एक आदर्श लहर के मार्ग का अनुमान लगाया जा सकता है। वह सहज तरीके से ऊपर-नीचे होती है। वास्तविक दुनिया में लहरों का उतार-चढ़ाव जटिल होता है (समुद्री लहरें या विद्युत चुंबकीय तरंगें) और एक साथ कई लहरें एक दूसरे से टकराती हैं। ऐसे में उनके मार्ग का अनुमान लगाना मुश्किल होता है। ऐसे में स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से विद्युत चुंबकीय लहरों के उतार-चढ़ाव को अलग-अलग किया जा सकता है।
ठीक इसी तरह मुद्रास्फीति के जटिल रुझानों के बीच कुछ आर्थिक आवेग को भी अलग किया जा सकता है। सैद्धांतिक तौर पर मुद्रास्फीति एक वृहद आर्थिक अवधारणा है और उसे श्रेणियों में विश्लेषित करना समझदारी नहीं क्योंकि अलग-अलग श्रेणियों में कीमतें मांग और आपूर्ति के अनुसार बदलती हैं। कई बार वैश्विक और स्थानीय कारक भी मिल जाते हैं। उदाहरण के लिए तिलहन की ऊंची कीमतों के कारण आने वाले खरीफ सत्र में दालों का रकबा कम हो सकता है जिससे दालों की कीमतें बढ़ सकती हैं। जबकि आरंभिक बाधा यूक्रेन के सूरजमुखी के तेल की आपूर्ति बाधित होने के कारण तेल क्षेत्र में थी।
बहरहाल, ऐसे अधिकांश बदलावों में समय लगता है और यह भी संभव है कि कुछ अहम कारकों को अलग-थलग किया जा सके। इनकी सहायता से मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान को बेहतर बनाया जा सकता है।
वैश्विक मोर्चे पर दो रुझान एकदम स्पष्ट हैं। पहले की शुरुआत कोविड-19 के दौरान अमेरिकी राजकोषीय प्रोत्साहन से हुई जो जरूरत से बहुत बड़ा था। इससे अमेरिका में खुदरा बिक्री सामान्य से 10 गुना बढ़ गई। यह वह दौर था जब वैश्विक स्तर पर उत्पादन बाधित था। इससे न केवल वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित हुई बल्कि अमेरिकी बंदरगाह, आंतरिक परिवहन और वैश्विक नौवहन आदि पर भी दबाव बना और वैश्विक नौवहन का करीब 4 फीसदी अमेरिकी तटों पर कतारबद्ध हो गया। ऐसे में कमी और आपूर्ति में लगने वाले लंबे समय के कारण खरीदारों ने जरूरत के वक्त खरीदारी करना शुरू कर दिया। ज्यादा माल एकत्रित करने की इच्छा के कारण कमी और बढ़ गई। गत तीन महीनों में अमेरिकी संघीय राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के रूप में जून 2019 के बाद के निचले स्तर पर है। सेवाओं के दोबारा शुरू होने के बाद खपत में वस्तुओं से सेवा की ओर बदलाव नजर आ रहा है। नौवहन के गतिरोध कम हुए हैं, वैश्विक औद्योगिक उत्पादन सुधरा है और कई आपूर्ति शृंखलाओं में जरूरत से अधिक माल तैयार है। टेलीविजन पैनल और मेमरी चिप्स की कीमत घट रही है और धातुओं की कीमत में सालाना आधार पर होने वाली वृद्धि अब अप्रैल के स्तर से नीचे है। कीमतें शायद कोविड पूर्व के स्तर पर न लौटें लेकिन फिर भी मुद्रास्फीति का आवेग महसूस किया जा सकता है।
ऊंची कीमतों के कारण मेहनताना बढ़ता है और कीमतें और बढ़ती हैं। इस समय अमेरिकी सेवा क्षेत्र में यह नजर आ रहा है लेकिन शेष विश्व की मुद्रास्फीति के लिए यह बहुत मायने नहीं रखता। बहरहाल, यह अमेरिका में और अधिक मौद्रिक सख्ती की वजह तो बन ही सकता है।
दूसरा वैश्विक रुझान है रूस और यूक्रेन युद्ध की शुरुआत। इसकी वजह से मांग और आपूर्ति में जो समस्या उत्पन्न हुई है उसे पूरा होने में काफी वक्त लग सकता है। उक्त संघर्ष और उसकी वजह से लगे प्रतिबंधों ने वैश्विक स्तर पर खाद्य और ऊर्जा की आपूर्ति को कई तिमाहियों के लिए बाधित कर दिया है। चूंकि वैश्विक जीडीपी वृद्धि और गहन ऊर्जा का इस्तेमाल आपस में जुड़े हुए हैं इसलिए राजकोषीय और मौद्रिक उपाय केवल उन्हीं चीजों का पुनर्वितरण कर सकते हैं जो सरकारों के पास मौजूद हैं। वे कमी को पूरा नहीं कर सकते। करीब हर बड़ी अर्थव्यवस्था ने भारी भरकम सब्सिडी की घोषणा की। इसे समझा जा सकता है क्योंकि घरेलू राजनीतिक अनिवार्यताओं और वृद्धि को बरकरार रखने के लिए ऐसा करना जरूरी था। बहरहाल इन बातों की वजह से ऊर्जा कीमतों में तेजी बनी रहेगी। यही कारण है कि विभिन्न देशों में शेष ईंधन को लेकर होड़ मची हुई है और कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। कीमतें बढ़ने के बावजूद नई क्षमताओं में निवेश नहीं किया गया है क्योंकि उत्पादक निश्चित नहीं हैं कि यह कमी कब तक चलेगी। कुल मिलाकर कीमतें अनुमान से ज्यादा समय तक तेज बनी रह सकती हैं। आज खाद्य तथा ईंधन पारिस्थितिकी के बीच भी गहरा संबंध है। इसकी वजह मांग और आपूर्ति हैं। ऐसे में वैश्विक खाद्य एवं ईंधन कीमतें लगातार तेज बनी रह सकती हैं।
मुद्रास्फीति के स्थानीय कारकों की बात करें तो यह तब आती है जब मांग अर्थव्यवस्था की क्षमता से अधिक हो जाती है। यह सही है कि सरकार का घाटा बजट में उल्लिखित स्तर से बहुत कम है लेकिन कुल सरकारी घाटा अभी भी कोविड के पहले के स्तर से अधिक है। हाल ही में उर्वरक और ईंधन कीमतों में इजाफे को रोकने के लिए राजकोषीय कदम उठाए गए हैं। देश का चालू खाते के घाटे का स्तर भी यही बताता है कि घरेलू मांग अस्थायी है।
बहरहाल इस घाटे में इजाफे की एक वजह ब्याज का बोझ भी है। मुद्रास्फीति का सबसे अहम कारक श्रम बाजार है और उसमें अभी भी शिथिलता नजर आ रही है। हमारी नजर में बेरोजगारी का सबसे विश्वसनीय संकेतक मनरेगा का काम है लेकिन उसकी मांग कम हुई है लेकिन अभी भी वह कोविड पूर्व के स्तर से ऊपर है। सब्जियों की कीमत शीर्ष मुद्रास्फीति में अस्थिरता ला सकती है लेकिन बीते एक दशक में सब्जियों की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इसकी एक बड़ी वजह वेतन भत्तों में मामूली वृद्धि भी है। हमारे देश में मुद्रास्फीति के कुछ अजीब कारक भी हैं जिन्हें अल्पकालिक होना चाहिए। उदाहरण के लिए दूरसंचार शुल्कों को अत्यंत निम्न स्तरों से बढ़ाया जाना तथा नि:शुल्क अनाज वितरण योजना के अनाज के बाजार में आ जाने के कारण बाजार में प्रमुख अन्न की कीमतों में गिरावट। हमें कई महीनों तक सालाना आधार पर उच्च मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ सकता है। मौद्रिक नीति समिति के लक्ष्य इसी पर आधारित होते हैं। बहरहाल, वैश्विक बाजार में ईंधन और खाद्यान्न कीमतों में तेजी के कारण वह संकेतक तब तक ऊंचे स्तर पर रहता है जब तक कि उच्च कीमत आधार में नहीं आ जाती। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में माह दर माह आधार पर होने वाला बदलाव अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीतिक आवेग को बेहतर ढंग से मापने में मदद कर सकता है और मौद्रिक नीति उसे हल करने का प्रयास कर सकती है। इसके अलावा कोविड के बाद के मजबूत सुधार को देखते हुए दरों का सामान्यीकरण भी अपरिहार्य है। ऐसे में रुपये को कमजोर होते जाने देना ही भुगतान असंतुलन को दूर करने का सबसे सही तरीका हो सकता है। इसके अलावा समझदारी इसी में होगी कि हम तब तक सतर्क रहें जब तक मांग और मूल्य पर वैश्विक मौद्रिक सख्ती का प्रभाव स्पष्ट नहीं हो जाता।
(लेखक एपैक स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख एवं क्रेडिट स्विस के इंडिया स्ट्रैटजिस्ट हैं)