Categories: लेख

पांच बुद्धिमान लोग और ऋण पुनर्गठन की नई खिड़की

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 3:10 AM IST

दबावग्रस्त ऋणों के लिए पुनर्गठन की खिड़की खोलने के भारतीय रिजर्व बैंक के फैसले से बैंकर समुदाय ने एक साथ राहत की जो सांस ली है, उससे बेखबर कोई नहीं रह सकता था। जो खाते 1 मार्च, 2020 को 30 दिन से अधिक डिफॉल्ट के नहीं थे और कर्जदार कोविड-19 महामारी से अपना कारोबार प्रभावित होने के कारण कर्ज नहीं लौटा पा रहे हैं, उन्हें पुनर्गठित किया जा सकता है। इन ऋणों को ब्याज के लिए धन मुहैया कराकर, कर्ज के कुछ हिस्से को इक्विटी में बदलकर और ऋणी को चुकाने के लिए ज्यादा समय देकर पुनर्गठित किया जा सकता है। बैंकों को ऐसे पुनर्गठन का खुलासा करना होगा और इन ऋणों की 10 फीसदी राशि अलग रखनी होगी ताकि पुनर्गठित ऋणों के लिए प्रावधान किया जा सके। आरबीआई ने जून 2019 में ऋण पुनर्गठन के नियम बनाए थे। इनमें कहा गया था कि अगर ऋणी कंपनी के स्वामित्व में कोई बदलाव नहीं होता है तो बैंक पुनर्गठित, दबावग्रस्त ऋणों को स्तरहीन मानेंगे। मगर अब बैंक कोविड-19 से प्रभावित कंपनियों के पुनर्गठित ऋणों को मानक परिसंपत्ति मान सकते हैं, भले ही स्वामित्व में कोई बदलाव नहीं हुआ हो।
ब्रिक्स देशों के न्यू डेवलपमेंट बैंक के पूर्व प्रमुख केवी कामत की अगुआई में पांच विशेषज्ञ इस समाधान योजना के बारीक पहलुओं की पड़ताल करेंगे। भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक और एशियाई विकास बैंक में निजी क्षेत्र परिचालन और सार्वजनिक-निजी साझेदारी के उपाध्यक्ष दिवाकर गुप्ता, जाने-माने चार्टर्ड अकाउंटेंट और केनरा बैंक के चेयरमैन टी एन मनोहरन, प्रबंधन सलाहकार अश्विन पारेख और इंडिया बैंक्स एसोसिएशन के सीईओ सुनील मेहता उस समिति के सदस्य हैं, जो योजना तैयार करने के लिए डेट इक्विटी अनुपात, नकदी आवक जैसे क्षेत्र विशेष बेंचमार्क से संबंधित दायरों के बारे में विचार करेगी।
आरबीआई ने 12 फरवरी, 2018 को एक ही झटके में फंसे ऋणों के समाधान का ढांचा खत्म कर दिया था। कंपनी ऋण पुनर्गठन (सीडीआर), रणनीतिक ऋण पुनर्गठन (एसडीआर) और दबावग्रस्त परिसंपत्ति सतत पुनर्गठन योजना (एस4ए) और इन योजनाओं की निगरानी करने वाली संस्था संयुक्त ऋणदाता मंच को खत्म कर दिया गया। मध्य रात्रि में जारी परिपत्र में ऋणदाताओं से कहा गया कि वे या तो 180 दिन के भीतर बड़े दबावग्रस्त खातों (2,000 करोड़ रुपये या अधिक) की समाधान योजना लागू करें या दिवालिया अदालत में उनके खिलाफ दिवालिया याचिका दायर करें।  इस निर्देश को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया, जिसके बाद जून 2019 में आरबीआई ने फंसे ऋणों से निपटने के लिए ताजा दिशानिर्देश जारी किए। ताजा पुनर्गठन योजना में उन बहुत से नियमों को नरम बनाया गया है, जो उस समय केंद्रीय बैंक ने बनाए थे। लेकिन बैंकों के लिए नई रियायत का दुरुपयोग करना मुश्किल होगा। आरबीआई वर्ष 2001 से समय-समय पर ऐसी कई योजनाएं ला चुका है, जो ऋण पुनर्गठन के लिए बैंकिंग प्रणाली को लचीलापन मुहैया कराती हैं। अगल-अलग योजना में समस्या के समाधान का तरीका अलग-अलग रहा है। इनमें ऐसे पुनर्गठन के लिए सभी बैंकिंग ऋणदाताओं को बड़े खातों में संयोजित करने ( अगस्त 2001 में सीडीआर) से लेकर कर्ज के आते रहने और बंद होने के आसार वाले हिस्से को अलग-अलग करना (एस4ए, 2016) बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में कर्ज लौटाने की अवधि को 20 से 25 से अधिक बढ़ाना (5/25) और कर्ज को इक्विटी में बदलकर बीमार कंपनियों के प्रबंधन को अपने हाथ में लेना (एसडीआर 2015) जिसमें बैंक असफल कंपनियों का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकते थे या उन्हें खरीदारों को बेच सकते थे या यह सुनिश्चित करते थे कि उन्हें ऐसी कंपनियों में अपनी इक्विटी की बेहतर कीमत मिली है। फंसे ऋणों की समस्या से निपटने के लिए सबसे पहली ऋण पुनगर्ठन योजना सीडीआर व्यवस्था कई वजहों से कारगर नहीं रही। इसे सितंबर 2017 में समाप्त किया गया। तब तक सीडीआर प्लेटफॉर्म पर 655 खातों को पुनर्गठन के लिए लाया गया लेकिन उनमें से 125 (1,70,988 करोड़ रुपये) को रद्द कर दिया गया। सीडीआर के तहत कुल 4,03,004 करोड़ रुपये के ऋणों को मंजूर किया गया, जो 530 कर्जदारों के थे। करीब 291 खातों (1,72,463 करोड़ रुपये) को वापस ले लिया गया।
औद्योगिक रुग्णता के लिए त्वरित सुधारात्मक उपायों की जरूरत होती है, लेकिन सीडीआर में ऐसा कभी नहीं हुआ। ज्यादातर समाधान बैंक ऋणों को बट्टे खाते में डालकर हुए। यह ‘ऑपरेशन सफल रहने लेकिन मरीज मर जाने’ का सबसे बेहतर नमूना है। यह पुनर्गठन इकाइयों को उबारने के लिए नहीं बल्कि ज्यादातर ऋणदाता के बहीखातों को ठीक करने के लिए किया गया। हर 10 में से 9 मामलों में प्रवर्तक स्वीकृत योजना के मुताबिक या तो अपना योगदान देने में नाकाम रहे या वे निजी गारंटी या अन्य प्रतिभूतियां देने में नाकाम रहे, जिनका उन्होंने वादा किया था। आम तौर पर बैंक अपनी बैलेंस शीट को बचाने के लिए नई कार्यशील पूंजी या अतिरिक्त टर्म लोन मंजूर करते हैं। खस्ताहाल इकाइयों को उबारना हमेशा उनका उद्देश्य नहीं रहा।
आरबीआई ने ऋणदाताओं से कहा कि वे 31 मार्च 2015 से पुनर्गठित ऋणों के लिए 5 से 15 फीसदी नहीं बल्कि फंसे (एनपीए) ऋणों के बराबर प्रावधान करें, जिसने सीडीआर के खत्म होने की घंटी बज गई थी। उस समय तक बैंकों के लिए पुनर्गठित ऋणों का 5 से 15 फीसदी प्रावधान करना जरूरी था।
उसके बाद जेएलएफ (2014), एसडीआर, एस4ए और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए 5/25 (2014) जैसी और लचीली योजनाएं आईं। ये सभी योजनाएं लचीली थीं, उनमें सीडीआर व्यवस्था की तुलना में बेहतर खूबियां थीं। लेकिन वे भी असफल रहीं। इसकी मुख्य वजह यह थी कि बैंक और कॉरपोशन योजनाओं को केवल बड़े ऋणों को फंसे ऋणों में तब्दील होने से रोकने के सांचे में ढालना चाहते थे। यह कहानी 12 फरवरी 2018 को आरबीआई के उन्हें वापस लेने तक जारी रही।
अब आरबीआई ने फिर से खिड़की खोली है। इस उद्योग को बेहतर तरीके से समझने वाले पांच बुद्धिमान लोगों की निगरानी में बैंकों के लिए व्यवस्था का दुरुपयोग करना आसान नहीं होगा। लेकिन योजना को सफल बनाने के लिए पुनर्गठन के नियम और दबावग्रस्त कर्जदारों की पात्रता के मापदंड परिवर्तनशील होने चाहिए। आर्थिक माहौल कैसा बनता है, इसे मद्देनजर रखते हुए उनकी हर तिमाही में समीक्षा होनी चाहिए  स्थायी नियमों से उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं)

First Published : August 20, 2020 | 11:34 PM IST