प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 11 अक्टूबर को जिस ‘स्वामित्व’ योजना की शुरुआत की वह ग्रामीण इलाकों में संपत्ति अधिकारों को सुनिश्चित करने एवं स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड को दुरुस्त करने की दिशा में एक अहम कदम है। ग्रामीण क्षेत्रों में उन्नत तकनीक की मदद से गांवों के सर्वेक्षण एवं मानचित्रण की योजना ‘स्वामित्व’ संपत्ति के अंकन एवं भूमि दस्तावेजों को डिजिटल करने की दो दशक पुरानी कवायद का परिणाम है। इस योजना में ड्रोन के इस्तेमाल से ग्रामीण क्षेत्रों में आबादी वाली एवं गैर-रिहायशी जमीनों (तालाब, चरागाह एवं सड़क) का सटीक अंकन किया जाएगा। यह काम पूरा हो जाने के बाद जमीन के मालिकों को एक प्रॉपर्टी कार्ड दिया जाएगा जो उनके भूमि स्वामित्व का सबूत होगा। इस परियोजना ने वर्ष 2024 तक देश के 6.62 लाख गांवों में जमीनों के रिकॉर्ड को दर्ज करने का चुनौतीपूर्ण लक्ष्य रखा है। छह राज्यों के करीब 1 लाख गांवों में इसकी पायलट परियोजना शुरू भी हो गई हैं।
अप्रैल में शुरू हुए शुरुआती काम के आधार पर इन छह राज्यों के 763 गांवों में भूस्वामियों को उनकी संपत्ति के वैध कागजात सौंपे भी जा चुके हैं। वे एसएमएस भेजकर वर्चुअल प्रॉपर्टी कार्ड भी देख सकेंगे। स्वामित्व योजना दशकों तक चलने वाले मुकदमों की वजह बनने वाले अस्पष्ट एवं पुराने भूमि दस्तावेजों को तर्कसंगत बनाने की दिशा में बढ़ा एक कदम है। नि:संदेह यह एक बढिय़ा विचार है और पूरे खेल का रुख पलट सकने की क्षमता भी रखता है। हर्नांदो दी सोतो जैसे अर्थशास्त्री लंबे समय से यह दलील देते रहे हैं कि समृद्धि एवं संपत्ति अधिकारों में एक यौगिक रिश्ता है। वास्तव में, यह व्यापक मान्यता है कि स्पष्ट भूमि स्वामित्व की कमी भारत में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आने की राह में एक बड़ा रोड़ा रहा है। अधिक पारदर्शी संपत्ति अधिकार राज्यों की राजस्व संग्रह क्षमता को बेहतर करने के साथ ही भूस्वामियों के लिए अपनी जमीन की कीमत वसूलने में भी मददगार होते हैं। बहुत छोटे भूखंडों के गरीब भूस्वामियों के लिए तो स्वामित्व योजना शायद एक बहुमूल्य कवायद है।
हालांकि इस योजना का प्रभावी क्रियान्वयन हो पाना सवालों के घेरे में है। इस योजना की निगरानी पंचायतीराज मंत्रालय करेगा लेकिन इसमें सर्वे ऑफ इंडिया, नैशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर, राज्यों के राजस्व विभाग, पंचायतीराज विभाग, जिलों के अधिकारी जैसे तमाम दूसरी एजेंसियों के अलावा गांवों की पंचायतें और भूस्वामी भी शामिल होंगे। प्रमुख समस्या शायद यही है कि स्थानीय स्तर पर भूमि दस्तावेजों का ब्योरा दर्ज करने एवं सत्यापन की महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया का संचालन निर्वाचित संस्था ग्राम पंचायतों के हाथ में होगा और वहां पर राजनीतिक असर एवं छल-प्रपंच की गुंजाइश रह सकती है। संपत्ति का प्रमाणीकरण राज्य सरकार की किसी एजेंसी जैसे अधिकार-संपन्न इकाई द्वारा सबसे अच्छे ढंग से अंजाम दिया जा सकता है। यह खास तौर पर प्रामाणिक है क्योंकि हवाई सर्वे के नक्शों को स्थानीय भूमि दस्तावेजों एवं नक्शों के साथ मिलान की जरूरत होगी लेकिन ये कागजाज अमूमन स्थानीय राजस्व एवं कर अधिकारियों के पास ही होते हैं। इस बात की पूरी आशंका है कि दोनों तरह के रिकॉर्ड में विसंगति पैदा हो जाए।
इस आशंका को दूर करने के लिए स्वामित्व योजना में समयबद्ध निगरानी एवं मूल्यांकन की एक त्रिस्तरीय व्यवस्था भी की गई है। विसंगति होने पर उसकी पड़ताल की जाएगी और उसे दूर किया जाएगा। लेकिन अभी तक स्पष्ट नहीं है कि ग्रामीणों को कहां पर अपील करनी होगी?
आखिर में, स्वामित्व योजना की सफलता काफी हद तक राज्य सरकारों पर निर्भर करेगी। पायलट परियोजना के लिए केंद्र ने जिन छह राज्यों का चयन किया है, वे भी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासन वाले राज्य ही हैं। कई मुद्दों पर राजनीतिक मतभेद की गुंजाइश को देखते हुए गैर-भाजपा शासित राज्यों की प्रतिक्रिया पर सवालिया निशान लगे हैं। भारत को एकीकृत जमीन बाजार बनाने के लिए राज्यों का सहयोग अहम है। स्वामित्व योजना के क्रियान्वयन में उन्हें साथ लेना प्रधानमंत्री मोदी का अगला कदम होना चाहिए।