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व्यापार समझौतों से खुलेगा ‘विकसित भारत’ का रास्ता, ट्रंप टैरिफ के बीच अर्थव्यवस्था ने दिखाई मजबूती

साथ ही भारत को मौजूदा हालात में राजकोषीय स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिए तेज रफ्तार के साथ कदम बढ़ाने होंगे

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अजय छिब्बर   
Last Updated- February 12, 2026 | 5:28 AM IST

भारत ने अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के शुल्कों के दंश को उम्मीद से कहीं बेहतर ढंग से झेला। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 2025 में 7 प्रतिशत से अधिक रहने की संभावना है और इस दौरान भुगतान संतुलन भी सकारात्मक बना रहा। शुल्क लागू होने से पहले ही एहतियातन अमेरिका को वस्तु निर्यात बढ़ाने, रूस से सस्ता तेल मिलने और विदेश से ज्यादा रकम देश के भीतर आने के कारण हालात काफी संभले रहे। हालांकि रुपये में तेज गिरावट आई और विदेशी निवेशकों की शुद्ध बिकवाली 18 अरब डॉलर तक पहुंचने पर रुपया एक समय डॉलर के मुकाबले 92 के पार चला गया। मगर रुपये की कमजोरी से भारत के निर्यात को ताकत भी मिली।

2025 में वैश्विक वृद्धि दर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक के अनुमानों से अधिक रही और इसकी वजह थी आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) तथा इससे जुड़े डेटा सेंटर जैसे बुनियादी ढांचे पर खर्च। एक वजह यह भी रही कि ज्यादातर देशों ने अमेरिका के एकरफा शुल्कों पर कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की वरना वैश्विक व्यापार युद्ध छिड़ सकता था। फिर भी ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जा करने और ईरान पर हमला करने की लगातार धमकियों तथा शुल्कों पर उनके अप्रत्याशित व्यवहार ने दुनिया भर में अनिश्चितता बढ़ा दी, जिससे सोने का भाव 5,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास मंडराता रहा।

इस बिखरी और अधिक संरक्षणवादी दुनिया में भी ‘विकसित भारत’ की दिशा में भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार निर्यात और अधिक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) लाने पर निर्भर करती है। यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ बेहद अनुकूल मुक्त व्यापार समझौता हो चुका है और द्विपक्षीय निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर होने के बाद वहां से एफडीआई आकर्षित करने में भारत को बहुत मदद मिलेगी। इससे भारत में श्रम का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले निर्यात क्षेत्रों को बढ़ावा मिलेगा और बाकी दुनिया को संकेत जाएगा कि भारत शुल्क कम करने तथा व्यापार करने के लिए तैयार है।

यह ट्रंप के लिए भी संकेत था कि भारत को धमकाया नहीं जा सकता है। इसी रुख को देखकर ट्रंप ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को अचानक मंजूरी दे दी और भारतीय माल पर शुल्क की दर 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दी गई। यह बांग्लादेश, वियतनाम और दूसरे एशियाई देशों के माल पर लग रहे शुल्क से भी कम है। अमेरिका को अहसास हुआ कि उसे जल्दी हरकत में आना होगा वरना भारत अपने नियम-कानूनों को यूरोपीय संघ के हिसाब से बदल लेगा।

भारत-अमेरिका व्यापार सौदे का ब्योरा अभी नहीं आया है मगर इससे जो उम्मीद जगी हैं वे 2025 में बाहर गई पोर्टफोलियो निवेशकों की कुछ पूंजी जरूर वापस लाएगी। रुपये और भारतीय शेयरों में पहले ही उछाल दिख गई है। देखना यह है कि ट्रंप के 50 प्रतिशत शुल्क से बेपटरी हुई भारत की ‘चीन+1’ नीति पटरी पर लौटेगी या नहीं। ट्रंप के अप्रत्याशित बरताव और ‘कभी हां, कभी ना’ के संकेत से दीर्घकालिक निवेशक रकम लगाने से पहले इंतजार कर सकते हैं।

वर्ष 2026-27 के बजट में मजबूती लाने और जोखिम संभालने के लिए धन आवंटित किया गया है। इसने श्रम के अधिक इस्तेमाल वाले निर्यात और उन महत्त्वपूर्ण उत्पादों के लिए जरूरी मध्यवर्ती सामग्री पर आयात शुल्क कम कर दिया है, जिन उत्पादों के लिए भारत को चीन पर निर्भरता घटानी है तथा अधिक मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाएं तैयार करनी हैं। लोगों को लगा था कि सार्वजनिक पूंजीगत व्यय पर अब जोर नहीं दिया जाएगा मगर उसे जारी रखने का प्रयास स्वागत योग्य है। यह इसलिए ज्यादा अच्छा है क्योंकि निजी निवेश तथा एफडीआई में तेजी संभवत: ईयू के साथ व्यापार समझौता पूरा होने और भारत के प्रति अमेरिकी मंशा साफ होने के बाद ही आएगी।

एआई भारत के लिए वरदान भी हो सकता है और अभिशाप भी। इसलिए बजट में देश के एआई राष्ट्रीय मिशन को ताकत देने के लिए एआई को अधिक धन तथा सेमीकंडक्टरों के लिए मदद स्वागत योग्य है। लेकिन इस नई विश्व व्यवस्था में दोस्त या गठबंधन का कोई मतलब नहीं है और हर कोई हथियार बना रहा है, इसलिए रक्षा पर देश का खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2 प्रतिशत से नीचे होना वाकई कम था। पड़ोस में बिगड़ते रिश्तों और कोई भरोसेमंद साथी नहीं होने के कारण आधुनिकीकरण के लिए रक्षा आवंटन 2 प्रतिशत तक ले जाना बहुत जरूरी था और बहुत पहले हो जाना चाहिए था।

बहरहाल वित्त वर्ष 2027 के लिए राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 प्रतिशत पर समेटने के लक्ष्य के साथ राजकोषीय सुदृढ़ता की रफ्तार धीमी होना चिंताजनक है। राज्यों पर बढ़ते सार्वजनिक ऋण तथा आठवां वेतन आयोग लागू होने के बाद बढ़े खर्च से बदला भारत का ऋण गणित साधने के लिए खजाने को तेजी से मजबूत बनाना होगा। साजिद चिनॉय दिखा ही चुके हैं कि 11 प्रतिशत नॉमिनल जीडीपी वृद्धि (जो बजट अनुमान में बताई 10 प्रतिशत दर से अधिक है) रहने पर भी भारत का कुल सार्वजनिक ऋण 2030 तक जीडीपी के 80 प्रतिशत के आसपास रहेगा क्योंकि राज्यों का सार्वजनिक ऋण जीडीपी के 30 प्रतिशत से ऊपर है।

इसका मतलब है कि भारत को बड़े झटकों से निपटने के लिए जरूरी राजकोषीय गुंजाइश बनाने के लिए केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर राजकोष सुदृढ़ करना होगा। केंद्रीय बजट में यह लक्ष्य हासिल करने का एक तरीका आंतरिक सुरक्षा के लिए आवंटन में वृद्धि रोकना होगा, जो पहले ही ज्यादा है। दूसरा तरीका निजीकरण में तेजी लाना है, जिसके लिए बजट में जीडीपी का केवल 0.2 प्रतिशत अनुमान है।

ट्रंप के झटके से भारत 2025 में सुधार की राह पर तेजी से चल पड़ा। सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) घटाया, श्रम संहिता बनाई, बीमा और रक्षा उत्पादन में 100 प्रतिशत एफडीआई लागू कर दिया और विनियमन हटाने के संकेत दिए। मगर कथित फैक्टर मार्केट में सुधार के लिए जमीन खरीदने और जोनिंग की बाधाएं दूर करने, 300 से अधिक श्रमिकों वाली कंपनियों के लिए श्रम नियम लचीले करने और ऊर्जा ऊर्जा लागत कम करने के प्रयास जारी रखने होंगे।

बजट में विकसित भारत के लिए बैंकिंग सुधारों पर एक और उच्च-स्तरीय समिति गठित करने का ऐलान है, जो भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात बढ़ाने, सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) धीरे-धीरे खत्म करने और बॉन्ड बाजार बढ़ाने के तरीके सोचेगी। मगर वित्तीय क्षेत्र के ये सुधार सार्वजनिक उधारी की जरूरत घटाने पर ही निर्भर करेंगे, जो पिछले वर्ष से 16 प्रतिशत बढ़कर अपने उच्चतम स्तर 17.2 लाख करोड़ रुपये (लगभग 190 अरब डॉलर) पर पहुंच चुकी है। सरकारी कर्ज को भारतीय रिजर्व बैंक संभालता है और मुद्रास्फीति को लक्ष्य के भीतर रखते हुए सरकारी बॉन्डों की यील्ड काबू करना उसके लिए इम्तहान जैसा होगा।

आर्थिक समीक्षा में बताए बड़े झटके लगते हैं जैसे अमेरिकी शेयर बाजारों में बड़ी गिरावट आई तो भारत के पास संभलने के लिए राजकोषीय गुंजाइश कम ही है। बहुत अधिक सार्वजनिक ऋण अनुपात के साथ जोखिम उठाना आज की अनिश्चित और उथल-पुथल भरी दुनिया में अच्छा नहीं है। मैं दो बड़े व्यापार सौदों को अंजाम देने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार को बधाई देता हूं। दोनों सौदे बड़ा बदलाव ला सकते हैं और भारत की वृद्धि की संभावनाएं एवं एफडीआई बढ़ा सकते हैं तथा इसे ज्यादा खुली और प्रतिस्पर्द्धी अर्थव्यवस्था बना सकते हैं। उम्मीद है कि ईयू समझौते को इस साल मंजूरी मिल जाएगी और ट्रंप समझौते पर टिके रहेंगे।

(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी, जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय में विशिष्ट अतिथि विद्वान हैं)

 

First Published : February 12, 2026 | 5:28 AM IST