facebookmetapixel
Netflix के भारत में 10 साल: कैसे स्ट्रीमिंग ने भारतीय मनोरंजन उद्योग की पूरी तस्वीर बदल दीEditorial: ट्रंप की नई टैरिफ धमकी से भारत-अमेरिका व्यापार रिश्तों पर गहराया संकटट्रंप को धन्यवाद कि उनकी वजह से वापस आए सुधार‘VB-G Ram Ji’ कानून के बचाव में उतरेंगे केंद्रीय मंत्री और BJP के नेता, विपक्ष के अभियान को देंगे जवाबApple की बड़ी छलांग: भारत से आईफोन निर्यात पहली बार ₹2 लाख करोड़ के पार, PLI स्कीम का असरऑफिस से फैक्ट्री तक कर्मचारियों को पहुंचाने पर उबर का फोकस, कंपनी को दिख रहा यहां बड़ा अवसरबड़े दावे, सीमित नतीजे: AI के दौर में भी कई GCC सिर्फ कॉस्ट सेंटर बनकर रह गए, वैल्यू क्रिएशन से कोसों दूरदोपहिया उद्योग को 2026 में 9 फीसदी तक की ग्रोथ की उम्मीद, GST कटौती के चलते मांग बढ़ने के आसार2032 तक 3-नैनोमीटर चिप बनाएगा भारत, सेमीकंडक्टर महाशक्ति बनने की हमारी तैयारी: वैष्णवरिकॉर्ड निवेश और मजबूत रिटर्न: सोना-चांदी की तेजी से 2025 में भी मल्टी-ऐसेट फंडों ने दिखाया जलवा

नया चुनावी प्रतिमान

Last Updated- December 11, 2022 | 8:49 PM IST

ताजा विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और आम आदमी पार्टी (आप) का प्रदर्शन यह बताता है कि मतदाताओं के बीच एक नया समीकरण विकसित हुआ है जिसने जाति और धर्म की पहचान के सामान्य मानक से आगे बढ़कर कल्याणकारी लाभ को अपनाया है। पंजाब में आम आदमी पार्टी की शानदार और एकतरफा जीत से से यह बात साबित होती है। पंजाब में उसके प्रत्याशियों ने पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, शिरोमणि अकाली दल बादल की पिता पुत्र की जोड़ी और कांग्रेस के निवर्तमान मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को दोनों सीटों पर परास्त किया। आप का चुनाव प्रचार शासन के दिल्ली मॉडल पर केंद्रित था जहां पानी और बिजली पर भारी सब्सिडी, स्वास्थ्य और शैक्षणिक ढांचे का निर्माण और अब राशन की घर-घर आपूर्ति ने उसे लगातार चुनाव जीतने में मदद की है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने शानदार जीत हासिल की और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अभूतपूर्व रूप से दूसरा कार्यकाल मिला। इसके पीछे भी काफी कुछ दिल्ली जैसी ही बुनियाद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में जमकर चुनाव प्रचार किया। इस बार पार्टी का प्रचार अभियान बहुसंख्यकवाद और कल्याणकारी योजनाओं के मिश्रण से तैयार हुआ था जिसने बहुत तगड़ा संदेश दिया। बीते सात वर्षों में उनकी पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर जो व्यापक काम किए हैं उन्होंने देश के सर्वाधिक गरीब राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश में मतदाताओं को व्यक्तिगत स्तर पर छुआ। इन कार्यक्रमों में शौचालय निर्माण, घरेलू गैस में सब्सिडी, ग्रामीण विद्युतीकरण, नल जल कनेक्शन, किसानों के बैंक खाते में पैसा और महामारी के दौरान नि:शुल्क अनाज वितरण आदि शामिल हैं। इसी तरह आदित्यनाथ ने प्रदेश में कानून व्यवस्था को दुरुस्त किया। उनके तरीकों पर सवाल उठ सकता है लेकिन वह अत्यधिक लोकप्रिय साबित हुए, खासकर महिला मतदाताओं के बीच। ये कारक इतने प्रभावी रहे कि लोगों ने सन 2020 के प्रवासी श्रमिकों के संकट और कोविड-19 महामारी के दौरान हुए कुप्रबंधन की अनदेखी कर दी। यही नहीं इसकी बदौलत धीमी पड़ती राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और उच्च बेरोजगारी का दर्द भी भुला दिया गया।
अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने इस चुनाव में काफी अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन इसकी बुनियादी विचारधारा जो संकीर्ण जातीय पहचान पर आधारित है, ने व्यापक वैकल्पिक आधार की गुंजाइश सीमित कर दी। यही कारक मायावती की बहुजन समाज पार्टी की बढ़ती अप्रासंगिकता को भी स्पष्ट करता है। सन 2021 में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांगे्रेस के प्रदर्शन और पंजाब में आप के प्रदर्शन से संकेत मिलता है कि एक धर्मनिरपेक्ष कल्याणकारी मंच के साथ धनवान सत्ताधारी दल को विश्वसनीय चुनौती पेश की जा सकती है। तमिलनाडु में जयललिता और बिहार में नीतीश कुमार ऐसा कर चुके हैं। परंतु उत्तराखंड तथा गोवा में आप और तृणमूल कांग्रेस की स्थिति यह दर्शाती है कि उन्हें स्थानीय आधार विकसित करना होगा। इन प्रक्रियाओं में समय और धन दोनों लगते हैं। ऐसे में भाजपा का सामना करने के लिए केवल कांग्रेस बचती है। परंतु उसका हालिया प्रदर्शन उसके पराभव की ही पुष्टि करता है और यह रेखांकित करता है कि गांधी परिवार को तत्काल पद त्यागने की आवश्यकता है। प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में पार्टी का नेतृत्व किया और वहां उसका सफाया हो गया। जबकि पंजाब में उनके भाई राहुल गांधी पार्टी की आंतरिक प्रतिद्वंद्विता को संभाल नहीं सके। चन्नी को दलित होने के कारण पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय इस बात का संकेत है कि उन्हें मतदाताओं की अच्छी समझ नहीं है।
आखिर में, कल्याण योजनाओं की मदद से वोट तो पाए जा सकते हैं लेकिन यह सरकार की भुगतान करने की क्षमता पर निर्भर करता है। अब तक किसी सरकार ने बिना तेज वृद्धि के यह क्षमता हासिल नहीं की है। आने वाले दिनों में यह बड़ी चुनौती हो सकती है क्योंकि अधिक से अधिक दल इसे अपनाएंगे।

First Published - March 10, 2022 | 11:05 PM IST

संबंधित पोस्ट