facebookmetapixel
Advertisement
विदेशों में बढ़ेगा भारत का दबदबा! West Asia तनाव के बीच भी नहीं रुकेगा भारतीय कंपनियों का ग्लोबल विस्तारStock Market Today: GIFT Nifty में 100 अंकों से ज्यादा की तेजी, TCS के शेयरों पर रहेगी नजर; एशियाई बाजारों में भी शानदार बढ़त₹11,600 करोड़ के SBI MF IPO से पहले बड़ी डील, 30 निवेशकों ने खरीदे शेयरअब सिर्फ डिग्री नहीं, स्किल तय करेगी नौकरी! सरकार तैयार कर रही नया इंटरनेशनल सिस्टमPM मोदी की ऑस्ट्रेलिया में बड़ी डील! यूरेनियम सप्लाई, रक्षा और व्यापार समेत 18 समझौतों पर बनी सहमतिStocks To Watch Today: Dixon, Power Grid, Havells समेत इन शेयरों में आज दिख सकती है हलचल, रखें नजरटियर-2 शहर बने रियल एस्टेट का नया ग्रोथ इंजन, डेवलपर्स का बढ़ा निवेशभारत बनेगा GCC की ग्लोबल राजधानी! वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रखा 2030 तक 5,000 सेंटर का लक्ष्यOil Shock से अब कम डरेगा भारत! 1991 के मुकाबले 30% ज्यादा एनर्जी एफिशिएंट हुई अर्थव्यवस्थाGoogle vs Hindware: कीवर्ड बिडिंग मामले में दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा गूगल, सिंगल बेंच के फैसले को दी चुनौती

भारतीय बाजार पर विदेशी निवेशकों का भरोसा घटा

Advertisement
Last Updated- December 06, 2022 | 11:01 PM IST

बड़े उभरते बाजारों में भारतीय कंपनियों को ही निवेशकों की बेरुखी सबसे ज्यादा झेलनी पड़ रही है।


महंगाई दर को काबू में रखने के सरकारी कोशिशे कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल रही हैं और इसका खमियाजा स्टील अथॉरिटी से लेकर ग्रासिम इंडस्ट्रीज तक को झेलना पड़ रहा है।


दूसरी सबसे बड़ी स्टील उत्पादक कंपनी स्टील अथॉरिटी यानी सेल फिलहाल अपनी अर्निंग्स के नौ गुना वैल्यू पर कारोबार कर रही है, जो 2008 की शुरुआत में रही इसकी वैल्यू से 41 फीसदी कम है। इसी तरह देश की तीसरी सबसे बड़ी सीमेन्ट उत्पादक कंपनी ग्रासिम की वैल्यू भी इस दौरान 32 फीसदी घटकर 8.5 गुना रह गई।


भारतीय बाजार की बात की जाए तो इसके प्राइस टु अर्निंग्स में इस दौरान 33 फीसदी की गिरावट देखी गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह रही है विदेशी संस्थागत निवेशक जो साल 2000 के बाद पहली बार शुध्द बिकवाल रहे हैं और भारत में इनकी बिकवाली ब्राजील, रूस और चीन से ज्यादा रही है जहां ये दस फीसदी गिरकर 31 फीसदी पर आई है।


ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक मार्च के निचले स्तर से 13 फीसदी सुधरने के बावजूद निवेशक अब भारतीय बाजार  पर कम भरोसा कर रहे हैं क्योंकि भारतीय कंपनियां रूस और ब्राजील की कंपनियों से कम कमोडिटी का उत्पादन करती हैं। यही नहीं भारत की जीडीपी दर भी चीन से कम है और यहां कोयले, तेल और कच्चे लोहे की कमी से महंगाई की दर काफी बढ़ चुकी है।


न्यू यार्क की आईएनजी ग्रुप एनवी की असेट मैनेजमेंट इकाई के इंटरनेशनल इक्विटीज और ग्लोबल ग्रोथ के हेड उरी लैंड्समैन के मुताबिक उन्हे भारत में निवेश करने की कोई तगड़ी वजह नहीं दिखाई देती।


वहां की आबादी और प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए महंगाई उनके लिए समस्या खड़ी कर सकती है और सरकार को जीडीपी की दर में कटौती देखनी पड़ सकती है, ब्रिक देशों में भारत ही ऐसा बाजार है जहां लैंड्समैन ने इस महीने की शुरुआत में बिकवाली करने के बाद अभी तक कोई निवेश नहीं किया है। ब्रिक देशों में भारत ही ऐसा देश है जहां की आर्थिक विकास दर इस साल लगातार दूसरी बार सुस्त रहने की संभावना है।

Advertisement
First Published - May 12, 2008 | 10:48 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement