प्राथमिक बाजार के लिहाज से मौजूदा साल काफी दमदार रहा है। अनुमान के मुताबिक दिसंबर की शुरुआत तक आरंभिक सार्वजनिक निर्गमों (आईपीओ) के माध्यम से 1.77 लाख करोड़ रुपये (लगभग 20 अरब डॉलर) जुटाए जा चुके हैं। यह रकम पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ी अधिक है। कई आईपीओ के लिए तो अत्यधिक आवेदन आए और इस बात की पूरी संभावना है कि दिसंबर अंत तक कुल आंकड़े पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक होंगे।
वास्तव में 16 दिसंबर तक आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल ऐसेट मैनेजमेंट के भारी भरकम निर्गम सहित पांच और आईपीओ मुकम्मल होने वाले हैं। इनके बीच एक स्पष्ट रुझान तो यह सामने आ रहा है कि ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) का हिस्सा बढ़ता जा रहा है। अब तक जितनी रकम जुटाई गई है उनमें इनका हिस्सा लगभग 60 फीसदी है। यह दर्शाता है कि कुछ प्रवर्तक और शुरुआती चरण के कई निवेशक जैसे प्राइवेट इक्विटी कंपनियां और वेंचर कैपिटल इकाइयां इसका पूरा फायदा उठाने में जुटी हैं।
ओएफएस बाजार का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। कई स्टार्टअप इकाइयां सूचीबद्ध होने के मौके तलाश रही हैं। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है। इस साल लगभग 13 स्टार्टअप इकाइयां सूचीबद्ध हुई हैं जिनमें ब्लूस्टोन, लेंसकार्ट, देवएक्स, इंडिक्यूब स्मार्टवर्क्स, ग्रो, फिजिक्स वाला, जैपफ्रेश और अर्बन कंपनी शामिल हैं। भारी भरकम बाजार मूल्यांकन वाली लगभग 20 स्टार्टअप कंपनियां भी सूचीबद्धता के बारे में सोच रही हैं। इनमें से कई यूनिकॉर्न (1 अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन) हैं और यहां तक कहा जा रहा है कि इनमें कुछ तो 1 अरब डॉलर से अधिक रकम जुटाने की उम्मीद कर रही हैं।
ओएफएस आय का एक बड़ा हिस्सा नई स्टार्टअप इकाइयों का समर्थन करने में निवेश होता है जिसे उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलता है। हालांकि, ओएफएस का हिस्सा अधिक होने का मतलब है कि आईपीओ के जरिये जुटाई गई रकम का कम हिस्सा ही संबंधित कंपनियों में निवेश किया जाता है। इसके अलावा, आईपीओ तो ठीक चल रहे हैं लेकिन पात्र संस्थागत नियोजन (क्यूआईपी) के माध्यम से रकम जुटाने में कमी आई है।
कंपनियों द्वारा जुटाई गई नकदी का बड़ा हिस्सा नई परियोजनाओं, संयंत्रों, मशीनरी और भौतिक ढांचे में निवेश किया जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार आईपीओ से जुटाई गई नकदी (ओएफएस छोड़कर) का लगभग 20 फीसदी हिस्सा भौतिक संपत्तियों में निवेश के लिए रखा गया था जो पिछले वर्ष ऐसी संपत्तियों में हुए निवेश (8 फीसदी) से काफी अधिक है। ये लंबे समय से सुस्त पड़ी कंपनियों द्वारा निवेश दोबारा रफ्तार पकड़ने के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।
जुटाई गई रकम का एक बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने और कार्यशील पूंजी की जरूरत पूरी करने में भी इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, एक स्पष्ट विसंगति विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का रवैया रही है। एफपीआई ने इस साल 17 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के शेयर बेचे हैं लेकिन वे आईपीओ में हिस्सा ले रहे हैं। यह इस बात का संकेत हो सकता है कि भारत पर एफपीआई का विश्वास डिगा नहीं है मगर वे अल्पकालिक अवधि में निवेश को लेकर सतर्क हैं।
एफपीआई की तरफ से भारी बिकवाली के बावजूद निफ्टी जैसे प्रमुख सूचकांकों ने हाल ही में सर्वकालिक उच्च स्तर को छू लिया, इसलिए द्वितीयक बाजार और मजबूत प्राथमिक बाजार के बीच संबंध बिगड़ा नहीं है। घरेलू संस्थानों, म्युचुअल फंडों और खुदरा निवेशकों ने एफपीआई बिकवाली से नुकसान की भरपाई कर दी है और सूचकांकों को ऊपर धकेलने के लिए पर्याप्त रकम झोंकी है। लेकिन इस बात पर ध्यान दिया जा सकता कि रुपये की कमजोरी के कारण विदेशी मुद्रा में सूचकांक ने काफी कम रिटर्न दिया है जिससे एफपीआई ने बिकवाली की होगी।
उम्मीद के मुताबिक एफपीआई की बिकवाली से रुपये पर भी दबाव पड़ता है और इससे एक नकारात्मक माहौल बन जाता है जिसमें रुपया कमजोर होता है। यानी एफपीआई बिकवाली करते हैं तो रुपया और नीचे सरकता जाता है। इस साल सूचीबद्ध लगभग आधे आईपीओ निर्गम मूल्य से नीचे कारोबार कर रहे हैं जिसका मतलब है कि प्राथमिक बाजार में निवेशकों ने बहुत अधिक पैसा नहीं कमाया है। फिर भी प्राथमिक बाजार में गतिविधियां मजबूत रहने वाली है। यह तर्क दिया जा रहा है कि प्राथमिक बाजार में गतिविधियों का यह स्तर अब सामान्य बात हो गई है। बाजार में पूंजी की बढ़ती उपलब्धता से उद्यमिता, निवेश और वृद्धि को ताकत मिलनी चाहिए।