गत वित्त वर्ष के दौरान 40 फीसदी के इजाफे के बाद देश के वाणिज्यिक वस्तु निर्यात में सीमित वृद्धि देखने को मिली है। हाल में वृद्धि की दर आंशिक रूप से इसलिए भी धीमी रही कि घरेलू मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के लिए निर्यात पर प्रतिबंध लगाए गए लेकिन गत वर्ष की तेजी बरकरार रहने की उम्मीद इसलिए भी नहीं थी कि उसके लिए वैश्विक जिंस कीमतों में तेजी भी जिम्मेदार थी। बहरहाल, उच्च निर्यात हासिल करने और उसके बरकरार रखने के फायदों की बात की जाए तो यह वृद्धि का एक ऐसा कारक हो सकता है जिसमें भारत कुछ समय से पिछड़ा हुआ है। महामारी के पूर्व की तेजी के पहले निर्यात कई वर्षों तक लगभग स्थिर रहा और इस बात ने समग्र आर्थिक वृद्धि को प्रभावित किया। ऐसे में यह बात अहम है कि भारत महामारी के बाद हासिल तेजी को बरकरार रखे और मध्यम अवधि में निर्यात की एक टिकाऊ दर निरंतर हासिल करे। चूंकि इसके लिए नीतिगत समर्थन की आवश्यकता होगी इसलिए सरकार ने गत सप्ताह वाणिज्य विभाग का पुनर्गठन करके उचित कदम उठाया।
विदेश व्यापार महानिदेशालय अब केवल नियमन और विदेश व्यापार संवर्द्धन के लिए काम करेगा। अब उसके पास विदेश व्यापार नीति बनाने का अधिकार नहीं होगा। व्यापार नीति विभाग द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय व्यापार वार्ताओं को अलग-अलग संभालने में बंटा रहता है। यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है क्योंकि इससे ऐसे समय पर वार्ताओं पर ध्यान देने में मदद मिलेगी जब भारत कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को लेकर वार्ता कर रहा है। बहरहाल, यह बात भी ध्यान देने लायक है कि केवल वाणिज्य विभाग का पुनर्गठन करने से मदद नहीं मिलेगी। इसे बस एक शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए। जैसा कि इस समाचार पत्र ने प्रकाशित भी किया, विषय विशेषज्ञों को शामिल करने पर भी विचार किया जा रहा है। भारत नए व्यापार समझौतों के साथ आगे बढ़ेगा, ऐसे में यह अहम होगा।
भारत को व्यापार नीति प्रतिष्ठान में संस्थागत क्षमता विकसित करनी होगी। इससे न केवल व्यापार वार्ताओं में भारत की स्थिति अधिक मजबूत होगी बल्कि व्यापक घरेलू नीति प्रतिष्ठान को भी विदेश व्यापार के मोर्चे पर अधिक व्यावहारिक रुख अपनाने में मदद मिलेगी। उदाहरण के लिए अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने सरकार के क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी या आरसेप में शामिल नहीं होने की आलोचना की थी। चूंकि इससे चीन के साथ व्यापार हतोत्साहित नहीं हुआ इसलिए भारत दुनिया के सर्वाधिक गतिशील व्यापारिक समूहों में से एक का हिस्सा बनते-बनते रह गया। व्यापार को टिकाऊ ढंग से आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि वैश्विक मूल्य शृंखला से जुड़ा जाए। परंतु ऐसे व्यापार समझौते से बाहर रहने और घरेलू कारोबारों को बचाने के लिए दरों में इजाफा करने से भारत को किसी भी मूल्य शृंखला का अनिवार्य हिस्सा बनने में दिक्कत होगी।
इस समय जो हालात हैं उनके मुताबिक तो हाल के वर्षों में वैश्विक मूल्य शृंखला में भारत की भागीदारी कम हुई है और संभवत: इस बात ने निर्यात को प्रभावित किया है। विश्व बैंक द्वारा जुटाए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में उसका वस्तु एवं सेवा निर्यात 2013 के 25.4 फीसदी से घटकर 2020 में 18.7 फीसदी रह गया। भारत को व्यापक समीक्षा करने की आवश्यकता है कि ऐसा क्यों हुआ? तभी वह हालात को बदल पाएगा। सरकार के लिए भी बेहतर यही होगा कि वह वाणिज्य विभाग के पुनर्गठन का इस्तेमाल संस्थागत क्षमता विकसित करने के लिए करे। वार्ताओं में (जो अक्सर काफी समय खपाऊ होती हैं) व्यापारिक हितों के संरक्षण के अलावा इससे भारत को तेजी से बदलती विश्व अर्थव्यवस्था से तालमेल करने में भी मदद मिलेगी। उच्च आर्थिक वृद्धि हासिल करने के लिए निर्यात में वृद्धि आवश्यक है।