जब दुनिया की सबसे धनी अर्थव्यवस्थाओं के नेता फ्रांस के शहर एवियां-ले-बैन में एकत्रित हुए तो राजनयिकों ने राहत की सांस ली कि यह तीन दिवसीय आयोजन बिना किसी बड़े विवाद के और कुछ सफलताओं के साथ संपन्न हुआ। कनाडा में हुई पिछली बैठक जहां अमेरिका के नेतृत्व वाले व्यापार युद्ध के तनाव और रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण को लेकर मतभेदों की छाया में संपन्न हुई थी, वहीं एवियां में उल्लेखनीय सामंजस्य और सौहार्द देखने को मिला।
हॉट माइक पर दर्ज नेताओं के बीच की बातचीत से भी यह साफ है। बैठक के पहले जो भी आशंकाएं थीं वे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ समझौते की घोषणा से काफी हद तक कम हो गईं। यह घोषणा एवियां सम्मेलन से कुछ दिन पहले हुई थी जिसके बाद होर्मुज स्ट्रेट के खुलने और पश्चिम एशिया में शांति पैदा होने की उम्मीद बनी। एवियां में दूसरा सबसे बड़ा लाभार्थी यूक्रेन रहा। यद्यपि राष्ट्रपति वोलोदीमिर जेलेंस्की को ट्रंप के साथ द्विपक्षीय बातचीत का मौका नहीं मिला लेकिन जी 7 ने अपने मतभेदों को दरकिनार कर अमेरिका को एकीकृत संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने के लिए राजी कर लिया।
इसमें रूस के विरुद्ध युद्ध में यूक्रेन का समर्थन करने का वादा किया गया। ट्रंप द्वारा अतीत में दिखाए गए असमंजस और रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के प्रति उनके खुले पक्षपात को देखते हुए यह समझौता एक बड़ी उपलब्धि है। हालांकि इस कठिनाई से हासिल प्रगति पर संदेह बैठक के अंत की ओर तब जरूर पैदा हो सकता था जब ट्रंप ने कहा कि यदि वे शांति समझौते से असंतुष्ट हुए तो ईरान पर बमबारी फिर से शुरू करेंगे। इस बयान ने उनकी स्वभावगत अनिश्चितता को रेखांकित किया।
इन तमाम भूराजनीतिक सफलताओं की बात करते हुए यह याद रखने की जरूरत है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश चीन इस मंच से अनुपस्थित रहता आया है। उसका राज्य के नेतृत्व वाला सब्सिडी प्रधान मॉडल वैश्विक वृद्धि पर असर डालता है। यह बैठक समृद्ध लोकतांत्रिक देशों की है लेकिन किसी भी चीनी नेता ने सदस्य या सामान्य अतिथि के रूप में इसमें हिस्सा नहीं लिया।
रूस भी 2014 में पुतिन द्वारा क्राइमिया पर आक्रमण तक इसका सदस्य था। ‘संतुलित, साझा और सतत आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने’ के विषय पर एक सत्र और संयुक्त वक्तव्य में वैश्विक असंतुलनों के गरीब देशों पर प्रतिकूल आर्थिक प्रभावों के बारे में एक औपचारिक घोषणा ने चीन के प्रभुत्व और जी7 की समाधान खोजने में अक्षमता को केवल कमजोर रूप से स्वीकार किया।
विकासशील देशों के आमंत्रित नेताओं ने ही चीन के कथानक का सबसे प्रभावी ढंग से प्रतिवाद किया। इनमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ब्राजील के राष्ट्रपति लुई इनासियो लूला डी सिल्वा और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो शामिल थे। दक्षिण कोरिया और मिस्र के नेताओं के साथ उन्हें पारंपरिक सहायता से निवेश की ओर बढ़ने पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया गया था। खबरों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने कार्य सत्र में चर्चाओं का नेतृत्व किया। उन्होंने जी7 की साझेदारी की अपील का समर्थन किया लेकिन साथ ही संघर्षों के झटके को झेलने में विकासशील देशों के लिए समर्थन पर भी बल दिया।
कुल मिलाकर एवियां में मोदी की अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और यूक्रेन के नेताओं के साथ आयोजित द्विपक्षीय बैठकों तथा जर्मनी के चांसलर और संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व के साथ संपर्क ने भारत के हितों को आगे बढ़ाने में काफी योगदान दिया। एक उपलब्धि ब्रिटेन के साथ एक वर्ष पहले हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौते की कार्यान्वयन तिथि (15 जुलाई) को अंतिम रूप देना भी था जिसमें भारतीय इस्पात निर्यात के 85 फीसदी के लिए आयात सुरक्षा उपायों से महत्त्वपूर्ण छूट शामिल है।
ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री मोदी की प्रमुख द्विपक्षीय बैठक ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका-पाकिस्तान के बढ़ते गठजोड़, दंडात्मक शुल्क, लंबे समय से चल रही व्यापार समझौते की चर्चाओं और अमेरिकी नौसेना के हमले से भारतीय नाविकों की मौत पर भारत के विरोध के कारण दोनों देशों का रिश्ता तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा था। इस संदर्भ को देखते हुए यह बैठक भारत के लिए तनाव में जरूरी कमी का संकेत देती है। खासकर उस समय जब वैश्विक अर्थव्यवस्था उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है।