प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
नीति आयोग ने कहा है कि खनन क्षेत्र में सामाजिक और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को बरकरार रखा जाना चाहिए। आयोग ने कहा कि अन्वेषण व्यवस्था को फिर से संतुलित किए जाने की जरूरत है, जिसमें ऊर्जा परिवर्तन के लिए आवश्यक प्राथमिकता वाले महत्त्वपूर्ण खनिजों के शुरुआती चरण के अन्वेषण के लिए सशर्त पहले आओ पहले पाओ (एफसीएफएस) की व्यवस्था शामिल है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यह काम आंकड़ों के खुलासे और अधिकार पर आधारित प्रगति के साथ किया जाना चाहिए। भारत के वर्तमान खनन ढांचे में महत्त्वपूर्ण खनिज परियोजनाओं को अन्वेषण के चरण में सार्वजनिक परामर्श से छूट दी गई है और नीलामियों के माध्यम से अन्वेषण लाइसेंस दिए जाते हैं।
थिंक टैंक ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि भारत के ऊर्जा परिवर्तन के लिए महत्त्वपूर्ण खनिज की आपूर्ति में तेजी लाने का काम पर्यावरण और सामाजिक जवाबदेही की कीमत पर नहीं होना चाहिए। आयोग ने कहा कि कमजोर शासन के कारण अंततः परियोजनाओं में देरी हो सकती है और इससे आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है।
मौजूदा नियामक ढांचे के में महत्त्वपूर्ण, रणनीतिक और परमाणु खनिजों से जुड़ी खनन परियोजनाओं को पर्यावरण प्रभाव के आकलन (ईआईए) प्रक्रिया के तहत सार्वजनिक परामर्श से छूट दी गई है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा सितंबर 2025 में अधिसूचित छूट के तहत ऐसी परियोजनाओं को रणनीतिक और राष्ट्रीय हित के विचारों का हवाला देते हुए सार्वजनिक सुनवाई आयोजित किए बिना सीधे केंद्रीय स्तर पर मूल्यांकित करने की अनुमति दी गई है।
नीति आयोग ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि महत्त्वपूर्ण खनिज परियोजनाओं में तेजी लाने के साथ सार्वजनिक परामर्श बनाए रखने की जरूरत है। रिपोर्ट में सार्वजनिक परामर्श को एक जोखिम-जांच तंत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें जोर दिया गया है कि सामाजिक, पर्यावरणीय और कानूनी जोखिमों की शुरुआती पहचान हो जाने से मुकदमेबाजी, सामुदायिक विरोध और परियोजना में देरी को रोकने में मदद मिलती है।