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संकटग्रस्त संपत्ति का निस्तारण

Last Updated- December 15, 2022 | 2:28 AM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने उस विशेषज्ञ समिति की अनुशंसाओं को स्वीकार कर लिया है जिसका गठन कोविड-19 के कारण प्रभावित हुए बैंक ऋण के निस्तारण के वित्तीय मानक सुझाने के लिए किया गया था। वरिष्ठ बैंकर के वी कामत की अध्यक्षता वाली समिति ने 26 क्षेत्रों में ऐसे ऋण से निपटने के लिए एक खाका सुझाया है। यह असाधारण स्थिति है जहां सरकार द्वारा महामारी को थामने के लिए लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन ने विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही कंपनियों की राजस्व और कर्ज चुकाने की क्षमता को प्रभावित किया। ऐसी स्थिति में यह महत्त्वपूर्ण हो गया कि बेहतर संचालन वाली कंपनियों की मदद की जाए और अनावश्यक दिवालिया होने की घटनाओं को रोका जाए। क्योंकि ये घटनाएं बैंकिंग तंत्र को प्रभावित करेंगी। इस संदर्भ में समिति की अनुशंसाएं तार्किक प्रतीत होती हैं और इनके माध्यम से हालात से निपटने के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। निस्तारण कंपनियों के वित्तीय मानकों पर निर्भर करेगा। मिसाल के तौर पर समायोजित कुल शुद्ध मूल्य में बाहरी देनदारी की हिस्सेदारी, चालू अनुपात, डेट सर्विस कवरेज रेशियो और ब्याज, कर, अवमूल्यन और परिशोधन पूर्व आय में ऋण की हिस्सेदारी।
समिति ने विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग सीमा की अनुशंसा भी की है। इसके अलावा केवल वही खाते राहत के लायक होंगे जो 1 मार्च तक मानक खाते के रूप में वर्गीकृत थे और जिनका बकाया 30 दिन से कम का था। इसके अलावा निस्तारण प्रक्रिया वर्ष के अंत के पहले शुरू करनी होगी।
ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया है कि राहत केवल महामारी के असर को कम करने तक सीमित रहे। इसके अतिरिक्त नियामक के मुताबिक इंटर-क्रेडिटर एग्रीमेंट जैसी अन्य जरूरी अनिवार्यताएं एवं मानक भी इसके तहत लागू होंगे। चूंकि बैंकों को तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का शीघ्र निस्तारण करना होगा इसलिए कुछ आवश्यकताओं के चलते प्रक्रिया में देरी हो सकती है। एक ओर जहां पैनल की अनुशंसाओं और नियामक द्वारा अपनाए गए ढांचे में सुरक्षा उपाय हैं वहीं इसके बावजूद यह सुनिश्चित करना अहम होगा कि यह सुविधा फंसे हुए कर्ज को छिपाने के लिए नहीं इस्तेमाल की जाए। देश में नियामकीय सहनशीलता के उदाहरण बहुत उत्साहित करने वाले नहीं हैं। हालांकि अल्पावधि में ऐसा धैर्य अधिकांश अंशधारकों के हित में होता है लेकिन इससे समस्या हल नहीं होती।
इसके अलावा कुछ अन्य मसले हैं जिन पर नीतिगत तौर पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए समिति ने ध्यान दिया कि बैंकिंग क्षेत्र के विश्लेषण में शामिल करीब 72 फीसदी कर्ज महामारी से प्रभावित है। यह समझना आवश्यक है कि कॉर्पोरेट और बैंकों की बैलेंस शीट दोनों कोविड-19 के कारण लगे लॉकडाउन के पहले से ही तनावग्रस्त थीं। महामारी ने हालात और खराब कर दिए। विश्लेषकों का कहना है कि बड़ी तादाद में ऐसी फर्म भी हैं जो नई व्यवस्था के तहत निस्तारण के काबिल नहीं होंगी। यह स्पष्ट नहीं है कि बैंक अल्पावधि में ऐसी कंपनियों से कैसे निपटेंगे। व्यवस्था में व्याप्त तनाव को देखते हुए फंसे हुए कर्ज में जबरदस्त इजाफा लाजिमी है।
ऐसे में आरबीआई को यह सुनिश्चित करना होगा कि फंसा हुआ कर्ज समय पर चिह्नित हो और बैंकिंग तंत्र के पास पर्याप्त पूंजी हो। इस परिदृश्य में जहां निजी क्षेत्र के बैंक पूंजी एकत्रित कर रहे हैं, वहीं यह स्पष्ट नहीं है कि सरकारी बैंकों के पूंजीकरण की क्या योजना है। कमजोर बैंकिंग तंत्र ऋण को प्रभावित करेगा और आर्थिक सुधार की गति पर भी असर होगा। यानी स्थायी सुधार इस बात पर निर्भर है कि हम महामारी को कितनी जल्दी थाम पाते हैं। लगातार बढ़ता संक्रमण सुधार को प्रभावित करेगा और व्यवस्था में तनाव बढ़ेगा।

First Published - September 8, 2020 | 11:13 PM IST

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