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क्या IPO से पहले की कानूनी लड़ाई बन गई है नया ट्रेंड? हाई कोर्ट ने उठाया बड़ा सवाल

वीवर्क इंडिया के आईपीओ को सेबी की मंजूरी सही ठहराई, देर से दाखिल याचिकाओं पर सवाल

Last Updated- December 17, 2025 | 8:57 AM IST
Bombay HC

बॉम्बे हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने उन याचिकाओं के गलत इस्तेमाल पर ध्यान खींचा है जो अक्सर परेशान करने वाली कानूनी चुनौतियों का कारण बनती हैं। अदालत ने अपने ताजा फैसले में बाजार नियामक सेबी द्वारा वीवर्क इंडिया मैनेजमेंट के आईपीओ को दी गई मंजूरी को सही ठहराया है। इस साल आईपीओ लाने वाली कई कंपनियों को अपनी शेयर बिक्री के दौरान कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ा है।

जुलाई में एक एनजीओ ने स्मार्टवर्क्स कोवर्किंग के आईपीओ को रोकने के लिए प्रतिभूति अपील पंचाट (सैट) में याचिका दायर की थी। पंचाट ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि इश्यू पर रोक का कोई वैध आधार नहीं है। ब्लूस्टोन ज्वैलरी एंड लाइफस्टाइल को भी अपनी आईपीओ प्रक्रिया के दौरान कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। सबसे ताजा उदाहरण वीवर्क का है।

ऐसी याचिकाओं में बताए गए कारणों में कथित खुलासे में चूक और विवादित कानूनी व्याख्याओं से लेकर शेयरधारकों के वर्गीकरण से जुड़े सवाल शामिल हैं। हालांकि सभी शिकायतें बेबुनियाद नहीं होतीं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आईपीओ या लिस्टिंग के ठीक पहले दायर याचिकाओं से अक्सर गलत इरादों को लेकर चिंता होती है।

सराफ ऐंड पार्टनर्स में सिक्योरिटीज एंड रेगुलेटरी प्रैक्टिस के पार्टनर अभिराज अरोड़ा ने कहा, ‘शेयरधारक-संचालित मुकदमेबाजी या नियामकीय शिकायतों का समय शायद ही कभी संयोग से होता है। ज्यादातर मामलों में ये कार्रवाई तब सामने आती हैं जब कोई कंपनी किसी बड़े ग्रोथ इवेंट, जैसे कि आईपीओ या बड़ा फंड जुटाने के लिए तैयार होती है, तब रुकावट की संभावना सबसे ज्यादा होती है।’

विश्लेषकों का कहना है कि डीआरएचपी फाइल करते समय कोई भी शिकायत या मुद्दा उठाना सही तरीका है, क्योंकि इससे जारी करने वाले और नियामक दोनों को सुधार के कदम उठाने के लिए काफी समय मिल जाता है। हालांकि, ज्यादातर मामले तब सामने आते हैं जब आईपीओ सब्सक्रिप्शन के लिए खुल चुका होता है, जिसका मकसद ज्यादा से ज्यादा रुकावट पैदा करना होता है।

अक्टूबर में वीवर्क इंडिया के आईपीओ के दौरान बॉम्बे उच्च न्यायालय में सेबी की मंजूरी को चुनौती देते हुए डिस्क्लोजर से जुड़े आधारों पर कई याचिकाएं दायर की गईं। हालांकि कोर्ट की जांच में एक याचिकाकर्ता की गंभीर गड़बड़ी सामने आई, जिसके बाद कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। कंपनी के खिलाफ दायर एक और याचिका अभी भी कोर्ट में लंबित है।

First Published - December 17, 2025 | 8:37 AM IST

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