प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
ऑफिस की भागदौड़ और काम के दबाव के बीच लंच ब्रेक ही वह समय होता है, जब कर्मचारी थोड़ा सुकून महसूस करते हैं। लेकिन सोचिए, आप भूख से बेहाल कैंटीन पहुंचे और पेमेंट गेटवे फेल होने की वजह से आपका ऑर्डर अटक जाए। इस छोटी सी तकनीकी खामी से होने वाली झुंझलाहट पूरे दिन के मूड को खराब कर सकती है। इसी समस्या का समाधान बनकर उभरा है ‘ईट नाउ पे लेटर’ यानी ENPL। एक्सपर्ट के मुताबिक, यह सिर्फ एक लोन जैसी सुविधा नहीं, बल्कि ऑफिस लाइफ को आसान बनाने वाला एक ‘कन्वीनियंस लेयर’ है।
हंगरबॉक्स के CEO और को-फाउंडर संदीपान मित्रा कहते हैं कि आमतौर पर जब हम ‘बाय नाउ पे लेटर’ (BNPL) की बात करते हैं, तो दिमाग में महंगे गैजेट्स या बड़ी EMI का ख्याल आता है। लेकिन ENPL को देखें तो यह बिल्कुल पारंपरिक ‘बाय नाउ पे लेटर’ से अलग है। मित्रा बताते हैं, “यह एक ज़रूरत के हिसाब से मिलने वाली सुविधा है, जो कैफेटेरिया जैसे बंद सिस्टम में काम करती है। यहां पर कर्मचारी पहले खा सकते हैं और बाद में पैसे दे सकते हैं, लेकिन इसका रिस्क बहुत कम है क्योंकि ट्रांजेक्शन छोटे होते हैं।”
उदाहरण के लिए, अगर कोई रोजाना 70 रुपये का लंच लेता है, तो इसमें बड़े कर्ज जैसी कोई बात नहीं। बल्कि यह पेमेंट की दिक्कतों को दूर करता है, जैसे कार्ड फेल हो जाना या बैलेंस कम होना। मित्रा के मुताबिक, ENPL का असली उद्देश्य यही है कि कर्मचारी बिना तनाव के खाना खा सकें।
मित्रा कहते हैं, “इसके लिए कंपनी यूजर्स की पुरानी आदतों को देखती है, जैसे वे कितना ऑर्डर करते हैं और कितना खर्च करते हैं। फिर ‘मैथमैटिकल और बिहेवियरल मॉडल्स’ से हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग लिमिट सेट की जाती है। मतलब, सबको एक जैसा क्रेडिट नहीं मिलता। यह सिस्टम बंद है, यानी सिर्फ कैफेटेरिया में ही इस्तेमाल हो सकता है, बाहर नहीं। इससे लोग ‘फाइनेंशियल डिसिप्लिन’ में रहते हैं और ट्रांसपेरेंसी बनी रहती है।”
मित्रा दावा करते हैं कि ENPL कर्ज बढ़ाने की बजाय एक सेफ्टी नेट है, जो रोज की जिंदगी को सुचारू रखता है। कई कर्मचारी बताते हैं कि इससे उनका दिन बेहतर गुजरता है, क्योंकि भूखे पेट काम करने की नौबत नहीं आती। कुल मिलाकर, यह छोटी सुविधा बड़ी राहत देती है, बिना किसी बड़े रिस्क के।
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अब सवाल यह है कि कंपनियां ENPL से क्या पाती हैं? मित्रा के अनुसार, सबसे बड़ा फायदा कर्मचारियों की संतुष्टि में है, जो फिर प्रोडक्टिविटी को बढ़ाता है। ऑफिस कैफेटेरिया में रोजाना हजारों ट्रांजेक्शन होते हैं, और पेमेंट गेटवे की सक्सेस रेट सिर्फ 85-90 प्रतिशत होती है। मतलब, कई बार तकनीकी दिक्कतों से पेमेंट फेल हो जाता है। ऐसे में ENPL आकर सब कुछ स्मूथ कर देता है। कर्मचारी बिना रुके खाना ले सकते हैं और बाद में पेमेंट कर सकते हैं।
इससे हर बार पेमेंट करने में लगने वाला टाइम बचता है, ऑपरेशन आसान बनता है और कर्मचारियों का कंपनी के प्रति विश्वास मजबूत होता है। मित्रा कहते हैं कि प्रोडक्टिविटी का फायदा सेकंडरी है, लेकिन यह जरूर आता है क्योंकि खुश कर्मचारी बेहतर काम करते हैं।
जैसे, अगर लंच ब्रेक में झंझट न हो, तो दोपहर का काम ज्यादा फोकस्ड होता है। कई कंपनियां अब इसे वर्कप्लेस बेनिफिट्स का हिस्सा मान रही हैं, क्योंकि इससे कर्मचारियों का मन लगता है। कुल मिलाकर, ENPL सिर्फ खाने की सुविधा नहीं, बल्कि कंपनी की इमेज को भी चमकाता है।
ENPL अच्छा है, लेकिन डिफॉल्ट या मिसयूज का क्या? मित्रा बताते हैं कि यहां रिस्क मैनेजमेंट पहले से ही प्लान्ड है और डेटा पर आधारित। कंपनी यूजर्स की पुरानी ऑर्डरिंग आदतों को एनालाइज करती है, फिर एल्गोरिदम से तय करती है कि कौन ENPL यूज कर सकता है। क्रेडिट लिमिट्स डायनामिक होती हैं, यानी बदलती रहती हैं, और सिर्फ कैफेटेरिया जैसे कंट्रोल्ड जगहों पर ही काम करती हैं।
क्योंकि यह कॉरपोरेट एनवायरनमेंट है, जहां हर यूजर की पहचान जांची हुई होती है, इसलिए रिस्क कम है। ओपन मार्केट की तरह नहीं, जहां कोई भी आकर कर्ज ले ले। कंपनी लगातार रीपेमेंट को मॉनिटर करती है और बड़े लिमिट्स एकदम नहीं देती, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ाती है। इससे मिसयूज की गुंजाइश कम हो जाती है। मित्रा कहते हैं कि यह क्लोज्ड-लूप सिस्टम होने से सेफ है, और कर्मचारियों को भी फाइनेंशियल डिसिप्लिन सिखाता है।
ENPL सिर्फ कैफेटेरिया तक सीमित नहीं रहेगा। मित्रा के मुताबिक, जैसे-जैसे प्लेटफॉर्म मजबूत होंगे, यह और फैलेगा। लेकिन इसके लिए मजबूत गवर्नेंस जरूरी है, ताकि यह सुविधा बनी रहे, कर्ज न बन जाए।
वो कहते हैं, “ENPL की संभावनाएं सिर्फ ऑफिस कैफेटेरिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आगे चलकर इसका इस्तेमाल ऑफिस ट्रांसपोर्ट, दूसरी मोबिलिटी सर्विसेज, छोटे एक्सपेंस रीइंबर्समेंट, वेंडिंग मशीन, ऑन-कैंपस रिटेल और दूसरी छोटी कॉरपोरेट सुविधाओं में भी किया जा सकता है। ये सभी ऐसे खर्च होते हैं जो रकम में छोटे होते हैं लेकिन बार-बार होते हैं, और ऐसे मामलों में ENPL अच्छी तरह फिट बैठता है।”
हालांकि, मित्रा साफ तौर पर कहते हैं कि इसका विस्तार हमेशा कॉन्टेक्स्ट में और कॉरपोरेट सिस्टम के दायरे में ही रहेगा, ताकि यह सुविधा कर्मचारियों की रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाए, बिना किसी बड़े आर्थिक जोखिम के।
आखिर में, रेगुलेशन्स की बात करते हैं। मित्रा कहते हैं कि ENPL BNPL से अलग है, क्योंकि यहां ट्रांजेक्शन छोटे और बंद सिस्टम में होते हैं। एलिजिबिलिटी जॉब से लिंक्ड है और लिमिट्स कंट्रोल्ड। कुछ BNPL के रूल्स लागू हो सकते हैं, लेकिन पूरा नहीं। फोकस ट्रांसपेरेंसी पर होना चाहिए, जैसे रीपेमेंट की क्लियर जानकारी। इसे एम्बेडेड फाइनेंस माना जाए, न कि आम कंज्यूमर लेंडिंग। इससे ENPL सेफ और यूजर-फ्रेंडली बनेगा।