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भारत की व्यापारिक उपलब्धियों और बजट के बाद अब हो असल मुद्दों पर बात

यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते, अमेरिका के साथ संबंधों में गर्मजोशी और यथार्थवादी बजट के बाद लाभ उठाना है तो कुछ वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए

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आर जगन्नाथन   
Last Updated- February 10, 2026 | 10:02 PM IST

पिछले कुछ दिनों में जो घटनाक्रम हुए हैं उनसे ऐसा लगता है कि अर्थशास्त्र में एक सप्ताह उतना ही लंबा समय होता है जितना राजनीति में। इसकी शुरुआत भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच ‘सभी व्यापार करार की जननी’ की घोषणा के साथ हुई और इसके दो दिन बाद भारत में अब तक की सबसे बेहतरीन आर्थिक समीक्षा प्रस्तुत की गई। इसके बाद लोक सभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट पेश किया जो लोकलुभावनवाद से दूरी बनाते हुए दीर्घकालिक लक्ष्यों एवं लाभों पर केंद्रित है। आखिर में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के नाटकीय सोशल मीडिया पोस्ट ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा की जिसके मुताबिक भारत से निर्यात पर शुल्क घटाकर 18 फीसदी कर दिया जाएगा और इसके बदले अमेरिकी वस्तुओं पर शून्य शुल्क लगेगा।

कोई यह सोच कर हैरान हो सकता है कि क्या अत्यधिक सतर्क आर्थिक समीक्षा और केंद्रीय बजट घटनाओं से आगे निकल गए हैं, खासकर अमेरिका के साथ ‘ग्रैंडमदर ऑफ ऑल डील्स’ के बाद? लेकिन यह सोचना ठीक नहीं होगा क्योंकि समीक्षा की मुख्य सलाह (जिसे बजट में गंभीरता से लिया गया है) पहले की तरह ही महत्त्वपूर्ण है। हम महज सात दिनों में सतर्कता की जगह उत्साह से लबरेज मिजाज में नहीं बदल सकते जो हमारी राष्ट्रीय प्रवृत्ति रही है।

मगर करार हो या नहीं हो भारत को एक ऐसी दुनिया में अपना काम करना है जिसमें न केवल भू-राजनीतिक दूरी बढ़ रही है बल्कि बहुपक्षीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाएं भी फिर से व्यवस्थित की जा रही हैं। ऐसे हालात में भारत के हितों की रक्षा करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो रहा है। हमारी विफलता की आशंका बाहरी से अधिक आंतरिक स्तर पर है क्योंकि हमारे पास एक कठोर प्रणाली है जो न केवल बदलाव से दूर भागती है बल्कि अक्सर इसके खिलाफ भी रहती है।

आइए केवल व्यापार समझौतों पर विचार करते हैं। यह मानते हुए कि हमें उन्हें सफल बनाना है और हमारी अपनी शुल्क एवं गैर-शुल्क बाधाएं कई क्षेत्रों में शून्य होने जा रही हैं, निर्यात और घरेलू बाजार हिस्सेदारी के लिए प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्द्धा करने के लिए अपने व्यवसायों को तैयार करने का काम कठिन है। सरकार और अफसरशाही (जिसमें सीमा शुल्क प्रशासन भी शामिल है) को इसे सफल बनाने के लिए काम करने की आवश्यकता है।

भारत के तब भी बड़ी वैश्विक कंपनियों के जागीरदार बन जाने की आशंका है क्योंकि शुल्कों में कटौती के साथ ही लाइसेंसिंग और आयात-संचालित घरेलू वृद्धि से कई कंपनियों के लिए राह आसान हो जाती है जैसा कि चीन से सस्ते आयात के मामले में हुआ है। यहीं पर घरेलू नवाचार आगे बढ़ाने और व्यवसायों को प्रतिस्पर्द्धी बनाने पर आर्थिक समीक्षा की टिप्पणियां महत्त्वपूर्ण हैं।

समीक्षा में कहा गया है कि ‘भारत का निजी क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से जोखिम से बचने वाला और तकनीक लाइसेंसिंग या आयात के साथ सहज रहा है तथा अनुसंधान एवं विकास के प्राथमिक इंजन के रूप में आगे बढ़ने में विफल रहा है। वैश्विक स्तर पर तकनीक का परिदृश्य दो हिस्सों में बंटता नजर आ रहा है और भारत अब किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं रह सकता है।’

शेयर बाजार और रुपया एक झटके में कुछ दिनों के लिए ऊपर चढ़ सकते हैं मगर अंतर्निहित जोखिम और बाधाएं बनी हुई हैं। समीक्षा में आश्चर्य जताया गया कि भारत की वृहद आर्थिक स्थिरता बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित करने के लिए पर्याप्त क्यों नहीं है। पोर्टफोलियो निवेशक अपना निवेश निकाल रहे हैं और अन्य प्रमाण बताते हैं कि कई धनी भारतीय देश से बाहर दुबई जैसे स्थानों पर जा रहे हैं। स्पष्ट रूप से हमें अपने घर को दुरुस्त करने के लिए काफी कुछ करना होगा।

‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ हमें एक एक्सप्रेस ट्रेन की तरह लग सकता है क्योंकि हम बदलाव की धीमी रफ़्तार के आदी हैं। मगर नाटकीय रूप से बदलते बाहरी परिवेश में यह एक बैलगाड़ी की तरह ही है जो धीरे-धीरे चलती है। हमें समीक्षा के मूल संदेश को सही ढंग से समझना चाहिए। समीक्षा में सुधार तेजी से करने के लिए चौतरफा सहयोग की जरूरत बताई गई है क्योंकि कठिन सुधारों के लिए सभी हितधारकों को बदलाव की वास्तविकता को स्वीकार करने की आवश्यकता होती है। इन हितधारकों में सरकारों (केंद्र और राज्य दोनों) से लेकर अफसरशाही, कारोबार, मजदूर संघ, किसान और सामान्य भारतीय परिवार शामिल सभी शामिल हैं। सभी को एक साथ मिलकर काम करने के लिए प्रेरित करने का आशय है कि राजनीति को चुनावी नफा-नुकसान से आगे बढ़ना होगा।

इसका मतलब है कि सरकार को विपक्षी दलों, राज्य सरकारों, व्यवसायों (बड़े और छोटे दोनों) और आम नागरिकों को एक साझा लक्ष्य की ओर काम करने के लिए प्रेरित करना होगा। जरूरी हुआ तो कुछ त्याग भी करने होंगे। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसकी शुरुआत इस बदलाव में नेतृत्व की भूमिका की एक प्रबुद्ध राजनीतिक समझ के साथ होनी चाहिए। मोदी सरकार को कुछ मोर्चों पर तत्काल काम शुरू कर देना चाहिए।

पहला है संवाद। सुधार अब केवल कानूनी और नीतिगत बदलावों के बारे में नहीं हैं बल्कि विभिन्न हितधारकों को भी विश्वास में लेने की भी आवश्यकता है। इसका मतलब है कि आगे क्या होने वाला है इसकी जानकारी देने के लिए संवाद जरूरी है। यह संवाद सरकार के भीतर शुरू होना चाहिए जिसका अर्थ है कि अगर सरकार को कारोबार की राह में बाधा बनने के बजाय प्रोत्साहन देना है तो मंत्रालयों और अफसरशाही के वरिष्ठ एवं निचले दोनों स्तरों कर यह बात पूरी तरह साफ होनी चाहिए कि उनसे क्या अपेक्षा है। कर और प्रवर्तन शाखाओं के साथ से सख्ती से बात की जानी चाहिए।

दूसरी बात निगरानी और सहयोग है। जब बदलाव तेज गति से होते हैं तो एक पक्ष जीतेगा और दूसरा पक्ष हारेगा। जब तक हारने वालों की पहचान जल्दी नहीं हो जाती और उन्हें आवश्यक बदलाव करने में मदद नहीं दी जाती है, वे बाधा बने रहेंगे। कभी-कभी विजेताओं को भी मदद की जरूरत होती है क्योंकि शुरुआती सफलता का मतलब है कि उन्हें विस्तार करने में सक्षम बनाया जाना चाहिए।

तीसरी बात, निर्णय लेने से पहले मशविरा करना जरूरी है। सरकार को कारोबार जगत और अमीर लोगों से मशविरा करना चाहिए ताकि वह विकास और नवाचार के लिए सही नीतियां और समर्थन ढांचा तैयार कर सके। उदाहरण के लिए 2019 में कर में कटौती और अन्य कर सुधार भारतीय उद्योग जगत से बड़े पैमाने पर निवेश लाने में सफल क्यों नहीं हुए? व्यवसाय अनुसंधान एवं विकास में निवेश क्यों नहीं कर रहे हैं और विशेष रूप से वे जिनके पास (सूचना-प्रौद्योगिकी सेवा कंपनियों से लेकर अंबानी, अदाणी, टाटा, बिड़ला, महिंद्रा और अन्य बड़े उद्योगपति) धन की कोई कमी नहीं है? नए करोड़पति भारत छोड़कर क्यों जा रहे हैं? क्या यह इस धारणा के कारण है कि कर या प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा उन्हें बहुत अधिक परेशान किया जा रहा है या यह सिर्फ एक शोषणकारी सरकारी व्यवस्था से निपटने से जुड़ा रोजमर्रा का दर्द है?

चौथा पहलू है राज्य और स्थानीय निकाय। राज्य सरकारों और विशेष रूप से गैर-राजग दलों के नेतृत्व वाली सरकारों को नए सुधार को लेकर बनने वाली सहमति का हिस्सा होना चाहिए। बातचीत राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हो सकती है मगर शासन में शामिल राज्यों और निचली संस्थाओं की भी भागीदारी होनी चाहिए। जरूरी नहीं है कि भाजपा शासित राज्य बेहतर प्रदर्शन कर रहे हों क्योंकि वे क​थित ‘डबल-इंजन’ सरकार के तहत काम कर रहे हैं। अगर विपक्ष को शिकायतें हैं तो भाजपा शासित राज्य सुधारों को लेकर उत्साहित क्यों नहीं दिख रहे हैं? वे पानी, सड़कों और अन्य जरूरी सेवाओं में निवेश कर अपने शहरी क्षेत्रों को तरक्की करने क्यों नहीं दे रहे हैं? अगर शहरी प्रशासन विकास की कुंजी बनने जा रहा है तो शहरों का प्रदर्शन इतना खराब क्यों है?

पांचवीं बात, हमारे सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों के साथ बातचीत होनी चाहिए खासकर राज्य और स्थानीय निकाय स्तर पर ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन पर जरूरत से अधिक नियम-कायदों का बोझ नहीं है। ‘उद्यमशील राज्य’ का निर्माण (जैसा कि आर्थिक समीक्षा में सुझाया गया है) का मतलब है कि हमारे पास तंत्र में कमजोर और शोषणकारी अधिकारियों की कोई जगह नहीं हो सकती जब एमएसएमई न केवल नौकरियों के लिए बल्कि प्रतिस्पर्द्धी आपूर्ति श्रृंखलाओं के सफल निर्माण के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं।

छठी बात, हमें कभी भी कृषि क्षेत्र को नहीं भूलना चाहिए जिसमें देश में सबसे कम सुधार कार्य हुए हैं। साल 2021 में तीन कृषि सुधार कानूनों को वापस लेने के लिए विवश होने के बाद मोदी सरकार ने किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के निर्माण को प्रोत्साहित कर, मत्स्य पालन एवं पशुपालन को विशिष्ट सहायता देकर और नारियल, कोको और काजू (इस बजट में) जैसे उच्च-मूल्य वाले कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने की कोशिश की है। मगर इसे लघु, मझोले और बड़े किसानों के साथ भी जुड़ना होगा और उनके मन से यह सोच निकालनी होगी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) कृषि क्षेत्र की सभी बीमारियों का इलाज हैं। एमएसपी एक जरूरत है मगर समाधान नहीं हैं। सरकार को संवाद शुरू करने के लिए अगली बार किसानों के दिल्ली की सीमाओं पर इकट्ठा होने तक इंतजार नहीं करना चाहिए।

अगर समस्याओं को ताकत में बदलना है (जैसा आर्थिक समीक्षा में सुझाव दिया गया है) तो इन राजनीतिक-आर्थिक चर्चाओं और हितधारकों के साथ संवाद पर वास्तविक सुधार लागू करने से पहले अमल किया जाना चाहिए। यह केवल बजट या व्यापार समझौतों से नहीं किया जा सकता है। वास्तविक कार्य तो इन चीजों के मुकम्मल होने के बाद शुरू होते हैं।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

First Published : February 10, 2026 | 9:55 PM IST