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पुष्कर सिंह धामी: नए मुख्यमंत्री के सामने चुनौतियां पुरानी

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 2:58 AM IST

उत्तराखंड कोविड-19 महामारी की रोकथाम में जर्जर स्वास्थ्य ढांचे की वजह से जहां खुद को असहाय पा रहा है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राज्य की बागडोर एक ऐसे मुख्यमंत्री के हाथ में सौंप दी है जिसके पास शासन का कोई अनुभव नहीं है। उत्तराखंड के अब तक के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने पुष्कर सिंह धामी (45 वर्ष) मौजूदा कार्यकाल से पहले सिर्र्फ  एक बार विधायक रहे और कभी भी मंत्री नहीं रहे हैं। लेकिन राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के मौजूदा राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के रूप में उन्हें तगड़ा समर्थन हासिल है। कोश्यारी की तरह धामी भी स्वयंसेवक रहे हैं।
भाजपा की युवा इकाई भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) में धामी लंबे समय तक सक्रिय रहे हैं और उत्तराखंड में युवाओं को गोलबंद करने के लिए लगातार अभियान चलाते रहे हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर उनके चयन में इन पहलुओं की निर्णायक भूमिका रही है। तमाम व्यावहारिक कारणों से धामी भाजपा के लिए युद्धकाल के सेनापति हैं।
धामी के पक्ष में एक और बात यह रही कि उन्हें अपने पूर्ववर्ती तीरथ सिंह रावत की तरह किसी ‘सुरक्षित’ सीट के लिए अपने सहयोगियों के आगे गुहार नहीं लगानी है। वह पहले से ही विधानसभा के निर्वाचित सदस्य हैं।
कहा जा रहा है कि तीरथ को संवैधानिक बाध्यताओं के चलते मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ा है। कोविड-19 महामारी के दौरान कई राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग पर हत्या का मुकदमा चलाने जैसी मद्रास उच्च न्यायालय की बेहद कठोर टिप्पणी के बाद आयोग ने संभवत: सरकार को यह संदेश दे दिया था कि संवैधानिक रूप से बेहद जरूरी न होने पर वह कोई भी चुनाव कराने के पहले दो-बार सोचेगा।
लेकिन सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले तीरथ के सामने समस्या सिर्फ विधानसभा उपचुनाव कराए जाने की ही नहीं थी। वह चुनाव में अपनी जीत को लेकर भी आश्वस्त नहीं थे। वह अपने क्षेत्र की चौबट्टाखाल सीट से उपचुनाव लडऩे के इच्छुक थे लेकिन वहां के मौजूदा विधायक सतपाल महाराज ने साफ-साफ कह दिया था कि वह अपनी सीट नहीं खाली करने वाले हैं। गंगोत्री की सीट फिलहाल रिक्त है लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं थी कि चुनाव आयोग वहां पर उपचुनाव कराने को तैयार होगा। इसके अलावा भाजपा को भी यह भरोसा नहीं था कि तीरथ सिंह रावत गंगोत्री सीट से जीत ही जाएंगे। ऐसी चर्चा भी थी कि वह अपने मार्गदर्शक भुवन चंद्र खंडूड़ी की विधायक बेटी रितु से भी यमकेश्वर सीट खाली कराने की योजना बना रहे थे ताकि वह खुद वहां से चुनाव लड़ सकें। योजना यह थी कि रितु को तीरथ की लोकसभा सीट पौड़ी गढ़वाल से चुनाव लडऩे का मौका दिया जाएगा।
धामी के सामने ऐसी कोई समस्या नहीं है। लेकिन उनके सामने चुनौतियां बेशुमार हैं। वह छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में बेहद सक्रिय रहे हैं और राज्य को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। हालांकि वह पिथौरागढ़ से ताल्लुक रखते हैं लेकिन वह अपने गांव से करीब 200 किलोमीटर दूर स्थित खटीमा विधानसभा क्षेत्र से लगातार दो बार निर्वाचित हुए हैं। वर्ष 2002 से लेकर 2008 के दौरान उन्होंने बेरोजगार युवाओं को भाजपा के साथ जोडऩे के लिए पूरे राज्य की सघन यात्रा की थी। वह स्थानीय युवकों के लिए स्थानीय उद्योगों में 70 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित कराने में सफल रहे थे। वर्ष 2005 में उन्होंने राज्य के युवाओं को रोजगार देने की मांग को लेकर विधानसभा का व्यापक घेराव भी किया था। इसके लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।
कई लोगों का कहना है कि अगर इन तमाम खूबियों के बावजूद धामी को पहले मंत्री नहीं बनाया गया था तो यह उनकी गलती नहीं थी। कुछ महीने पहले ही त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह तीरथ के मुख्यमंत्री बनने की एक वजह कुमाऊं को दरकिनार कर गढ़वाल इलाके पर उनके ज्यादा ध्यान देने को भी बताया गया। दरअसल उत्तराखंड की राजनीति में कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों की प्रतिद्वंद्विता बहुत पुरानी है। त्रिवेंद्र ने कुमाऊं के ठाकुर नेताओं को नजरअंदाज भी किया था जबकि भाजपा को उस इलाके की 29 में से 23 सीटें मिली थीं। स्थानीय पार्टी सूत्रों के मुताबिक कुमाऊं का हरेक दूसरा ठाकुर मतदाता भाजपा का समर्थन करता रहा है। इसके बावजूद त्रिवेंद्र सिंह सरकार में न तो कुमाऊं क्षेत्र और न ही ठाकुरों को समुचित प्रतिनिधित्व मिला था। और धामी तो कुमाऊं के ही एक ठाकुर नेता हैं।
लेकिन कुछ चीजें अब भी नहींं बदली हैं। भाजपा के पास राज्य की कुल 70 में से 57 सीटें हैं। उत्तराखंड के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए सभी समूहों के हितों का ध्यान रख पाना बड़ी समस्या रही है। विधानसभा के आंकड़ों में कोई बदलाव न होने से यही लगता है कि धामी को भी इस समस्या का सामना करना होगा।
त्रिवेंद्र ने गैरसैंण को उत्तराखंड की नई राजधानी बनाने की घोषणा की थी लेकिन तीरथ ने इस फैसले को पलट दिया। तीरथ के लगभग 100 दिन के ही कार्यकाल में उत्तराखंड को फर्जी कोविड-19 जांच एवं टीकाकरण प्रमाणपत्र का घोटाला और हरिद्वार कुंभ के बाद संक्रमण की बेहद उच्च दर का सामना करना पड़ा। अब धामी को यह सुनिश्चित करना होगा कि ये सब दुरुस्त हो जाए।
सरकार चलाने की रणनीति थोड़ा पीछे रह सकती है लेकिन अभी तक इस पर कुछ नहीं कहा गया है कि भाजपा नेतृत्व धामी के पास अनुभव की कमी की समस्या से कैसे निपटेगा। क्या रोजमर्रा के शासकीय कार्यों के लिए एक उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा ताकि धामी चुनाव अभियान पर पूरा ध्यान दे सकें? इस बारे में स्थिति साफ नहींं है। लेकिन यह स्पष्ट है कि भाजपा को उत्तराखंड में फिर से सत्ता तक पहुंचाना धामी के लिए आसान नहीं होने जा रहा है।

First Published : July 6, 2021 | 11:26 PM IST