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अमरिंदर को प्रासंगिक बने रहनेके लिए लडऩी होगी लड़ाई

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 12:30 AM IST

सैनिक कभी मरा नहीं करते हैं, बस उनकी यादें फीकी पड़ जाती हैं। यह कहावत शायद इससे पहले कभी इतनी मुफीद नहीं थी। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह जब खुद को एक नई सियासी जंग के लिए तैयार कर रहे हैं तो उनके पास कुछ नए सहयोगी हो सकते हैं लेकिन वह खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की जद्दोजहद में उलझा पा सकते हैं।
लेकिन असल में यह सब एक पुराने सैनिक की योजनाओं का ही हिस्सा है। वह कांग्रेस से बाहर निकलने की राह पर हैं। अब यह कोई रहस्य नहीं है कि पद से हटाने के तरीके को लेकर कांग्रेस से अमरिंदर को खासी नाराजगी है। कांग्रेस भी पटियाला के महाराज के पार्टी से अलग होने पर शायद ही कोई अफसोस जताएगी। पंजाब में कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत का यह कहना इसकी तस्दीक ही करता है कि पार्टी में अपमानित किए जाने का अमरिंदर का दावा झूठा है।
इस पर अमरिंदर के एक समर्थक तल्ख अंदाज में कहते हैं कि रावत को उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री बनाने का भरोसा दिलाया गया है लेकिन भविष्य में रावत भी खुद को अमरिंदर जैसी स्थिति में ही पा सकते हैं। बहरहाल अभी तो रावत ने अपने जिम्मे सौंपे गए सभी काम बखूबी अंजाम दिए हैं। अमरिंदर की विदाई के लिए जिम्मेदार बताए जा रहे नवजोत सिंह सिद्धू को यह कहकर शांत करा दिया गया है कि पंजाब में कांग्रेस के कर्ताधर्ता वही हैं। राज्य में एक नए मुख्यमंत्री ने कमान संभाली है जिन्हें यह कुर्सी दिलाने वाले शख्स के प्रति आभार जताने में कोई हिचक नहीं है। अमरिंदर के सामने विकल्प भी बहुत कम रह गए हैं।
इसकी पूरी संभावना है कि वह कांग्रेस छोड़ देंगे। वैसे उनके लिए कांग्रेस से अलग होने का यह कोई पहला मौका नहीं होगा। उन्होंने 1984 में भी सेना के स्वर्ण मंदिर परिसर में प्रवेश करने के विरोध में लोकसभा की सदस्यता और कांग्रेस दोनों से इस्तीफा दे दिया था। उन्हें ऑपरेशन ब्लू स्टार के बारे में सूचना उस समय मिली थी जब वह शिमला के पास गोल्फ खेल रहे थे। उन्होंने फौरन कांग्रेस के अपने साथियों से अनुरोध किया कि उन्हें दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर अपनी पीड़ा से अवगत कराना चाहिए। लेकिन उन सभी लोगों ने कोई-न-कोई बहाना बनाया और अंत में अमरिंदर सिंह को सिर्फ एक साथी के साथ ही प्रधानमंत्री से मुलाकात के लिए जाना पड़ा। इससे इंदिरा खुश नहीं हुईं। फिर राजीव गांधी ने अमरिंदर सिंह को मनाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माने। अमरिंदर ने अपनी आत्मकथा लिखने वाले खुशवंत सिंह से कहा था, ‘गुरु गोविंद सिंह ने हमारे पुरखों को धर्म की रक्षा के लिए एक हुकुमनामा भेजा था। मैं किसी भी तरह अपने निर्णय से पीछे नहीं हट सकता था।’
फिर उन्होंने शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया और विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की। लेकिन बाद में उससे भी अलग होकर शिरोमणि अकाली दल (पंथिक) नाम से अपनी एक अलग पार्टी बना ली। लेकिन उन्हें 1997 के विधानसभा चुनाव में तगड़ा झटका लगा जब वह खुद अपनी सीट भी नहीं जीत सके।
ऐसा लगता है कि अमरिंदर सिंह का एक बार फिर कांग्रेस से बाहर आना और अपनी एक अलग पार्टी बनाना उस प्रयोग का ही दोहराव हो सकता है।
उनके सामने दूसरा विकल्प भाजपा में शामिल होने का भी है। लेकिन वह ऐसा कदम अपनी शर्तों पर ही उठाएंगे। लगता है कि अमरिंदर ने भाजपा से जुडऩे के लिए कृषि कानूनों को निरस्त करने या कम-से-कम उन्हें कुछ साल के लिए स्थगित करने की जो शर्त रखी थी, उसे नकार दिया गया है। दरअसल उनकी इस मांग को मानने से खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ जाती। इसकी वजह यह है कि प्रधानमंत्री इन कानूनों को वापस लेने से मना कर चुके हैं।
पंजाब में भाजपा की मत हिस्सेदारी लगातार गिरावट पर है। वर्ष 2007 में 8.21 फीसदी मत पाने वाली भाजपा को 2012 के चुनाव में 7.13 फीसदी और 2017 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में सिर्फ 5.4 फीसदी मत मिले थे। इस चुनाव में उसने 23 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे जिनमें से सिर्फ तीन ही जीत पाए थे। गठबंधन साझेदार शिरोमणि अकाली दल ने कृषि कानूनों के मसले पर जब भाजपा का साथ छोड़ा था तो पार्टी ने त्वरित प्रतिक्रिया में राज्य की सभी 117 सीट पर चुनाव लडऩे की घोषणा कर दी थी। लेकिन भाजपा को भी बखूबी मालूम है कि शायद उसके पास इन सभी सीटों पर उतारने लायक उम्मीदवार भी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में अमरिंदर के साथ कोई चुनावी सहमति होना और भविष्य में बनने वाली पार्टी के साथ गठजोड़ करने की बात कल्पना से परे भी नहीं है।
पंजाब के सियासी परिदृश्य में एक सिरे पर आम आदमी पार्टी भी है जो आक्रामक ढंग से यह प्रचारित करने में लगी है कि कांग्रेस और अकाली दल दोनों ही सियासी तौर पर दिवालिया हो चुकी हैं। अकाली दल ने इस चुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठजोड़ किया है और उसे 20 सीट दी गई हैं।
अभी यह साफ नहीं है कि अमरिंदर सिंह की संभावित पार्टी और भाजपा के बीच किस तरह के रिश्ते होंगे? लेकिन यह अनुमान लगाना एक हद तक सुरक्षित है कि दोनों के लिए यह रिश्ता आपसी लाभ का ही होगा। किसे मालूम कि यह संबंध आगे चलकर तीन पुराने दोस्तों- अकाली दल, भाजपा एवं अमरिंदर की एक तिकड़ी का भी रूप ले ले।

First Published : October 5, 2021 | 11:16 PM IST