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बजट 2026 को भारत के R&D इकोसिस्टम की सबसे कमजोर कड़ी मजबूत करने पर फोकस करना चाहिए

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात के रूप में सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (जीईआरडी) में भारत का प्रदर्शन अपेक्षित नहीं है और यह लगभग 0.7 फीसदी पर अटका हुआ है

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नागेश कुमार   
Last Updated- January 19, 2026 | 10:48 PM IST

नवाचार को प्रतिस्पर्द्धा और आर्थिक वृद्धि को ताकत देने वाला एक महत्त्वपूर्ण जरिया माना जा रहा है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के तेजी से विकास और विशुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य पर विचार करते हुए नवाचार की अहमियत और भी बढ़ गई है। लिहाजा, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात के रूप में सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (जीईआरडी) में भारत का प्रदर्शन अपेक्षित नहीं है और यह लगभग 0.7 फीसदी पर अटका हुआ है। यह वैश्विक औसत 1.93 फीसदी की तुलना में बहुत कम है। इससे एक बड़ी बहस शुरू हो गई है। चीन जैसे अन्य देश अनुसंधान एवं विकास पर कहीं अधिक खर्च करते हैं। चीन तो अपने जीडीपी का लगभग 2.6 फीसदी आरऐंडडी पर खर्च करता है।

नवाचार से जुड़ी गतिविधियों से होने वाले लाभ दर्शाने वाले संकेत उत्साजनक तस्वीर पेश करते हैं। उदाहरण के लिए विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत का प्रदर्शन सुधर कर 2015 और 2025 के बीच 81वें से 38वें स्थान पर पहुंच गया है। भारत में दायर पेटेंट की संख्या भी वर्ष 2020-21 में दर्ज 24,326 से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 68,176 हो गई है। आईएसआईडी की भारत औद्योगिक विकास रिपोर्ट, 2024-25 में भारत के जीईआरडी का कम आकलन किया गया है जो लगभग 1.25 फीसदी होने का अनुमान है। यह आंकड़ा 0.7 फीसदी से बेहतर है फिर भी कम है।

जीईआरडी को लेकर एक दूसरी बड़ी चिंता यह है कि इसका 60 फीसदी से अधिक हिस्सा व्यावसायिक उद्यमों की जगह दूसरे खंडों में इस्तेमाल होता है। अगर अधिक मात्रा में कारोबारी उद्यमों में इस रकम का इस्तेमाल हो तो उनकी प्रतिस्पर्द्धी क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। यह रकम सरकारी प्रयोगशालाओं में अधिक खर्च होती है जिसमें वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा संचालित प्रयोगशालाएं शामिल हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) जैसे मिशन-उन्मुख अनुसंधान एवं विकास संगठनों ने काफी सफलता हासिल की है, वहीं सरकारी प्रयोगशालाओं को अक्सर अपने नवाचारों के व्यवसायीकरण में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

कारोबार जगत में अनुसंधान एवं विकास कार्य अधिकांश हिस्सा मुट्ठी भर बड़ी कंपनियां करती हैं और ये ज्यादातर दवा और वाहन क्षेत्रों में हैं। भारतीय कंपनियों की अनुसंधान एवं विकास गतिविधि की उनके वैश्विक समकक्षों के साथ तुलना कर उद्योगपति एवं अर्थशास्त्री नौशाद फोर्ब्स ने इस समाचार पत्र में अपने स्तंभ में व्यावसायिक अनुसंधान एवं विकास गतिविधियां पांच गुना तक बढ़ाने की बात कही है।

भारतीय उद्योग द्वारा अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों को नजरअंदाज करना काफी हैरान करने वाला है, खासकर प्रतिस्पर्द्धा के विकास में इनकी अहमियत को देखते हुए यह बात और भी परेशान करती है। इसे नवीन गतिविधि में निहित बाजार विफलताओं से समझा जा सकता है जो निवेशकों को सार्वजनिक वस्तु जैसी प्रकृति के कारण पूरा लाभ प्राप्त करने की अनुमति नहीं देती हैं।

बाजार विफलताओं और इसके रणनीतिक महत्त्व को देखते हुए अमेरिका एवं अन्य औद्योगिक देशों की सरकारें राष्ट्रीय उद्यमों को दी जाने वाली सब्सिडी और अनुसंधान एवं विकास अनुबंधों पर अरबों डॉलर खर्च करती हैं जिनमें रक्षा उन्नत अनुसंधान परियोजना एजेंसी, नासा, और राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान जैसी एजेंसियां भी शामिल हैं। पश्चिमी देशों में औद्योगिक नवाचार का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत सार्वजनिक धन रहा है। उदाहरण के लिए टेस्ला को अपने नवीन इलेक्ट्रिक वाहन तैयार करने के दौरान अमेरिकी सरकार से कर क्रेडिट और अनुबंधों के अलावा पर्याप्त सहयोग मिला।

विकसित देशों ने विश्व व्यापार संगठन सब्सिडी और जवाबी शुल्क समझौते में अपवाद स्वरूप परियोजना लागत के 50 फीसदी तक अनुसंधान एवं विकास सब्सिडी प्रावधान किया है। इससे औद्योगिक सब्सिडी के अन्य सभी रूपों को प्रतिबंधित कर दिया गया।

भारत में वर्ष 2017 तक उद्योग में अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों को मुख्य रूप से 200 फीसदी की दर से और 2017-2021 के दौरान 150 फीसदी की दर से भारित कर कटौती के रूप में प्रोत्साहित किया गया था। वर्ष 2021 से केवल 100 फीसदी कटौती की अनुमति है। वर्ष 2024 में सरकार ने उच्च प्रभाव वाले अनुसंधान के लिए शिक्षा-उद्योग संपर्क को बढ़ावा देने के लिए पांच वर्षों में 50,000 करोड़ रुपये जुटाने के लिए अनुसंधान नैशनल रिसर्च फाउंडेशन (एएनआरएफ) की स्थापना की।

नवंबर 2025 में सरकार ने एएनआरएफ द्वारा प्रबंधित दो-स्तरीय संरचना के माध्यम से कम लागत वाले ऋणों और पूंजी हिस्सेदारी द्वारा एआई, क्वांटम, ऊर्जा और जैव-तकनीक जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए निजी क्षेत्र द्वारा संचालित नवाचार को बढ़ावा देने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के कोष के साथ अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) योजना शुरू की। एएनआरएफ और आरडीआई स्पष्ट रूप से नवीन गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए महत्त्वपूर्ण और जरूरी पहल हैं। विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए उन्हें अन्य प्रोत्साहनों और नीतियों द्वारा सहारा देने की की आवश्यकता है।

आत्मनिर्भर भारत दृष्टिकोण

वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में अनुसंधान एवं विकास व्यय के लिए वित्त मंत्री 200 फीसदी भारित कटौती बहाल करने पर विचार कर सकती हैं। भारित कटौती कंपनियों को उभरती बाजार आवश्यकताओं या अन्य रणनीतिक विचारों के लिए जल्दी से प्रतिक्रिया देने के लिए अनुसंधान एवं विकास करने से जुड़ी अधिक स्वतंत्रता प्रदान करती है। भारित कटौती एक लेखापरीक्षित विवरण के आधार पर प्रदान की जा सकती है मगर योजना के तहत की हुई गतिविधियों, विकसित प्रक्रियाओं एवं उत्पादों, विदेशी मुद्रा की बचत या कमाई, दायर पेटेंट और अर्जित लाइसेंसिंग शुल्क की जानकारी के लिए एक प्रावधान किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित हो पाएगा कि कर लाभ का नियमित या सामान्य रूप से दावा नहीं किया जाता है और वे वास्तव में वे नवीन गतिविधि को बढ़ावा देते हैं।

स्थानीय नवाचार को बढ़ावा देने के लिए एक और नीति तथाकथित लघु पेटेंट के माध्यम से मामूली नवाचारों की रक्षा करना हो सकती है जैसा कि जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन में प्रचलित है। पेटेंट प्रणाली मामूली नवाचारों को प्रोत्साहित करने में विफल रहती है क्योंकि नए आविष्कारों से जुड़े मानदंडों का नवीनता की तरफ अधिक झुकाव होता है। भारत एक लघु पेटेंट व्यवस्था अपनाने पर विचार कर सकता है जो मामूली वृद्धिशील नवाचारों, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों द्वारा किए गए नवाचारों को तीन से पांच वर्षों के लिए सीमित सुरक्षा प्रदान करता है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों के केंद्रीय बजटों ने नवाचार गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए पहल की हैं। इन पहल का फायदा उठाकर वर्ष 2026-27 के बजट में आत्मनिर्भर और विकसित भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए आवश्यक प्रगतिशील नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए भारित कर कटौती बहाल की जा सकती है। इसके अलावा एक लघु पेटेंट व्यवस्था भी तैयार की जानी चाहिए।


 (लेखक औद्योगिक विकास अध्ययन संस्थान, नई दिल्ली में निदेशक और मौद्रिक नीति समिति के सदस्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं )

First Published : January 19, 2026 | 10:14 PM IST