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बांग्लादेश का मजबूत विकास अनुकरणीय या चमत्कार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 10:37 PM IST

बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के आधी सदी बाद इस युवा देश ने तमाम अनुमानों को झुठला दिया है। 16 दिसंबर, 1971 को पश्चिमी पाकिस्तान की सेनाओं के आत्म समर्पण के बाद बने इस नए देश को रिचर्ड निक्सन के नेतृत्व वाले अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान ने (जो जाहिर तौर पर पाकिस्तान समर्थक था) आर्थिक रूप से पूरी तरह खारिज कर दिया था। आशंका जताई गई थी कि युद्ध के बाद वहां अकाल पड़ सकता है।
पांच दशक बाद बांग्लादेश दक्षिण एशिया में वृद्धि और मानव विकास के मामले में अनूठा देश बनकर उभरा है। सवाल यह है कि सन 1991 में जनरल इरशाद का सैन्य शासन समाप्त होने के बाद बांग्लादेश ने जो कुछ हासिल किया क्या उसका अनुकरण किया जा सकता है? दूसरे शब्दों में कहें तो यह कोई चमत्कार है या कोई ऐसा मॉडल जिसे कहीं और दोहराया जा सकता है?
कराची से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र डॉन में एक आलेख में जानेमाने पाकिस्तानी अर्थशास्त्री इशरत हुसैन ने (वह पाकिस्तान के उन चुनिंदा चर्चित लोगों में शामिल हैं जिनकी दूसरी भाषा बांग्ला है और गत जुलाई तक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के आर्थिक सलाहकार थे) ने बांग्लादेश की सफलता की कई वजह चिह्नित कीं। पहली बात: सांस्कृतिक एकरूपता, दूसरा और शायद उससे जुड़ा हुआ: एकल सरकार जहां संघीय और प्रांतीय सरकारों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं होती। तीसरा: राजनीतिक विभाजन के बावजूद नीतिगत निरंतरता। डॉ. हुसैन का विश्लेषण बांग्लादेश प्रशासन को बरी नहीं करता। वह कहते हैं कि राजनेताओं को कारोबारियों से चुनावी चंदा मिला। अफसरशाहों ने अपने कम वेतन की भरपाई तोहफों से की जबकि कारोबारियों ने श्रमिकों और पर्यावरण की कीमत पर अपने कारोबार का विस्तार किया। परंतु पाकिस्तानी प्रतिष्ठान पर हमला करते हुए वह यह भी कहते हैं कि ऐसा करते हुए बांग्लादेश के लोग अपना पैसा विदेश नहीं ले गए। निजी क्षेत्र, राजनेताओं और अफसरशाहों के बीच सुसंगत रिश्ता वृद्धि को गति देता है। हम यह देख सकते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के एक दशक बाद हमें एक अस्थिर संतुलन देखने को मिला जहां नीतिगत निरंतरता ध्वस्त हो चुकी है।
डॉ. हुसैन की बाकी बातों पर करीबी नजर डालने की जरूरत है। मानव विकास की पूरी कहानी में नागरिक समाज, गैर सरकारी संगठनों का सक्रिय सहयोग है जो सरकारी मोर्चे पर होने वाली कमी पूरी करते हैं। नीतिगत निरंतरता के बुनियादी वाहकों में वृहद आर्थिक स्थिरता और राजकोषीय विवेक शामिल हैं। व्यापार और निवेश को लेकर खुलापन देश के वृद्धि मॉडल के केंद्र में है। घरेलू बचत और निवेश दरें पाकिस्तान की तुलना में ऊंची हैं जबकि कर-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात तथा राजकोषीय घाटा कम हैं।
प्राथमिक शिक्षा और महिला सशक्तीकरण पर जोर देने के परिणाम देखते हैं। भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी 2005 में 32 फीसदी के उच्चतम स्तर पर थी और वह अब घटकर 21 फीसदी रह गई है। तालिबान के पहले अफगानिस्तान में यह अनुपात भारत से बेहतर था। बांग्लादेश में बीते तीन दशक मे श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ी है और अब वह 36 फीसदी है। दोनों देशों में यही सबसे बड़ा अंतर है। सावधिक श्रम शक्ति सर्वे के मुताबिक भारत के तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के बीच भी यही बड़ा अंतर है।
वृहद आर्थिक स्थिरता और राजकोषीय विवेक की बात करें तो बांग्लादेश और भारत की बचत और निवेश दर 30 फीसदी के साथ लगभग समान है। परंतु सबसे बड़ा अंतर है सरकारी घाटे का आकार। महामारी के पहले भारत का सरकारी घाटा बांग्लादेश के घाटे से दोगुना था। बांग्लादेश में केंद्रीय घाटे को बढ़ाने के लिए राज्यों का कोई घाटा नहीं है। वित्तीय बचत में भारतीय राज्य बड़ी हिस्सेदारी ले लेते हैं जबकि बांग्लादेश में ऐसा नहीं होता। यही वजह है कि 2016 से बांग्लादेश में जीडीपी में निजी निवेश की हिस्सेदारी भारत से अधिक रही है। अगर बांग्लादेश से सुधार और अधोसंरचना विकास के लिए उधारी बढ़ाना चाहता है तो भी उसके पास भारत से अधिक गुंजाइश है। उसका ऋण-जीडीपी अनुपात 13 वर्ष के उच्चतम स्तर पर जाकर भी केवल 38 फीसदी है जबकि भारत में यह 90 फीसदी है जिसकेमार्च 2026 तक घटकर 86 फीसदी होने की आशा है। भारत में केंद्र के कर राजस्व में ब्याज भुगतान की हिस्सेदारी 52 फीसदी से अधिक है जबकि बांग्लादेश में यह 20 फीसदी है।
बांग्लादेश की हालिया विकास गाथा चमत्कार नहीं है बल्कि इसमें अनुकरण करने लायक बहुत कुछ है। परंतु हमें यह भी देखना होगा कि क्या इन मॉडलों को भारत में हासिल किया जा सकता है। बहुत संभव है कि बांग्लादेश के इन चयन के लिए उसके अस्तित्व में आने की कहानी भी वजह हो। मसलन बिना संसाधनों वाले देश में राजकोषीय विवेक लाजिमी था। सन 1940, 1960 और 1970 के दशक में देश के कुलीन वर्ग पर आई आपदाओं ने देश की अर्थव्यवस्था को अधिक समावेशी बनाया। व्यापार और निवेश को लेकर खुलापन शायद इसलिए आया क्योंकि आजादी के बाद पहले दशक में उसके पास सीमित आंतरिक संसाधन थे और वह जापान समेत बाहरी देशों और एजेंसियों पर निर्भर था।
बांग्लादेशी-ब्रिटिश अर्थशास्त्री मुश्ताक एच खान ने पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच विभिन्न सहायता रुझानों का अध्ययन करके कहा कि सन 1970 के दशक में बांग्लादेश को दी जाने वाली सहायता के कारण राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का संचयन नहीं हो सका। एक नया मध्य वर्ग उभरा जो वस्त्र उद्योग में लग गया। स्वयंसेवी संगठनों ने भी विकास और समावेशन में अहम भूमिका निभाई।  बांग्लादेश सरकार ने नागरिक समाज के संगठनों के साथ जैसा सह-अस्तित्व दिखाया है  वह भारत में मुश्किल है। उसके खुलेपन और राजकोषीय प्रतिरोध की एक वजह यह भी है कि दशकों से बांग्लादेश अपनी सीमाओं को लेकर भारत से अधिक सचेत रहा है।

First Published : December 26, 2021 | 11:36 PM IST