म्युचुअल फंड

Regular vs Direct Mutual Funds: देखें छिपा कमीशन कैसे 10 साल में निवेशकों की 25% वेल्थ खा गया

रेगुलर और डायरेक्ट प्लान एक ही तरह के पोर्टफोलियो में निवेश करते हैं। दोनों के बीच असली फर्क लागत का होता है

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अमित कुमार   
Last Updated- January 08, 2026 | 5:50 PM IST

Regular vs Direct Mutual Funds: रेगुलर म्युचुअल फंड स्कीम्स में छिपे कमीशन लंबे समय में निवेशकों की वेल्थ को काफी हद तक घटा सकते हैं, भले ही पोर्टफोलियो समान ही क्यों न हो। फाइनैंशियल प्लानिंग फर्म 1 Finance के नए रिसर्च में यह सामने आया है कि एक दशक तक इक्विटी म्युचुअल फंड में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए ज्यादा लागत (high costs) का असर जितना दिखता है, उससे कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है।

स्टडी के मुताबिक, 80 फीसदी से ज्यादा इक्विटी म्युचुअल फंड स्कीम्स में रेगुलर प्लान में निवेश करने वाले निवेशकों की संपत्ति 10 साल की अवधि में उसी स्कीम के डायरेक्ट प्लान में निवेश करने वालों की तुलना में कम से कम 25 फीसदी तक कम रही।

रेगुलर प्लान पीछे क्यों रह जाते हैं?

रेगुलर और डायरेक्ट प्लान एक ही तरह के पोर्टफोलियो में निवेश करते हैं। दोनों के बीच असली फर्क लागत का होता है। रेगुलर प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर को दिया जाने वाला कमीशन शामिल होता है, जो टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) में जुड़ा रहता है। यह अंतर भले ही एक साल में छोटा लगे, लेकिन समय के साथ यह लगातार कंपाउंड होता रहता है।

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स्टडी के मुताबिक, लगभग हर पांच में से एक इक्विटी स्कीम में 10 साल की अवधि के दौरान रेगुलर और डायरेक्ट प्लान के बीच वेल्थ का अंतर 50 फीसदी से ज्यादा रहा, और इसकी वजह सिर्फ ज्यादा खर्च रही। रिसर्च यह भी बताती है कि रिटर्न में गिरावट समय के साथ धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेज रफ्तार से बढ़ती जाती है।

शॉर्ट टर्म निवेश में यह अंतर संभालने लायक लग सकता है, लेकिन लॉन्ग टर्म निवेश में लागत का यह फर्क नजरअंदाज करना मुश्किल हो जाता है।

पांच साल में ही दिखने लगाता है असर

मध्यम अवधि में भी इसका असर साफ नजर आता है। पांच साल की अवधि में जिन स्कीमों का एनालिसिस किया गया, उनमें से आधे से ज्यादा में रेगुलर प्लान के निवेशकों की संपत्ति डायरेक्ट प्लान की तुलना में कम से कम 15 फीसदी तक घट गई।

खास बात यह है कि स्टडी के मुताबिक यह अंतर फंड के प्रदर्शन या कैटेगरी के चुनाव की वजह से नहीं है, बल्कि ज्यादा और बार-बार लगने वाली लागत के कारण है, जो हर साल रिटर्न पर लगातार दबाव डालती रहती है।

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निवेशक फिर भी रेगुलर प्लान में क्यों टिके रहते हैं?

कमजोर नतीजों के बावजूद रेगुलर प्लान में निवेश की हिस्सेदारी अब भी ज्यादा बनी हुई है। स्टडी में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, रेगुलर प्लान में किए गए कुल निवेश का पांचवें हिस्से से ज्यादा हिस्सा पांच साल से ज्यादा समय तक होल्ड किया गया, जबकि डायरेक्ट प्लान में यह आंकड़ा 10 फीसदी से भी कम है।

यह संकेत देता है कि डिस्ट्रीब्यूटर के जरिए मिलने वाली सलाह निवेशकों को लंबे समय तक निवेश बनाए रखने के लिए प्रेरित कर सकती है। हालांकि, ज्यादा लागत लंबे समय तक निवेश करने के फायदे को काफी हद तक कम कर देती है।

ये निष्कर्ष एक सरल लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली बात को रेखांकित करते हैं, सही फंड चुनने जितना ही जरूरी सही प्लान चुनना भी है। सालाना खर्च में छोटा सा अंतर भी समय के साथ बड़ा वेल्थ गैप बना सकता है। लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह समझना बेहद अहम है कि रिटर्न कहां और कैसे चुपचाप कम हो रहा है, क्योंकि यही बात अंततः उनके फाइनैंशियल नतीजों में बड़ा फर्क डाल सकती है।

First Published : January 8, 2026 | 5:43 PM IST