चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था के स्थिर मूल्यों पर 7.4 फीसदी की दर से वृद्धि हासिल करने का अनुमान है। वर्ष 2024-25 में इसमें 6.5 फीसदी की वृद्धि हुई थी। कोविड-19 महामारी के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख थीम लगातार उच्च सरकारी पूंजीगत व्यय रही है।
महामारी के बाद आर्थिक सुधार में सहयोग करने के अलावा, विचार यह भी था कि अधिक सरकारी पूंजीगत व्यय और तीव्र भौतिक अधोसंरचना निर्माण निजी निवेश को आकर्षित करेगा। निजी निवेश कई वर्षों से सुस्त रहा है, लेकिन मध्यम से दीर्घकालिक अवधि में उच्च आर्थिक वृद्धि बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है। जैसा कि इस अखबार में मंगलवार को प्रकाशित एक विश्लेषण ने दिखाया, निजी क्षेत्र के निवेश की गति में वृद्धि के शुरुआती संकेत नजर आ रहे हैं।
करीब 700 से अधिक सूचीबद्ध कंपनियों (बैंक, वित्तीय सेवा, बीमा और तेल एवं गैस कंपनियों को छोड़कर) के अध्ययन से पता चलता है कि उनकी संयुक्त अचल परिसंपत्तियों में साल-दर-साल आधार पर 13.1 फीसदी का इजाफा हुआ। यह बढ़ोतरी चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में यानी अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच हुई और बीते छह साल की सबसे तेज वृद्धि है।
निजी क्षेत्र के निवेश में होने वाला इजाफा तेल और गैस क्षेत्र को शामिल करने पर और अधिक हो गया। आर्थिक समीक्षा में भी निजी निवेश में सुधार के संकेतों को रेखांकित किया गया। वृहद स्तर पर यह इस बात को रेखांकित करता है कि सकल घरेलू उत्पाद में सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) का हिस्सा वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में 30.5 फीसदी के स्तर पर था जबकि महामारी के पहले इसका औसत 28.6 फीसदी था। हालांकि टिकाऊ ढंग से उच्च आर्थिक वृद्धि हासिल करने के लिए जीएफसीएफ में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करनी होगी।
निजी निवेश वर्षों से कई कारकों के चलते बाधित रहा है। वर्ष2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद के वर्षों में बैंकिंग और कॉरपोरेट बैलेंस शीट अत्यधिक निवेश और ढीले ऋण मानकों के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुईं। इस दोहरी बैलेंस शीट समस्या को हल करने में कई वर्ष लगे। अब बैंक और कॉरपोरेट दोनों की बैलेंस शीट बेहतर स्थिति में हैं। कोविड-19 महामारी ने भी कुछ वर्षों तक विश्वास को कमजोर किया और निजी निवेश को प्रभावित किया। निवेश निर्णयों को प्रभावित करने वाले अन्य बड़े कारणों में वैश्विक व्यापार मोर्चे पर अनिश्चितता और चीन में जरूरत से ज्यादा क्षमताएं शामिल थीं।
हाल ही में यूरोपीय संघ और अमेरिका सहित अन्य देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों ने व्यापार मोर्चे पर कुछ हद तक निश्चितता प्रदान की है। हालांकि, चीन की अतिरिक्त क्षमता से जुड़े जोखिम बने हुए हैं। चीन वैश्विक बाजारों, जिनमें भारत भी शामिल है, में वस्तुओं की आपूर्ति करता रहेगा। यह निवेश निर्णयों पर भार डाल सकता है। क्षमता उपयोग लगभग 75 फीसदी के आसपास है, लेकिन वर्तमान वातावरण में कंपनियां बड़े पैमाने पर निवेश करने से पहले इसे और बढ़ते हुए देखना पसंद करेंगी।
यद्यपि निजी निवेश में वृद्धि के प्रारंभिक संकेत दिखाई दे रहे हैं लेकिन इसे सहारे की आवश्यकता होगी। सरकार ने हाल के महीनों में कई सुधारात्मक कदम उठाए हैं। इस गति को बरकरार रखना जरूरी होगा। सरकारी समितियां विनियमों को समाप्त करने की संभावनाओं पर काम कर रही हैं, और इस मोर्चे पर प्रगति मध्यम अवधि में निजी निवेश का एक महत्त्वपूर्ण निर्धारक होगी।
इसके अलावा, हाल के महीनों में भारत ने व्यापार के प्रति खुलापन दिखाया है, लेकिन प्रयासों को चुनिंदा व्यापार समझौतों से कहीं आगे जाना होगा। यह याद रखना चाहिए कि निर्यात या बाहरी मांग निवेश और विकास का एक बड़ा चालक हो सकता है। इसके लिए सीमा शुल्क व्यवस्था और शुल्कों में पर्याप्त सुधार की आवश्यकता होगी। इसलिए, हाल ही में निजी निवेश में आई तेजी को किस प्रकार सहारा दिया जाता है, यह मध्यम अवधि में भारत की विकास यात्रा को निर्धारित करने के मामले में निर्णायक होगा।