सोलहवें वित्त आयोग ने 2026-27 से 2030-31 तक की अवधि के लिए राज्यों के साथ बांटे जाने वाले कर पूल से स्थानांतरण को 41 फीसदी के स्तर पर बरकरार रखा है। पिछले वित्त आयोग की रिपोर्ट में भी इसी स्तर की सिफारिश की गई थी। इस बीच अनुदानों में बदलाव किया गया है कर विभाजन मानकों में राज्यों के जीडीपी योगदान को शामिल किया गया है तथा बजट से इतर उधारियों को समाप्त करने जैसे राजकोषीय सुधारों की मांग की गई है।
28 में से 18 राज्यों द्वारा विभाजन योग्य कर पूल में राज्यों की हिस्सेदारी को 41 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी करने की मांगों के बावजूद आयोग ने कहा कि देश के कुल गैर ऋण राजस्व में राज्य पहले ही दो तिहाई से अधिक की हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में कोई भी अतिरिक्त इजाफा केंद्र सरकार के राजकोष और राष्ट्रीय दायित्व निभाने की उसकी क्षमता पर असर डालेगा।
संशोधित क्षैतिज कर विभाजन ढांचे के तहत आयोग ने जीडीपी योगदान को एक नए मानक के रूप में पेश किया है। उसे कुशलता और राज्यों के योगदान को मान्यता देने के लिए 10 फीसदी भार दिया गया है। आयोग ने कहा, ‘चरणबद्धता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए हमने निर्णय लिया कि इस मानदंड को प्रदत्त भार ऐसा होना चाहिए कि यह बिना राज्यों के हिस्सों में किसी बड़े बदलाव का कारण बने बगैर केवल एक दिशात्मक बदलाव को दर्शाए।’
आयोग ने मानदंड में और बदलाव करते हुए कर प्रयास को हटा दिया है, जबकि जनसंख्या के हिस्से को 2.5 प्रतिशत अंक बढ़ा दिया है और क्षेत्रफल, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन तथा प्रति व्यक्ति जीएसडीपी दूरी के भार को कम कर दिया है। 14वें वित्त आयोग के सदस्य एम. गोविंद राव का मानना है कि जीडीपी योगदान को शामिल करना आयोग द्वारा एक सोची समझी जोखिम सुरक्षा है, ताकि प्रति व्यक्ति आय अंतर को दिए गए भारी भार के कारण बड़े राज्यों को इस समानता वाले पहलू पर नुकसान न उठाना पड़े।
पंद्रहवें वित्त आयोग के सचिव अरविंद मेहता ने कहा, ‘लंबी अवधि में मुझे लगता है कि तेज जीडीपी वृद्धि वाले राज्यों को अधिक भार देना शुरू करना अच्छा विचार होगा। लेकिन इसके साथ ही कुल मिलाकर हमें समता के संतुलन के मुद्दे पर भी ध्यान रखना होगा।’
इस बदलाव का औद्योगिक राज्यों मसलन गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश को मिलने वाली राशि पर सीधा असर नजर आया है और उन्हें मिलने वाली कर विभाजन राशिमें इजाफा हुआ है। कर्नाटक की हिस्सेदारी में सबसे अधिक इजाफा हुआ है। उसके बाद केरल, गुजरात और हरियाणा का स्थान है जिन्हें क्रमश: 0.48, 0.45 और 0.28 प्रतिशत अंकों का लाभ हुआ।
इसके विपरीत अधिक आबादी वाले प्रांतों मसलन उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी में कमी आई। पिछले वित्त आयोगों से एक बड़े बदलाव के रूप में, पैनल ने राजस्व घाटा अनुदान न देने की सिफारिश की है। उसका तर्क है कि राज्यों के पास राजस्व बढ़ाने और व्यय को तर्कसंगत बनाने की पर्याप्त संभावनाएं हैं।
आयोग ने कहा, ‘जब राज्यों को यह उम्मीद होती है कि उनके राजस्व खाते में कमी को अनुदान के माध्यम से पूरा किया जाएगा, तो सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने, कर प्रशासन में सुधार करने या राजस्व व्यय को नियंत्रित करने जैसे कठिन लेकिन आवश्यक राजकोषीय सुधार करने की उनकी प्रेरणा कमजोर हो जाती है।’ आयोग का मत है कि ये अनुदान राजकोषीय अनुशासन को नरम करते हैं और लचीलापन के बजाय निर्भरता को बढ़ावा देते हैं।
इसके अतिरिक्त, आयोग ने किसी भी क्षेत्र-विशिष्ट या राज्य-विशिष्ट अनुदान की सिफारिश नहीं की है, लेकिन 2026-31 के दौरान ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के लिए 7.91 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जिसमें 60 और40 का ग्रामीण-शहरी विभाजन है और जल, स्वच्छता तथा शहरी बुनियादी ढांचे पर विशेष जोर दिया गया है।
आयोग ने राज्यों के आपदा प्रतिक्रिया और शमन कोष के लिए 2.04 लाख करोड़ रुपये और राष्ट्रीय कोषों के लिए लगभग 79,000 करोड़ रुपये की भी सिफारिश की है, जिन्हें एक संशोधित आपदा जोखिम सूचकांक का उपयोग करके आवंटित किया जाएगा। मेहता ने इस कदम को ‘सभी पूर्ववर्ती वित्त आयोगों से एक बहुत बड़ा बदलाव’ बताया, और कहा यह आकलन करने के लिए गहन विश्लेषण की आवश्यकता होगी कि यह धारणा यथार्थवादी है या नहीं।
आयोग ने सिफारिश की है कि राज्यों को पूंजीगत निवेश के लिए दी गई विशेष सहायता के तहत दिए गए ऋणों को छोड़कर राज्यों का राजकोषीय घाटा जीएसडीपी का अधिकतम 3 प्रतिशत तक सीमित किया जाए और केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.5 फीसदी तक कम किया जाए।
आयोग ने राज्यों द्वारा की जाने वाली बजट से इतर उधारी को पूरी तरह समाप्त करने का भी आह्वान किया है, ताकि ऐसी सभी देनदारियों को बजट में शामिल किया जा सके। साथ ही, राज्यों के राजकोषीय उत्तरदायित्व कानूनों में संशोधन करने की सिफारिश की है, ताकि एकरूपता और आयोग के एकीकरण रोडमैप के साथ सामंजस्य सुनिश्चित हो सके। सरकार ने कहा है कि उसने राज्यों के लिए अनुशंसित शुद्ध उधारी सीमा को सिद्धांततः स्वीकार कर लिया है, जबकि अन्य प्रस्तावों जैसे बजट से इतर उधारी और केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा आदि पर अलग से विचार किया जाएगा।
कर- विभाजन में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आयोग ने आगे सिफारिश की है कि केंद्र सरकार प्रत्येक वर्ष नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा अनुच्छेद 279 के तहत प्रमाणित शुद्ध प्राप्तियों से संबंधित आंकड़े सार्वजनिक करे। इस प्रस्ताव को सरकार ने स्वीकार कर लिया है। राव का अनुमान है कि यह कदम इस तथ्य से उत्पन्न हुआ है कि प्रत्येक राज्य को प्राप्तियां अनुमानित सकल कर राजस्व के आधार पर दी जाती हैं, जिससे कुछ राज्यों को लगता है कि उन्हें उनका पूरा हिस्सा नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि यह समायोजन इस चिंता को दूर करने के लिए है।