रविवार को पेश किए गए बजट में सरकार ने शेयरों के डिविडेंड और म्युचुअल फंड से होने वाली कमाई पर मिलने वाली एक अहम टैक्स छूट को खत्म कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से टैक्स के नियम तो आसान होंगे, लेकिन जो लोग उधार या लोन लेकर निवेश करते हैं, उनके लिए खर्च और टैक्स दोनों बढ़ जाएंगे।
अब तक अगर कोई व्यक्ति शेयर या म्युचुअल फंड में निवेश करने के लिए लोन या मार्जिन के जरिए पैसा उधार लेता था, तो उस लोन पर दिए गए ब्याज की एक तय सीमा तक रकम को टैक्स से घटाने की सुविधा मिलती थी। इससे निवेशकों का टैक्स बोझ कुछ हद तक कम हो जाता था।
नए बजट में सरकार ने यह सुविधा पूरी तरह हटा दी है। अब अगर किसी निवेशक ने उधार लेकर डिविडेंड देने वाले शेयर या म्युचुअल फंड खरीदे हैं, तो वह लोन के ब्याज को अपनी टैक्स योग्य आय से नहीं घटा सकेगा। यानी डिविडेंड या म्युचुअल फंड से होने वाली पूरी कमाई पर टैक्स देना होगा।
रोइनेट सॉल्यूशन के मैनेजिंग डायरेक्टर समीर माथुर के अनुसार, इस बदलाव के बाद उधार लेकर निवेश करने वालों की टैक्स देनदारी बढ़ जाएगी। ब्याज का फायदा खत्म होने से निवेश की लागत सीधे तौर पर बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का सबसे ज्यादा असर उन निवेशकों पर पड़ेगा जो कर्ज लेकर निवेश करते हैं। ग्रो म्युचुअल फंड के सीईओ वरुण गुप्ता ने कहा कि लंबे समय के लिए बिना कर्ज के म्युचुअल फंड में निवेश करने वालों पर इसका खास असर नहीं होगा, लेकिन लीवरेज यानी उधार पर आधारित निवेश रणनीतियां प्रभावित होंगी।
कानूनी विशेषज्ञ कुनाल सावनी के मुताबिक, इस बदलाव से कुछ निवेशकों पर टैक्स का बोझ काफी बढ़ सकता है। इसमें छोटे निवेशक, अमीर निवेशक और कंपनियां शामिल हैं। बाजार में उतार-चढ़ाव के दौर में यह फैसला निवेशकों के लिए और मुश्किलें पैदा कर सकता है।
कानूनी जानकार आदित्य भट्टाचार्य का कहना है कि सरकार टैक्स छूट को सीमित करना और गलत दावों को रोकना चाहती है। इसी मकसद से ब्याज पर मिलने वाली छूट को खत्म किया गया है और कुछ आय को सीधे टैक्स के दायरे में लाया गया है।