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स्थायी हल

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 6:27 PM IST

भारत और चीन समेत करीब 60 देशों ने जिनेवा में 12 जून से होने जा रही विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की 12वीं मंत्रिस्तरीय शिखर बैठक में विचार के लिए एक संयुक्त प्रस्ताव पेश किया है। यह प्रस्ताव खाद्य भंडारण, कृषि सब्सिडी, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और मानवीय सहायता से जुड़े कुछ विवादित मसलों को हल करने पर केंद्रित है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब दुनिया के सामने गंभीर खाद्यान्न संकट है और वह उसका स्थायी हल तलाशने की कोशिश में है। इस पहल के लिए बने समूह के घटक इसे महत्त्वपूर्ण बनाते हैं क्योंकि इसमें एशिया, अफ्रीका और प्रशांत क्षेत्र के खाद्य निर्यातक ही नहीं ब​ल्कि आयातक देश भी हैं। इनमें भारत, चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान तथा कई अन्य देश शामिल हैं। इन देशों ने सुझाव दिया है कि कृषि सब्सिडी के आकलन का उन्नत और संशोधित तरीका अपनाया जाए।
सन 1986-88 की कीमतों को मानक मानकर इन सब्सिडी का आकलन करने की मौजूदा प्रणाली अब पुरानी तथा अप्रासंगिक हो चुकी है। इसी प्रकार अनुमति योग्य सब्सिडी से संबंधित मौजूदा प्रावधानों, जो अधिकतम कुल उपज मूल्य के 10 प्रतिशत तक सीमित हैं, उन पर तथा सब्सिडी की इस सीमा का उल्लंघन होने पर पैदा होने वाले विवादों को दूर रखने के लिए बने ‘शांति संबंधी प्रावधान’ पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। प्रस्तावित संशोधनों के लिए डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते को लगभग नए तरीके से तैयार करना होगा। यह समझौता 1994 में हुआ था लेकिन यह व्यापार गतिरोध समाप्त करने, पारदर्शी बाजार पहुंच सुनिश्चित करने तथा एकीकृत वैश्विक बाजार तैयार करने जैसे अपने तय लक्ष्य हासिल करने में विफल रहा। भारत लंबे समय से इस समझौते की आलोचना करता रहा है। उसका कहना है कि यह समझौता विकसित देशों की ओर झुका हुआ है। अब जबकि भारत को कम से कम 59 देशों का समर्थन हासिल है, खासकर जब उसके पास चीन जैसे प्रभावशाली देशों का समर्थन भी है तो शायद वह इस समझौते को समकालीन हकीकतों के अनुरूप बनाने तथा सभी को समान अवसर देने की बात पर जोर दे सकता है।
दरअसल इस समझौते को तैयार करने तथा इस पर हुई वार्ता में अमेरिका और यूरोपीय संघ प्रमुख भूमिका में थे। सन 1990 के दशक के आरंभ में जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स ऐंड ट्रेड (गैट) वार्ता में भी इनका ही दबदबा था। विकासशील देशों के वार्ताकारों में आमतौर पर उनके व्यापार मंत्रालयों के अधिकारी हुआ करते थे और वे कृषि तथा किसानों से जुड़े मुद्दों से बहुत परिचित भी नहीं थे। इन वार्ताओं में उन्हें ज्यादा वजन से अपनी बात भी नहीं रखने दी गई। आश्चर्य नहीं कि उस दौरान सारे नियम विकसित देशों के हितों की रक्षा करने की दृष्टि से बनाए गए, न कि खाद्य पदार्थों की कमी से जूझ रहे विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताओं को हल करने के लिए। यहां तक कि सब्सिडी के आकलन के लिए निर्धारित 1986-88 की संदर्भ अवधि भी अमीर देशों के अनुकूल है क्योंकि इससे उन्हें अपने किसानों की मदद का अवसर मिलता है जबकि विकासशील देशों के किसान ऐसी मदद से वंचित रह जाते हैं।
इन 60 देशों द्वारा प्रस्तावित नयी योजना में सब्सिडी की संदर्भ कीमतों के आकलन के वर्ष को 1986-88 के बजाय अधिक नवीन मसलन बीते पांच वर्ष की कीमतों के अनुरूप (इस दौर की उच्चतम और न्यूनतम कीमत को छोड़कर) करने की बात शामिल है। इसमें खाद्यान्न संकट से जूझ रहे देशों की मदद के लिए सरकारी भंडार के अनाज के सशर्त निर्यात की इजाजत की मांग भी की गई है। विकासशील देशों को खाद्यान्न उत्पादन, अधिग्रहण तथा भंडारण संबंधी नीतियां बनाने में अधिक लचीलापन देने की बात भी इसमें शामिल है। ऐसा करते हुए घरेलू खाद्य सुरक्षा को भी ध्यान में रखा जाएगा। इस कदम का लक्ष्य है डब्ल्यूटीओ के मानकों को आधुनिक बनाना ताकि दुनिया भर के किसानों और उपभोक्ताओं के हितों का बचाव करते हुए वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

First Published : June 8, 2022 | 12:47 AM IST