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चीन प्लस वन रणनीति भारत के लिए अवसर

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मौजूदा वैश्विक हालात की बात करें तो आर्थिक और भूराजनीतिक दृष्टि से भारत की स्थिति बेहतर है। ऐसे में उसे चीन प्लस वन की रणनीति का लाभ मिल सकता है। बता रही हैं सोनल वर्मा

Last Updated- June 12, 2024 | 11:34 PM IST
चीन प्लस वन रणनीति भारत के लिए अवसर, China plus one strategy opportunity for India

आर्थिक विकास के लिए ‘वाइल्ड गीज-फ्लाइंग पैटर्न’ जापानी शब्द गांको केईताई का अनुवाद है जिसे अर्थशास्त्री कनामे अकामात्सु ने जापान में देखे गए आर्थिक विकास के रुझान की व्याख्या करने के लिए इस्तेमाल किया था।

युद्ध के बाद जापान ने कपड़ों जैसे सस्ते उत्पादों का उत्पादन शुरू किया। सन 1960 के दशक में इनकी लागत बढ़ने के बाद उसने इस उत्पादन को नई औद्योगीकृत अर्थव्यवस्थाओं हॉन्गकॉन्ग, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और जापान को स्थानांतरित कर दिया। सन 1990 के दशक में जब ये अर्थव्यवस्थाएं जापान के करीब पहुंचने लगीं तो उन्होंने आसियान-4 और चीन की उड़ान में मदद की।

अकामात्सु के नजरिये से देखें तो चीन से आपूर्ति श्रृंखला का स्थानांतरण आर्थिक विकास की एक स्वाभाविक प्रगति की परिणति है। हालांकि अमेरिका-चीन तनाव तथा महामारी ने भी इस रुझान को बल दिया है क्योंकि कई बहुराष्ट्रीय देश के चीन के अलावा विकल्प तलाश रहे हैं ताकि आपूर्ति श्रृंखला में विविधता ला सकें।

भारत को क्या लाभ हो सकता है?

उपलब्ध आंकड़े मिलेजुले हैं लेकिन संकेत बताते हैं कि भारत को अहम लाभ संभव हैं। ग्रीनफील्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में विदेशों में नए प्रतिष्ठानों की स्थापना शामिल है और यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में हो रहे बदलावों को मापने का अहम मानक है। एफडीआई मार्केट्स के अनुसार 2023 में भारत एशिया प्रशांत क्षेत्र में पहले और दुनिया भर में दूसरे स्थान पर रहा और उसने 83.7 अरब डॉलर मूल्य की 1,006 ग्रीनफील्ड एफडीआई परियोजनाएं अपने यहां आकर्षित कीं।

करीब 30 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता राशि ऊर्जा क्षेत्र के अलावा विनिर्माण एफडीआई परियोजनाओं के लिए जताई गई। यह 2022 के 34.7 अरब डॉलर से कम है लेकिन 2003 में आंकड़े लिए जाने के बाद से किसी भी अन्य वर्ष से अधिक है। हमारा सर्वेक्षण भी ऐसे ही लाभों के संकेत देता है। हमने करीब 130 कंपनियों के आंकड़े जुटाए जो या तो अपना उत्पादन चीन से बाहर ले जाना चाह रही हैं या जो एशिया में या कहीं और नया उत्पादन संयंत्र स्थापित करने जा रही हैं।

हमारे परिणाम दिखाते हैं कि 129 में से 28 कंपनियों ने भारत में रुचि दिखाई। वियतनाम में 23, मेक्सिको में 19, थाईलैंड में 16 और मलेशिया में 14 देशों ने रुचि दिखाई। ये परिणाम 2019 के सर्वे से अलग हैं जब वियतनाम सबसे बड़ा लाभार्थी था और भारत शीर्ष पांच से बाहर था। भारत को होने वाले लाभ भी बहुत व्यापक और तमाम क्षेत्रों तक विस्तारित हैं।

कंपनियां स्मार्ट फोन, वाहन और वाहन कलपुर्जा, पूंजीगत वस्तुओं, सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण तथा वस्त्र क्षेत्र में निवेश करना चाहती हैं। चीन के जोखिम को कम करना अहम कारक है लेकिन भारत आ रही कंपनियां घरेलू उपभोक्ता बाजार, यहां की बड़ी और कुशल श्रम शक्ति तथा प्रगतिशील नीतियों से भी प्रभावित हैं।

निवेश करने वाले देशों के स्रोत भी भारत को अच्छी स्थिति में रखते हैं। हमारा सर्वेक्षण बताता है कि नए निवेशों में चीन एक अहम निवेशक है लेकिन उसका अधिकांश निवेश आसियान देशों में है। इसके विपरीत भारत आने वाले निवेश में बड़ा हिस्सा अमेरिकी कंपनियों तथा जापान, दक्षिण कोरिया तथा ताइवान जैसे विकसित एशियाई देशों का है।

आसियान देशों में चीनी कंपनियों का निवेश आंशिक रूप से कारोबारी टैरिफ से बचाव के लिए है लेकिन अब जबकि पश्चिमी देश उन कमियों को दूर करना चाहते हैं जिनकी वजह से चीनी कंपनियां अपने व्यापार को तीसरे देशों के रास्ते से पुनर्निर्देशित करती हैं, हम मानते हैं कि भारत में होने वाले निवेश में और विविधता आएगी।

प्रतिकूल विचार

हमें अपने नजरिये को लेकर तीन आपत्तियां सुनने को मिलीं। पहली, भारत का व्यापार संतुलन सुधर नहीं रहा है। ऐसे में लाभ कहां है? हमारा जवाब यह है कि वैश्विक मूल्य श्रृंखला अथवा जीवीसी के साथ एकीकरण एक प्रक्रिया है जहां भारत अभी शुरुआती चरण में है। अभी वह आयातित कच्चे माल पर अधिक निर्भर है क्योंकि घरेलू विकल्प सीमित हैं।

बहरहाल घरेलू व्यवस्था विकसित होने के बाद घरेलू उत्पादन आयात को प्रतिस्थापित कर देगा और निर्यात में इजाफा होगा। इससे व्यापार संतुलन सुधरेगा। दूसरी आपत्ति यह है कि अगर भारतीय निर्यात को आयात संरक्षण चाहिए तो यह वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कैसे बन सकता है? भारत की नीति में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है।

जापान और दक्षिण कोरिया की औद्योगिक नीतियों को देखें तो शुरुआती दौर में ऐसा संरक्षण आम है। बहरहाल यह अस्थायी होना चाहिए और सरकार की सब्सिडी की मदद से ही सही समय पर इससे निजात पाई जा सकती है।

तीसरी आपत्ति यह है कि निर्यात संचालित वृद्धि की नीति क्या वैश्वीकरण से रहित दुनिया में कामयाब होगी? यह एक चुनौती है क्योंकि भारत के सामने प्रतिकूल वैश्विक परिदृश्य है। बहरहाल, चूंकि आज कंपनियां लागत कम करने के बजाय विविधता लाना चाह रही हैं और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना चाह रही हैं इसलिए चीन के अलावा एक अन्य निवेश केंद्र के लिए पर्याप्त अवसर रहेंगे।

चीन की चुनौती

भारत के वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकरण के बावजूद हम औद्योगिक वस्तुओं के निर्माण के लिए कच्चा माल जुटाने, इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जे, सोलर पैनल आदि पाने के क्रम में चीन पर बहुत निर्भर होंगे। इससे चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़ेगा लेकिन इससे भी अधिक अहम बात है कि इससे सूक्ष्म, मझोले और छोटे घरेलू उपक्रमों का विकास सीमित होगा। भारत के लिए बेहतर होगा कि वह घरेलू मूल्यवर्द्धन पर ध्यान दे।

गतिशील हों सरकारी नीतियां

भारत का प्रारंभिक लक्ष्य होना चाहिए कम प्रौद्योगिकी वाली विनिर्मित वस्तुओं के क्षेत्र में निर्यात बाजार की हिस्सेदारी हासिल करना जो कि लागत के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील होती हैं। इसके लिए मध्यवर्ती वस्तुओं की शुल्क दर कम करने की आवश्यकता है।

साथ ही नए मुक्त व्यापार समझौते करने, श्रम बाजार नियमों को सरल बनाने, बेहतर अधोसंरचना, लॉजिस्टिक लागत में कमी करने तथा अनुकूल निवेश माहौल बनाने की आवश्यकता है। स्थानीय निर्माताओं के संरक्षण के लिए सब्सिडी की मियाद तय होनी चाहिए और घरेलू उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

अगला चरण होगा मूल्य श्रृंखला में सुधार करके सामान्य से उन्नत उत्पादों की ओर बढ़ना। इसके लिए बेहतर मानव संसाधन की जरूरत होगी और नवाचार पर ध्यान देना होगा। इसके लिए सरकार कंपनियों को प्रोत्साहन दे सकती है कि वे शोध एवं विकास पर अधिक व्यय करें।

उच्च प्रौद्योगिक विनिर्माण में भारत से बेहतर स्थिति वाले देश मसलन दक्षिण कोरिया आदि ने अपने निर्यात की गुणवत्ता को नवाचार के जरिये बदला है और वे उन्नत विनिर्माण करने लगे हैं। भारत को भी इस दिशा में बढ़ना चाहिए।

कुल मिलाकर भारत आर्थिक और भूराजनीतिक दृष्टि से अच्छी स्थिति में है और वह चीन प्लस वन की नीति से लाभ उठा सकता है। सरकारी नीतियों को घरेलू मूल्यवर्धन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि मूल्य श्रृंखला में अपनी स्थिति बेहतर की जाए। कहा जा सकता है कि भारत के लिए तो यह अभी शुरुआत है।

(ले​खिका नोमूरा में मुख्य अर्थशास्त्री हैं)

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First Published - June 12, 2024 | 11:16 PM IST

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