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भारतीय बाजारों में बिकवाली और देसी निवेशकों का रुख

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 8:42 PM IST

बीते कुछ महीनों की सबसे चकित करने वाली घटना रही है विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) द्वारा की जाने वाली बिकवाली। ये वैश्विक फंड रोजाना 2,000 से 6,000 करोड़ रुपये की बिकवाली कर रहे हैं और अक्टूबर से यह गति और तेज हो गई है। यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद तेल कीमतें बढ़ी हैं और बिकवाली रोजाना 7,500 करोड़ रुपये का स्तर पार कर जाएगी। अक्टूबर से एफपीआई ने 26 अरब डॉलर के शेयरों की बिकवाली की है।
यह अब तक की सबसे बड़ी बिकवाली है। 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट के बीच भी 15 अरब डॉलर की बिकवाली ही हुई थी। बाजार पूंजीकरण के प्रतिशत के रूप में अक्टूबर 2018 से द्वितीयक बाजार में 0.8 फीसदी की बिक्री लगभग उतनी ही है जितनी कि वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान हुई थी। एफपीआई की अंशधारिता दिसंबर 2020 में 25 फीसदी के उच्चतम स्तर पर रहने के बाद अब 20 फीसदी है यानी आठ वर्षों का निचला स्तर। एफपीआई पोर्टफोलियो में सर्वाधिक अहमियत रखने वाले दो क्षेत्रों, वित्तीय और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में करीब 85 फीसदी बिकवाली हुई। कहा जा सकता है कि बिकवाली क्षेत्र आधारित नहीं है बल्कि वैश्विक पूंजी बेहतर मुनाफे के लिए बाहर जा रही है। सन 2021 मेंं सबसे अधिक पूंजी भारत से बाहर गई है। एफपीआई ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसकी कई वजह हैं लेकिन कुछ प्रमुख वजह इस प्रकार हैं:
1. यह लगभग स्पष्ट हो चुका है कि दुनिया भर में दरों में इजाफा होगा और केंद्रीय बैंक पीछे रह जाएंगे। नकदी भी धीरे-धीरे कम होगी। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के पास वित्तीय हालात तंग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दरों में इजाफा होने तथा नकदी की तंगी के साथ दीर्घावधि की वृद्धिकारी परिसंपत्तियों पर विसंगतिपूर्ण असर होगा। चूंकि भारत में व्यापार महंगा है और वृद्धि को लेकर दबाव है इसलिए यह वैश्विक आवंटकों के कारण दबाव में आ गया। निवेशक भारत में सतत और तेज वृद्धि का अनुमान लगाकर चलते हैं। ऐसे में परिसंपत्तियां दबाव में आईं। मूल्य बनाम वृद्धि की यह बहस विश्व स्तर पर चल रही है। मूल्य की ओर झुकाव तो बस आरंभ ही हुआ है।
2. भारत दुनिया के सबसे महंगे बाजारों में से एक है और वह एशिया के उभरते बाजारों के औसत की तुलना में अग्रिम आय के मामले में 20 गुना और मूल्यांकन प्रीमियम के मामले में 65 फीसदी पर कारोबार कर रहा है।
हालिया गिरावट के बाद भी अभी भी इसका प्रदर्शन बीते कुछ वर्षों के उभरते बाजारों के औसत से बेहतर रहा है। सन 2021 में भारत 26 फीसदी ऊपर था जबकि एमएससीआई ईएम का औसत 3 फीसदी नीचे था। बीते 12 महीनों में चीन तथा उसके प्रौद्योगिकी क्षेत्र के कमजोर प्रदर्शन को देखते हुए तथा उसने जो राशि गंवाई है उसे देखते हुए यकीनन वहां निवेशक एकदम गिर चुके शेयरों में निवेश का रुझान रख रहे होंगे। अधिकांश आवंटक शायद यह सोचते हैं कि भारतीय बाजारों में पर्याप्त गिरावट नहीं आई है तथा अन्य उभरते बाजारों में ज्यादा बेहतर अवसर हैं, इसलिए पैसा बाहर जा रहा है। यह भी सच है कि 2020 और 2021 दोनों वर्षों में भारत में पूंजी की आवक हुई जबकि अन्य एशियाई बाजारों से करीब 30 अरब डॉलर की पूंजी बाहर गयी। एक तरह से देखें तो भारत अब अन्य एशियाई बाजारों जैसा हो रहा है। मूल्यांकन की बात करेंं तो वैश्विक आवंटकों के अनुसार अक्टूबर से तमाम बिकवाली के बावजूद  भारत में डॉलर के संदर्भों में केवल 9 फीसदी गिरावट आई है। सन 2008 में ऐसी ही बिकवाली के साथ बाजार 72 फीसदी गिरे थे।
3. तेल का झटका तो है ही जिसने बाजारों को और अनाकर्षक बनाया। कोई नहीं चाहता कि तेल के दाम बढऩे के दौरान वह भारतीय बाजारों पर अधिक जोर दे। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो हमारी अर्थव्यवस्था और बाहरी खाते भी तेल कीमतों में तेजी के कारण गहरे दबाव में हैं। इस समय अधिकांश निवेशक जिंस उत्पादक बाजारों को तवज्जो दे रहे हैं और जिंस उपभोक्ता बाजारों से रिश्ते कम कर रहे हैं। भारत इस पोर्टफोलियो बदलाव के बीचोबीच है। यह विडंबना ही है कि तेल को लेकर भारत का जोखिम एशियाई औसत से थोड़ा ही बेहतर है और हमारा शुद्ध कच्चा तेल आयात जीडीपी के तीन फीसदी के बराबर है।
जिस बात ने मुझे प्रभावित किया है वह है बाजार की मजबूती। निश्चित रूप से हम इस वर्ष 10 फीसदी नीचे हैं लेकिन वैश्विक बाजार भी उसी तरह नीचे हैं। यदि एक वर्ष पहले किसी ने मुझसे कहा होता कि भारत में महज छह महीने में दो लाख करोड़ रुपये की बिकवाली हो जाएगी और कच्चा तेल 130 डॉलर प्रति बैरल पार कर जाएगा तो शायद मैं कभी यह अनुमान नहीं लगाता कि रुपया 76-77 प्रति डॉलर पर स्थिर रहेगा और बाजार केवल 10 फीसदी नीचे रहेंगे। सन 2008 में अपेक्षाकृत कम बिकवाली के समय भी बाजार डॉलर के संदर्भ में 72 फीसदी गिरे थे।
बाजार हमें कुछ बता रहे हैं। वे एक सीमा से नीचे नहीं जा रहे हैं और वे ऐतिहासिक रूप से मजबूत स्थिति में हैं। घरेलू निवेशक आधार की मजबूती और दृढ़ता भी नजर आ रही है। कुछ ही लोगों को इस हकीकत का अहसास है कि सन 2014 के बाद से घरेलू संस्थानों ने भारतीय शेयरों में वैश्विक निवेशकों की तुलना में अधिक पूंजी निवेश किया है। हम घरेलू निवेशकों के आत्मविश्वास और बाजार की मजबूती को दो तरीकों से देख सकते हैं। पहला तरीका तो यह है कि बाजार ऐसा संकेत दे रहे हैं कि हम आर्थिक और आय के ऊपरी चक्र के मुहाने पर हैं। वृद्धि और कॉर्पोरेट मुनाफा दोनों हमें चौंकाएंगे। भारत को दीर्घावधि के कई रुझानों का लाभ मिल रहा है। इसमें डिजिटलीकरण, चीन के साथ एक अन्य देश में निवेश की नीति तथा सुदूर स्थानों से काम करना शामिल है। इस सकारात्मक दृष्टि से देखें तो कोई भी कमी खरीदारी का अवसर है और घरेलू निवेशक भी इस समय एकदम यही कर रहे हैं। वैकल्पिक दृष्टिकोण यह कहता है कि स्थानीय कारोबारी भारत में फंस गए हैं और वे कहीं दूसरी जगह निवेश नहीं कर सकते हैं। उन्हें तेजी का रुख बनाए रखना होगा और उन्हें न तो अंदाजा है और न ही इस बात में उनकी कोई रुचि है कि भारत सापेक्षिक दृष्टि से कितना महंगा है। विदेशी कारोबारी बिकवाली जारी रखेंगे और बढ़ी हुई कीमतों पर उन्हें बाहर निकलना ही ठीक लग रहा है। किसी न किसी मोड़ पर घरेलू निवेशक आधार का धैर्य या खरीदारी की उनकी क्षमता भी चुक जाएगी।
सही कौन है? तेजी के रुख वाला घरेलू निवेशक आधार जिसे यकीन है कि भारत मजबूत वृद्धि और मुनाफा हासिल करेगा या फिर शंकालु वैश्विक पूंजी जो बाहर निकल रही है? हम तेजी वाले खेमे में हैं लेकिन समय ही बताएगा कि कौन सही है। इस बीच बाजार सुदृढ़ होंगे। यह दौर खरीदने का है या बेचने का यह आपके दीर्घकालिक नजरिये पर निर्भर करता है।
(लेखक अमांसा कैपिटल से संबद्ध हैं)

First Published : March 17, 2022 | 11:27 PM IST