थागत नींव तैयार है। हमारा डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा अब दुनिया में सबसे पूर्ण संरचना है। आधार एक तरफ सुरक्षित पहचान को सुनिश्चित करता है वहीं दूसरी ओर यूपीआई त्वरित भुगतान में मददगार है।
डिजिलॉकर, विश्वसनीय डिजिटल दस्तावेजों का समर्थन करता है। वहीं फास्टैग और कोविन ने दिखाया है कि कैसे सामान्य मानक कुशलतापूर्वक सार्वजनिक सेवाओं का वितरण कर सकते हैं। ओएनडीसी, वाणिज्य और लॉजिस्टिक्स के लिए खुले नेटवर्क का निर्माण कर रहा है। डिजीयात्रा, चेहरे की पहचान कर हवाई यात्रियों को सहूलियत देता है और यह वास्तव में दर्शाता है कि कैसे गोपनीयता बरकरार रखते हुए सहमति-आधारित पहचान के जरिये सेवाओं के स्तर में सुधार किया जा सकता है।
डेपा एक सहमति-आधारित डेटा ढांचा को जोड़ता है जिस पर विकसित अर्थव्यवस्थाएं अब भी बहस कर रही हैं। ये तंत्र पहचान, भुगतान, डेटा, गतिशीलता और सेवा वितरण को जोड़ने वाले एक सुसंगत व्यवस्था के रूप में काम करते हैं। एक समावेशी एजेंट संरचना, बड़ी जनसंख्या के पैमाने को देखते हुए वास्तव में काफी परिवर्तनकारी होगी।
पूरी दुनिया में, उच्च गुणवत्ता वाली एजेंट सेवाओं तक पहुंच बनाने का ताल्लुक भुगतान करने की क्षमता से जुड़ती जा रही है। अगर भारत अच्छी तरह से नियमन के दायरे वाले एजेंटों तक सार्वभौमिक पहुंच की गारंटी देता है तब हम यह प्रदर्शित कर पाएंगे कि एआई असमानताओं को कम कर सकती है। हम अन्य निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों के लिए भी एक व्यावहारिक मॉडल पेश करेंगे जो अमेरिका, यूरोपीय या चीन के दृष्टिकोणों को नहीं अपना सकते हैं। इनमें से कई देश पहले से ही डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के लिए भारत की ओर देख रहे हैं।
गोपनीयता, सहमति, खुलेपन और सार्वजनिक जवाबदेही के साथ तैयार की गई, सब तक पहुंच बनाने वाली समावेशी एजेंट प्रणाली उनके लिए बहुत मूल्यवान होगी। एक समावेशी एआई एजेंट के संरचनात्मक ढांचे का मामला वास्तव में आकर्षक है। यदि एआई लोगों की डिजिटल दुनिया के साथ संवाद करने का प्राथमिक तरीका बन जाता है तब सुरक्षा, किफायत और जवाबदेही की गारंटी जरूर दी जानी चाहिए। एजेंटों को बिना नए जोखिम या निर्भरता की कोई स्थिति बनाए बिना ही शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, वित्त और छोटे कारोबार संचालन में जुड़े लोगों का समर्थन करना चाहिए। उन्हें स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व के हमारे संवैधानिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करना चाहिए और भारत की कई भाषाओं और क्षेत्रों में काम करना चाहिए।
एआई एजेंट वास्तव में नियमित डिजिटल सेवाओं की पेशकश का जरिया बन सकते हैं। असली सवाल यह है कि क्या उनके फायदे सभी के लिए उपलब्ध होंगे। इस दिशा में ‘एजेंट फॉर ऑल फ्रेमवर्क’ एक स्पष्ट दृष्टिकोण देता है। यदि भारत दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ता है तब हम एक समावेशी एआई एजेंट ढांचे का निर्माण कर सकते हैं जो लाखों लोगों के दैनिक जीवन को बेहतर बनाता है और विश्वसनीय एआई के लिए एक वैश्विक बेंचमार्क स्थापित करता है।
(लेखक केंद्रीय मंत्री और लोक सभा सदस्य रह चुके हैं। ये उनके निजी विचार हैं)