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बाजार ऊंचाई पर है? फिर भी SIP करना सही है, रिसर्च ने खोली आंखें

Nifty 500 के 7 साल के SIP आंकड़े बताते हैं कि ऑल-टाइम हाई, गिरावट या तेजी- एंट्री टाइमिंग से ज्यादा जरूरी है नियमित और लंबी अवधि का निवेश

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देवव्रत वाजपेयी   
Last Updated- January 09, 2026 | 3:15 PM IST

शेयर बाजार में निवेश करने वाले ज्यादातर लोग इस उलझन में रहते हैं कि SIP कब शुरू की जाए। आम धारणा यह है कि अगर बाजार ऊंचाई पर है तो निवेश नहीं करना चाहिए और गिरावट आने के बाद ही SIP शुरू करनी चाहिए। लेकिन DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट और Nifty 500 Index के 7 साल के SIP आंकड़े इस सोच को गलत साबित करते हैं।

आंकड़ों के अनुसार, चाहे SIP ऑल-टाइम हाई पर शुरू की गई हो, बाजार के 20% चढ़ने के बाद या 20% गिरने के बाद- लंबे समय में रिटर्न में बहुत ज्यादा अंतर नहीं दिखता। 7 साल की अवधि में SIP रिटर्न लगभग 12% से 14% के दायरे में ही रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे निवेश की अवधि बढ़ती है, वैसे-वैसे एंट्री टाइमिंग का असर कम होता चला जाता है। असल फर्क पड़ता है नियमित निवेश और लंबे समय तक बाजार में बने रहने से।

SIP शुरू करने की स्थिति 7 साल का औसत (Median) रिटर्न
जब इंडेक्स ऑल-टाइम हाई पर था 13%
जब इंडेक्स पिछले 1 साल में 20% या ज्यादा चढ़ चुका था 14%
जब इंडेक्स पिछले 1 साल में 20% या ज्यादा गिर चुका था 12%
                           स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट

ज्यादा जोखिम, ज्यादा मुनाफा- यह सोच भी भ्रामक

कैटेगरी लंबी अवधि का रिटर्न (2007 से 2025)
लो बीटा 18.2%
हाई बीटा 13.6%
स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट

शेयर बाजार में यह मान्यता भी काफी प्रचलित है कि ज्यादा जोखिम उठाने से ज्यादा रिटर्न मिलता है। हाई बीटा और हाई वोलैटिलिटी वाले शेयरों को अक्सर बेहतर कमाई का जरिया माना जाता है। हालांकि DSP के विश्लेषण से सामने आया है कि कम जोखिम वाले पोर्टफोलियो ने लंबे समय में न सिर्फ ज्यादा स्थिर बल्कि कई बार बेहतर रिटर्न भी दिए हैं।

कैटेगरी लंबी अवधि का रिटर्न (2007 से 2025)
लो वोलैटिलिटी 16.5%
हाई वोलैटिलिटी 13.3%
स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट

कम बीटा और कम वोलैटिलिटी वाले निवेशों ने बाजार की गिरावट के दौरान कम नुकसान उठाया, जिससे उनकी कंपाउंडिंग बेहतर बनी रही। इसके उलट, ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले निवेश तेजी के दौर में भले ही अच्छा प्रदर्शन करें, लेकिन गिरावट के समय भारी नुकसान उनके लंबे समय के रिटर्न को कमजोर कर देता है। यही वजह है कि लंबी अवधि के निवेश में जोखिम को नियंत्रित करना उतना ही जरूरी है जितना मुनाफा कमाना।

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क्या स्मॉल और मिडकैप शेयर हमेशा लार्जकैप से आगे रहते हैं?

समय / साइकल (लगभग) Large Cap (LC) Mid Cap (MC) Small Cap (SC)
तेजी का दौर (2003–07) 49% 62% 100%
गिरावट के बाद (2008–09) 21% 20% 24%
अगली तेजी (2009–11) 26% 31% 37%
स्थिर दौर (2013–15) 19% 18% 19%
तेज़ी (2016–18) 17% 22% 23%
मंदी (2018–20) 14% 15% 15%
हालिया साइकल (2020–23) 16% 19% 19%
स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट

तेजी के बाजार में स्मॉल और मिडकैप शेयरों की शानदार तेजी निवेशकों को आकर्षित करती है और ऐसा लगता है कि ये शेयर हमेशा लार्जकैप से बेहतर रिटर्न देंगे। लेकिन इतिहास बताता है कि हर मार्केट साइकिल में यह बढ़त स्थायी नहीं रहती। BSE के लंबे समय के आंकड़े दिखाते हैं कि जैसे ही बाजार में मंदी आती है, स्मॉल और मिडकैप शेयर अपनी पूरी अतिरिक्त बढ़त खो देते हैं और लार्जकैप के मुकाबले ज्यादा गिरावट झेलते हैं।

इंडेक्स सबसे ज्यादा Alpha सबसे कम Alpha
BSE Midcap +24% -25%
BSE Smallcap +24% -20%
स्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट

उनकी ज्यादा वोलैटिलिटी के कारण गिरावट के समय नुकसान भी ज्यादा होता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि स्मॉल और मिडकैप में निवेश तभी फायदेमंद होता है जब उनकी अल्फा बन रही हो। अल्फा (Alpha) का मतलब होता है कि कोई शेयर या कैटेगरी (जैसे स्मॉल या मिडकैप) बाजार के बड़े इंडेक्स या लार्जकैप शेयरों से ज्यादा रिटर्न दे रही है। जब यह बढ़त खत्म हो जाए, तो लार्जकैप शेयरों की ओर झुकाव निवेशकों के लिए ज्यादा सुरक्षित विकल्प साबित हो सकता है।

First Published : January 9, 2026 | 3:15 PM IST