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भविष्य के युद्धों में मचेगा ध्वनि का शोर: सैन्य व रणनीतिक मोर्चे पर ‘अकूस्टिक्स’ बनेगा सबसे घातक हथियार

अकूस्टिक्स की समुद्री कामों में अहम भूमिका है क्योंकि विद्युत चुंबकीय तरंगें पानी में तेजी से क्षीण हो जाती हैं

Published by
Ajay Kumar   
Last Updated- February 12, 2026 | 4:44 AM IST

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को कब्जे में लेने के लिए अमेरिका का सैन्य अभियान दुस्साहस की वजह से चर्चा में रहा। मगर इसने सुर्खियां इन खबरों से भी बटोरीं कि मादुरो के वफादार और करीबी लोगों को तीव्र ध्वनि तरंगों या निर्देशित-ऊर्जा के जरिये लाचार कर दिया गया था। उधर रूस के साथ संघर्ष में कम ऊंचाई वाले ड्रोन का पता लगाने के लिए डिस्ट्रिब्यूटेड अकूस्टिक (ध्वनि) तैनात करने का यूक्रेन का कदम भी चर्चा में है। कई देश समुद्र तल के संसाधनों का पता लगाने और निकालने के लिए अकूस्टिक प्रणालियां आजमा रहे हैं, जिससे साबित होता है कि अकूस्टिक्स (ध्वनि विज्ञान) अब बेहद अहम सैन्य और आर्थिक तकनीकी मोर्चा बन गया है।

अकूस्टिक्स की समुद्री कामों में अहम भूमिका है क्योंकि विद्युत चुंबकीय तरंगें पानी में तेजी से क्षीण हो जाती हैं, लेकिन बहुत कम फ्रीक्वेंसी वाली ध्वनि तापमान और नमक की परतों से बने प्राकृतिक ध्वनि मार्गों के जरिये हजारों किलोमीटर जा सकती हैं। यही वजह है कि प्रथम विश्व युद्ध से ही पनडुब्बी संचालन, संचार और पहचान अकूस्टिक्स पर ही निर्भर हैं, जो सादे हाइड्रोफोन से उन्नत डिजिटल सोनार तक पहुंच गई है। किंतु हाल के वर्षों में अकूस्टिक्स का विस्तार समुद्र के परे विवादित विद्युत चुम्बकीय वातावरण, सुरंगों, बंकरों, जंगलों और पहाड़ी इलाकों तक हो गया है।

अकूस्टिक्स में खर्च जितना बढ़ाते हैं, उतना बड़ा दायरा और मजबूती मिल जाती है। 20 हर्ट्ज से कम फ्रीक्वेंसी लंबी दूरी तय कर लेती है और समुद्र की परतों के बीच मुड़ जाती है मगर इसके लिए सैकड़ों मीटर लंबे टोड ऐरे और तटीय ट्रांसमिटर्स के वास्ते बड़े मस्तूल वाली विशाल प्रणाली चाहिए। उन्नत सामग्री खास तौर पर हाई-परफॉरमेंस सिंगल-क्रिस्टल पीएजोइलेक्ट्रिक्स, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और अधिक कुशल डिजाइन के कारण ये प्लेटफॉर्म छोटे होते जा रहे हैं। किंतु अकूस्टिक्स में असली बदलाव तीन तकनीकों से आया है – डिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग, अडैप्टिव बीमफॉर्मिंग और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) से पता लगाना तथा श्रेणी तय करना। इनसे छोटे और बेहद संवेदनशील सेंसरों के नेटवर्क में डिजिटल तरीके से तालमेल बिठा दिया जाता और ये बड़े वर्चुअल अपरचर के तौर पर काम करते हैं।

जहाजों, पनडुब्बियों, मानव रहित प्लेटफार्मों और समुद्र तल में लगे नोड पर मौजूद सेंसरों में डेटा बिल्कुल वैसे ही जोड़ दिया जाता है, जैसे गूगल मैप्स यातायात की सटीक और तात्कालिक जानकारी देने के लिए शोर-शराबे भरी लाखों सूचनाएं इकट्ठी करता है। डिस्ट्रिब्यूटेड फाइबर-ऑप्टिक अकूस्टिक सेंसिंग और क्वांटम सेंसर जैसी हालिया सफलताओं ने संवेदनशीलता में जबरदस्त बढ़त की संभावना दिखाई है, जिससे अकूस्टिक्स सामरिक रूप से अहम तकनीक बन गई है।

दुनिया भर के देश निर्णायक सैन्य और रणनीतिक बढ़त के लिए उन्नत अकूस्टिक्स का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं। अमेरिका शीत युद्ध काल की सोसस जैसी प्रणालियों से बढ़कर अकूस्टिक श्रेष्ठता वाले बेहद गोपनीय कार्यक्रमों तक पहुंच गया है, जिसमें नए सेंसर और बेआवाज तकनीक शामिल हैं। साथ ही वह अपनी सेना के लिए अकूस्टिक गनशॉट और ड्रोन पता लगाने वाली प्रणाली भी तैनात कर रहा है। रूस बिना आवाज चलने वाली पनडुब्बियों, उन्नत सोनार, आर्कटिक निगरानी नेटवर्क और अकूस्टिक काउंटर बैटरी तथा बीयूएच1ए सोवा जैसी हथियार पता लगाने वाली प्रणालियों में निवेश कर रहा है। चीन सबसे तेज  है और दक्षिण चीन सागर में पानी के नीचे एकीकृत निगरानी प्रणाली ‘ग्रेट अंडरवाटर वॉल ऑफ चाइना’ बना रहा है। इस तरह वह इस प्रमुख समुद्री क्षेत्र को पनडुब्बी नष्ट करने वाला क्षेत्र बनाने के तरीके ढूंढ रहा है। फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य देश भी उन्नत अकूस्टिक तकनीकों में खूब निवेश कर रहे हैं।

ज्यादा ठंडे अटलांटिक और प्रशांत के लिए बनाई पश्चिम की सोनार तकनीकें हिंद महासागर क्षेत्र में कागरगर नहीं हैं। सतह पर गर्म पानी, घटती-बढ़ती लवणता, बड़े थर्मोक्लाइन (जहां पानी तेजी से ठंडा होता है) और मॉनसून से बदलते हालात के कारण हिंद महासागर में ये तकनीकें खराब हो जाती हैं। हिंद महासागर क्षेत्र के हालात के अनुकूल अकूस्टिक्स अभी तक नहीं बनी हैं। इस माहौल में माहिर होने पर हिंद महासागर क्षेत्र में पता लगाने, छिपने और समुद्र के नीचे नियंत्रण करने में मदद मिलेगी। अपने भूगोल, लगातार उपस्थिति और बढ़ती तकनीकी क्षमता के साथ भारत इस क्षेत्र में अगुआ बन सकता है।

भारत के लिहाज से अहम समुद्री मार्गों और अंडमान-निकोबार के संवेदनशील इलाके में दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए उन्नत अकूस्टिक्स जरूरी है। यह संचार केबल, सेंसर नेटवर्क और गहरे समुद्र के ढांचे की रक्षा भी करता है। समुद्र के लिए ध्वनि के जरिये लगातार निगरानी ही भविष्य है। समुद्र से परे घने जंगलों में निगरानी, ड्रोन का पता लगाने, सुरंग और बंकरों पर नजर रखने और नक्सल विरोधी अभियानों में भी अकूस्टिक्स मदद कर सकता है। इसके आर्थिक आयाम भी उतने ही अहम हैं। पॉलिमेटलिक नोड्यूल तलाशने और निकालने के लिए भारत को इंटरनैशनल सीबेड अथॉरिटी से गहरे समुद्र में मिले ब्लॉक अकूस्टिक के जरिये मैपिंग, निगरानी और पर्यावरण आकलन करने वाली तकनीकों पर ही निर्भर हैं। लिहाजा मजबूत स्वदेशी अकूस्टिक क्षमताओं का विकास भारत के लिए विकल्प नहीं रणनीतिक जरूरत है।

1970 के दशक के स्वदेशी सोनार और उसके बाद के शोध ने भारत में अधिक उन्नत क्षमताओं की नींव रखी है। हाल ही में आईडेक्स-इंडियन नेवी स्प्रिंट चैलेंज 2022 ने इसमें नई जान फूंक दी, जब उसने स्टार्टअप को एआई से अकूस्टिक क्लासिफिकेशन, कम आवाज वाले हाइड्रोफोन एरे, पानी के नीचे मानवरहित वाहनों के लिए छोटे सोनार, लगातार लंबी दूरी तक निगरानी तथा छोटे आकार के कम फ्रीक्वेंसी वाले ट्रांसमिटर एवं रिसीवर बनाने के वास्ते प्रोत्साहन दिया।

अग्रणी नौसैनिक शक्तियों के बराबर खड़े होने के लिए अब भारत को स्वदेशी अकूस्टिक विकास तेज करना चाहिए, जिसमें राष्ट्रीय सागर प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और नौसेना प्रयोगशालाएं अहम भूमिका निभा रही हैं। अकूस्टिक्स के लिए कार्य योजना में सबसे पहले एक राष्ट्रीय सागर ओशन ध्वनिक ग्रिड बनाने पर विचार हो सकता है, जो अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर के इलाकों को समेटते हुए सुनने वाला स्थायी तंत्र होगा।

दूसरा, अंतरिक्ष या साइबर एजेंसियों की तरह अकूस्टिक वारफेयर एजेंसी बनाई जा सकती है, जो रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन, नौसेना, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, ओशन-मॉडलिंग टीमों, शिक्षा और उद्योग के प्रयासों को साथ जोड़े। तीसरा, बिना आवाज आगे बढ़ने, मेटामटेरियल, डीप-सी बैटरी और उन्नत पीएजोइलेक्ट्रिक सेंसर में स्वदेशी तकनीक का विकास तेज किया जाए। इसके लिए आईडेक्स जैसा चैलेंज मॉडल अपना सकते हैं। चौथा, इस क्षेत्र में प्रतिभा और नवाचार बढ़ाने के लिए छात्रवृत्ति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और दोहरे उपयोग वाला नागरिक तंत्र होना चाहिए।

भविष्य के युद्धों में अकूस्टिक्स सैन्य ताकतों की मदद ही नहीं करेगी, उन्हें गढ़ेगी भी। भारत ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां अकूस्टिक्स में महारत विकल्प नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। अगले दशक में जमीन और समुद्र में उसी देश का सिक्का चलेगा, जिसके पास अकूस्टिक खुफिया क्षमता है।

(लेखक, यूपीएससी के चेयरमैन हैं और भारत के रक्षा सचिव रह चुके हैं। लेख में निजी विचार हैं)

 

First Published : February 12, 2026 | 4:44 AM IST