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पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) के एक अहम फैसले से भारत के रिटायरमेंट बचत सिस्टम में बड़ा बदलाव आने की संभावना है। अब तय नियमों के तहत शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंक अपने स्तर पर पेंशन फंड स्थापित कर सकेंगे।
हालांकि, नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) के मौजूदा नियमों और ढांचे में कोई बदलाव नहीं किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर भविष्य में NPS से जुड़े लोगों के अनुभव पर साफ दिखाई दे सकता है।
बैंकों की सीधी भागीदारी से ग्राहकों को ज्यादा विकल्प मिल सकते हैं और पेंशन फंड के प्रबंधन में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इससे निवेशकों के लिए सेवाओं की गुणवत्ता, पहुंच और पारदर्शिता बेहतर होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में एनपीएस को देखने और परखने का नजरिया भी बदल सकता है। ग्राहक अब सिर्फ रिटायरमेंट बचत नहीं, बल्कि बेहतर रिटर्न और सेवा के आधार पर पेंशन फंड का चुनाव कर सकेंगे।
मौजूदा और नए एनपीएस (नेशनल पेंशन सिस्टम) निवेशकों के लिए फिलहाल स्कीम के ढांचे में कोई बड़ा बदलाव नहीं है। बदलाव मुख्य रूप से सुविधा, पहुंच और विकल्पों को लेकर है। विशेषज्ञों के अनुसार, बैंकों की भागीदारी से एनपीएस का दायरा और मजबूत होगा।
कर्मा मैनेजमेंट ग्लोबल कंसल्टिंग सॉल्यूशंस के प्रबंध निदेशक प्रतीक वैद्य का कहना है कि एनपीएस का प्रोडक्ट तुरंत नहीं बदलेगा, लेकिन निवेशकों का अनुभव बेहतर हो सकता है। बैंकों का बड़ा नेटवर्क और मजबूत डिजिटल सिस्टम खासतौर पर गैर-मेट्रो क्षेत्रों में एनपीएस से जुड़ने, जानकारी पाने और सेवाओं को आसान बनाएगा। इसके साथ ही, ज्यादा पेंशन फंड मैनेजर होने से तुलना और जवाबदेही भी बढ़ेगी, जबकि एनपीएस के नियम पहले की तरह सुरक्षित रहेंगे।
रुराश फाइनेंशियल्स के प्रबंध निदेशक और सीईओ रंजीत झा के मुताबिक, निवेशकों की पहचान और भरोसा भी अहम भूमिका निभाता है। अब निवेशकों के पास ऐसे पेंशन फंड मैनेजर चुनने का मौका होगा, जिनसे उनका पहले से बैंकिंग संबंध है। बैंकिंग चैनलों से जुड़ाव के कारण एनपीएस में नामांकन और योगदान प्रबंधन की प्रक्रिया भी पहले से ज्यादा आसान हो जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बैंकों की भागीदारी पेंशन फंड सेक्टर में बढ़ती है, तो इससे फंड मैनेजर्स के बीच प्रतिस्पर्धा तेज होगी। इसका सीधा फायदा पेंशन धारकों को मिल सकता है, क्योंकि लागत कम होने और सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होने की संभावना है।
उद्योग विशेषज्ञ वैद्य ने कहा कि जब बाजार में भरोसेमंद और मजबूत संस्थाएं आती हैं, तो इससे फीस घटती है, पारदर्शिता बढ़ती है और सेवाएं तेज होती हैं। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी बड़े ब्रांड का नाम होने से बेहतर रिटर्न की गारंटी नहीं मिलती। लंबे समय में रिटर्न इस बात पर निर्भर करेगा कि निवेश का बंटवारा, जोखिम प्रबंधन और फंड को कैसे चलाया जाता है।
वहीं, जेहा ने बताया कि भले ही पेंशन फंड रेगुलेटरी अथॉरिटी (PFRDA) ने फीस की सीमा और निवेश के नियम तय कर रखे हों, फिर भी बढ़ती प्रतिस्पर्धा से निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिल सकता है। उन्होंने कहा कि मैनेजमेंट फीस में कमी का सीधा लाभ ग्राहकों को होता है और बेहतर रिटर्न की तलाश में फंड मैनेजर निवेश के नए और विविध विकल्प अपनाने पर ध्यान दे सकते हैं।
पेंशनबाजार के प्रमुख विष्वजीत गोयल का कहना है कि इस कदम से नए उत्पादों के विकास को भी बढ़ावा मिल सकता है। उनके मुताबिक, पहले से मौजूद मल्टीपल स्कीम सिस्टम के चलते बैंक अगर पेंशन फंड को प्रायोजित करते हैं, तो अलग-अलग जरूरतों और प्रोफाइल के हिसाब से नई स्कीमें और उत्पाद सामने आ सकते हैं।
विशेषज्ञ वैद्य (Vaidya) के अनुसार इस व्यवस्था में सबसे बड़ा जोखिम हितों के टकराव का है। बैंक एक ही समय पर एनपीएस के वितरक, ग्राहक संबंध प्रबंधक और पेंशन फंड से जुड़े पक्ष बन सकते हैं, जिससे पारदर्शिता पर असर पड़ सकता है।
वैद्य का कहना है कि ऐसे में रिंग-फेंसिंग, स्वतंत्र ट्रस्टी व्यवस्था और स्पष्ट व पारदर्शी खुलासे बेहद जरूरी हैं। उन्होंने ग्राहकों को सलाह दी कि वे केवल संस्थागत भरोसे पर निर्भर न रहें, बल्कि अपने एनपीएस खाते के खर्च अनुपात (एक्सपेंस रेशियो) और निवेश पोर्टफोलियो के रुझान पर नियमित नजर रखें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम एनपीएस को केवल वेतनभोगी कर्मचारियों तक सीमित रखने के बजाय निजी क्षेत्र, गिग वर्कर्स और अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों तक पहुंचाने की दिशा में अहम है।
वैद्य ने कहा कि बैंक पहले से ही बड़ी संख्या में ऐसे लोगों से जुड़े हैं जो नियमित पेरोल सिस्टम में नहीं आते। गिग और अनौपचारिक कामगारों के लिए आसान योगदान प्रक्रिया और खाते की पोर्टेबिलिटी सबसे अहम होती है।
वहीं, झा (Jha) का कहना है कि बैंकों की ग्रामीण और अर्ध-शहरी पहुंच से वंचित वर्गों के लिए रिटायरमेंट बचत को औपचारिक रूप दिया जा सकता है। इससे एनपीएस एक दीर्घकालिक आय सुरक्षा योजना के रूप में मजबूत होगा, न कि केवल अनुपालन से जुड़ा उत्पाद।