जनवरी में सूचीबद्ध शेयरों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली 3 अरब डॉलर के पार निकल गई। यह अगस्त 2025 के बाद का निकासी का सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह बिकवाली तब भी जारी रही जब दक्षिण कोरिया, ताइवान, इंडोनेशिया और थाईलैंड समेत कई अन्य उभरते बाजारों में एफपीआई शुद्ध खरीदार बने रहे।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में कोई प्रगति नहीं होने, कंपनियों की आय वृद्धि में सुस्ती और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) शेयरों में वैश्विक तेजी में भारत की सीमित भागीदारी को उनकी निरंतर निकासी के प्रमुख कारणों के रूप में बताया जा रहा है।
आम बजट से पहले विदेशी निवेशक भी सतर्क बने हुए हैं क्योंकि उन्हें नीतिगत बदलावों में सीमित संभावना दिख रही है। वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही के शुरुआती नतीजों ने लाभप्रदता को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। शुरुआती नतीजे जारी करने वाली 143 कंपनियों का संयुक्त शुद्ध लाभ पिछले साल की तुलना में सिर्फ 3.5 फीसदी बढ़ा है, जो वित्त वर्ष 2025 की तीसरी तिमाही में दर्ज 11.2 फीसदी और वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में दर्ज 10.1 फीसदी की वृद्धि से काफी कम है।
मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के संस्थापक सौरभ मुखर्जी ने कहा, पिछले दो वर्षों से आय वृद्धि मामूली रहने के कारण एफपीआई चिंतित हैं। लंबी अवधि के लिहाज से डॉलर में भारत की आय वृद्धि सीमित रही है जबकि बाजार एक साल के अग्रिम लाभ के करीब 20 गुना पर कारोबार कर रहा है। इस तिमाही में भी आय में तेजी के संकेत नहीं हैं। इसके अलावा, मुद्रा अवमूल्यन ने भी उनकी चिंताओं को बढ़ा दिया है। साल 2025 में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 5 फीसदी फिसला है।
साथ ही, घरेलू इक्विटी निवेश में मजबूती के कारण विदेशी निवेशकों को बाहर निकलने के पर्याप्त अवसर मिले हैं, जिससे कीमतों में ज्यादा व्यवधान डाले बिना उनको बाजार में बिकवाली का मौका मिला हुआ है।
अप्रैल में डॉनल्ड ट्रंप द्वारा घोषित टैरिफ पर 90 दिनों के विराम से बाजार का माहौल कुछ समय के लिए सुधरा और विदेशी निवेशकों ने मार्च से जून 2025 के बीच शुद्ध खरीदारी की। लेकिन व्यापार टकराव फिर बढ़ने और भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने से विदेशी निवेशक एक बार फिर उखड़ गए। अगस्त 2025 के बाद के छह महीनों में से चार महीनों में एफपीआई शुद्ध बिकवाल रहे हैं।